दैनिक इंडिया न्यूज़ ,नई दिल्ली। उच्च शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त चुनौतियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन. सिंह ने केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। अपने सार्वजनिक वक्तव्यों में उन्होंने दावा किया है कि यदि भारत को ज्ञान-आधारित महाशक्ति बनाना है, तो उच्च शिक्षा की नीतियों की व्यापक समीक्षा अपरिहार्य है। उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था का मूल आधार केवल योग्यता, पारदर्शिता, समान अवसर और संवैधानिक न्याय होना चाहिए।

रीना एन. सिंह ने आरोप लगाया कि वर्तमान व्यवस्था के कुछ प्रावधानों ने उच्च शिक्षा संस्थानों में विवादों को जन्म दिया है और अनेक छात्रों में असंतोष बढ़ा है। उनके अनुसार, जिन नीतियों को लेकर लगातार न्यायालयों का दरवाजा खटखटाना पड़े, वे स्वयं व्यापक पुनर्विचार की मांग करती हैं। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि यूजीसी की नीतियों और संरचना की निष्पक्ष समीक्षा कर उसे अधिक जवाबदेह, पारदर्शी और छात्र-केंद्रित बनाया जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा किसी भी राष्ट्र के भविष्य की आधारशिला होती है। यदि नीति निर्माण में योग्यता, गुणवत्ता और समान अवसर सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं होंगे, तो देश की प्रतिभा और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है। उनके अनुसार, शिक्षा सुधार केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का विषय है।
रीना एन. सिंह का कहना है कि उच्च शिक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल करने के लिए सरकार को शिक्षाविदों, छात्रों, विश्वविद्यालयों और विशेषज्ञों के साथ व्यापक संवाद स्थापित कर ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो संविधान की भावना, शैक्षणिक उत्कृष्टता और सामाजिक न्याय—तीनों के बीच संतुलन स्थापित करें।
इस बीच, यूजीसी और उच्च शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर देशभर में बहस तेज होती दिखाई दे रही है। विभिन्न पक्ष अलग-अलग दृष्टिकोण रख रहे हैं, जबकि शिक्षा जगत का एक वर्ग व्यापक सुधारों की आवश्यकता पर जोर दे रहा है। ऐसे में आने वाले समय में केंद्र सरकार और यूजीसी की ओर से इस विषय पर उठाए जाने वाले कदमों पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।