शिक्षक केवल ज्ञान का संवाहक नहीं, समाज की चेतना और युग का निर्माता है : योगी आदित्यनाथ — ‘इदम् न मम’ से ‘इदम् राष्ट्राय स्वाहा’ तक राष्ट्र निर्माण का आह्वान

दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली। अखिल विश्व गायत्री परिवार, शान्तिकुञ्ज हरिद्वार के तत्वावधान में आयोजित प्रान्तीय शिक्षक गरिमा कार्यशाला में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शिक्षक की भूमिका को कक्षा और पाठ्यक्रम से कहीं व्यापक बताते हुए उसे समाज की चेतना, संस्कार और राष्ट्र के भविष्य से जोड़ा। उन्होंने कहा कि शिक्षक केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि नई पीढ़ी को संस्कार, दिशा और राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव प्रदान करता है। यदि शिक्षक अपने दायित्व के प्रति जागृत होकर कार्य करे तो भारत के विश्वगुरु बनने की यात्रा को नई गति मिल सकती है। मुख्यमंत्री ने शिक्षकों से 2047 के भारत के निर्माण के लिए नई पीढ़ी को ‘इदम् न मम’ से ‘इदम् राष्ट्राय स्वाहा’ की भावना से संस्कारित करने का आह्वान किया।

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने गायत्री परिवार के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य तथा उनकी साधना-सहचरी माता भगवती देवी शर्मा को श्रद्धापूर्वक नमन किया। दीप प्रज्वलन के पश्चात भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा में प्रदेश के शीर्ष दस स्थान प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों को सम्मानित किया गया तथा ‘युग निर्माताओं से युग ऋषि का आह्वान’ स्मारिका का विमोचन किया गया। मुख्यमंत्री ने पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की तपःसाधना को भारतीय सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण की महत्वपूर्ण कड़ी बताते हुए कहा कि उन्होंने साधना को सामाजिक चेतना और राष्ट्रहित से जोड़ने का कार्य किया।

कार्यक्रम का वातावरण उस समय विशेष रूप से उत्साहपूर्ण हो उठा, जब सरोजिनी नगर विधायक राजेश्वर सिंह मंच पर पहुंचे। उनके आगमन पर उपस्थित जनसमुदाय ने तालियों की ऐसी गड़गड़ाहट से पूरे ऑडिटोरियम को गुंजायमान कर दिया कि कुछ क्षणों के लिए वातावरण जनउत्साह से भर उठा। मंच पर उनकी उपस्थिति ने कार्यक्रम की ऊर्जा और जनसहभागिता को और मुखर कर दिया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि लगभग एक शताब्दी पूर्व पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने मथुरा से साधना आरम्भ कर हरिद्वार में गायत्री परिवार की स्थापना के माध्यम से भारतीय संस्कृति, सनातन मूल्यों और सामाजिक चेतना के पुनर्जागरण का अभियान आगे बढ़ाया। यज्ञों के माध्यम से सर्वसमाज को एक वेदी पर बैठाने की परम्परा को उन्होंने सामाजिक समरसता और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की व्यवहारिक अभिव्यक्ति बताया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति समाप्त हो सकता है, किंतु विचार समाप्त नहीं होता और यही कारण है कि आचार्य की विचारधारा आज भी समाज को दिशा देने में सक्षम है।

योगी आदित्यनाथ ने गीता प्रेस गोरखपुर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अखिल विश्व गायत्री परिवार की स्थापना के ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यरत इन संस्थाओं ने जनचेतना और भारतीयता के बोध को सुदृढ़ करने में भूमिका निभाई। उन्होंने पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी नई पीढ़ी के कंधों पर है और इस दायित्व के निर्वहन में शिक्षक की भूमिका निर्णायक है।

मुख्यमंत्री ने गुरु-शिष्य परम्परा को भारतीय ज्ञान-विरासत की आधारशिला बताते हुए तक्षशिला, नालन्दा, चाणक्य-चन्द्रगुप्त, वशिष्ठ-श्रीराम और संदीपन-श्रीकृष्ण की परम्परा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत की शिक्षा परम्परा ने केवल ज्ञान नहीं दिया, बल्कि चरित्र, संस्कार और नेतृत्व का निर्माण किया। आज आवश्यकता है कि शिक्षक इसी परम्परा को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था से जोड़कर युवा पीढ़ी को राष्ट्र निर्माण की दिशा दें।

उन्होंने कहा कि आज परिवार व्यवस्था में परिवर्तन और सामाजिक विखंडन की परिस्थितियों के बीच ऐसी संस्थाओं की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है, जो नई पीढ़ी को संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ सकें। गायत्री परिवार से जुड़े 11 लाख से अधिक छात्र-छात्राओं का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यह संख्या केवल सहभागिता नहीं, बल्कि युवा चेतना के निर्माण की व्यापक संभावना का संकेत है।

मुख्यमंत्री ने ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की परिकल्पना को साकार करने के लिए जाति, क्षेत्र और भाषा के आधार पर होने वाले सामाजिक विभाजन से ऊपर उठने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत की शक्ति उसकी एकता में निहित है और शिक्षक समाज को नई पीढ़ी में समरसता, कर्तव्यबोध तथा राष्ट्रनिष्ठा के संस्कार विकसित करने होंगे।

पर्यावरण संरक्षण को भी राष्ट्र निर्माण से जोड़ते हुए योगी आदित्यनाथ ने यज्ञ के ‘इदम् न मम’ भाव की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि सूर्य, वृक्ष और गंगा किसी के साथ भेदभाव नहीं करते; प्रकृति से जितना लिया जाए, उससे अधिक उसके संरक्षण के लिए समर्पित करने की भावना विकसित करनी होगी। उन्होंने प्रदेश में वर्ष 2017 से 2026 तक हुए पौधरोपण अभियानों का उल्लेख करते हुए नदियों के संरक्षण और पुनर्जीवन को भी आवश्यक बताया।

धर्म और विज्ञान के समन्वय की चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री ने देव संस्कृति विश्वविद्यालय तथा शान्तिकुञ्ज के प्रति कुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने धर्म को विज्ञान से पृथक नहीं माना, बल्कि दोनों के समन्वय की दृष्टि प्रस्तुत की। उन्होंने डॉ. प्रणव पण्ड्या के मार्गदर्शन में गायत्री परिवार से अगले सौ वर्षों के लिए व्यापक लक्ष्य निर्धारित करने का आह्वान किया, ताकि भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना का प्रकाश विश्व मानवता तक पहुंचे।

कार्यक्रम में विधान परिषद सदस्य डॉ. महेंद्र सिंह तथा जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए। दोनों ने शिक्षक समाज की भूमिका, भारतीय संस्कृति, सामाजिक चेतना और राष्ट्रहित के व्यापक संदर्भों को रेखांकित किया। कार्यक्रम में उपस्थित अन्य गणमान्यजनों, शिक्षकों और गायत्री परिवार के पदाधिकारियों ने भी कार्यशाला के उद्देश्य को सार्थक बनाने में सहभागिता की।
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 2047 का भारत केवल आर्थिक रूप से विकसित राष्ट्र नहीं, बल्कि अपनी विरासत पर गौरव करने वाला, सामाजिक रूप से समरस, कर्तव्यनिष्ठ और सांस्कृतिक चेतना से संपन्न भारत होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अधिकारों से अधिक कर्तव्यों को महत्व देने वाला प्रत्येक नागरिक राष्ट्र निर्माण का सहभागी बन सकता है। उनका आह्वान था कि शिक्षक नई पीढ़ी के भीतर ऐसी चेतना जगाएं, जिसमें ‘मैं’ से पहले ‘राष्ट्र’ और ‘स्वार्थ’ से पहले ‘समर्पण’ का भाव हो।
मुख्यमंत्री के संबोधन का मूल संदेश इसी संकल्प में संकेंद्रित रहा कि शिक्षक ज्ञान का संवाहक भर नहीं, बल्कि युग-निर्माण का शिल्पी है। पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की तपःपरम्परा से प्रेरणा लेकर यदि शिक्षक नई पीढ़ी को संस्कार, कर्तव्य और राष्ट्रनिष्ठा से जोड़ते हैं, तो 2047 का भारत केवल विकसित नहीं, बल्कि अपनी सनातन चेतना से आलोकित और विश्व का मार्गदर्शन करने वाला भारत बन सकता है।