संस्कृत को दैनिक व्यवहार की भाषा बनाने की पहल; 22 कर्मचारियों ने लिया सहभागिता का संकल्प, भारतीय ज्ञान-विरासत को मूल भाषिक परंपरा के माध्यम से समझने पर जोर
दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली। भारतीय ज्ञान परंपरा की जीवंतता को उसकी मूल भाषिक चेतना से जोड़ने की दिशा में राजधानी में एक महत्वपूर्ण पहल हुई है। भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) एवं संस्कृतभारती दिल्ली के संयुक्त तत्त्वावधान में भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र में संस्कृत संभाषण शिविर का शुभारंभ हुआ। संस्कृत को केवल शास्त्रीय अध्ययन की भाषा न मानकर दैनिक व्यवहार और सहज संवाद का माध्यम बनाने की इस पहल में केंद्र के 22 कर्मचारियों ने सहभागिता की। आयोजन की विशेषता यह रही कि भाषा-अभ्यास को भारतीय ज्ञान-विरासत के व्यापक संदर्भ से जोड़ा गया।
वसंत जनपद, रामकृष्ण पुरम विभाग, संस्कृतभारती देहली के सहयोग से आरंभ हुए शिविर के उद्घाटन कार्यक्रम की अध्यक्षता भारतीय ज्ञान परंपरा के राष्ट्रीय संयोजक एवं IIT इंदौर के प्रो. घण्टी मूर्ति ने की। एनसीईआरटी के भाषा शिक्षा विभाग के सहायक आचार्य एवं संस्कृतभारती देहली के प्रांत कार्यालय कोष प्रमुख डॉ. देवकीनंदन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। विद्वानों और प्रतिभागियों की इस सहभागिता ने शिविर को केवल भाषायी प्रशिक्षण तक सीमित न रखकर ज्ञान और भाषा के अंतर्संबंध पर केंद्रित संवाद का स्वरूप दिया।
कार्यक्रम में संस्कृत के महत्व तथा भारतीय ज्ञान परंपरा में उसकी भूमिका पर विमर्श हुआ। वक्ताओं ने संस्कृत को भारत की साहित्यिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक ज्ञान-संपदा तक पहुंचने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। भारतीय चिंतन की अनेक धाराओं में संस्कृत की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करते हुए यह भी स्पष्ट किया गया कि किसी भाषा की वास्तविक शक्ति उसके जीवंत प्रयोग में निहित होती है। यही विचार शिविर की आगे की प्रशिक्षण-योजना का आधार बनेगा।
इसी उद्देश्य से शिविर में प्रतिभागियों को सरल, सहज और व्यवहारोपयोगी संस्कृत संभाषण का अभ्यास कराया जाएगा। दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाले संवादों और सामान्य अभिव्यक्तियों के माध्यम से संस्कृत बोलने का आत्मविश्वास विकसित किया जाएगा, ताकि भाषा पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रहे। इसके साथ भारतीय ज्ञान परंपरा से संबद्ध विविध विषयों को संस्कृत के माध्यम से समझने और आत्मसात करने का अवसर भी मिलेगा।
इस पहल का व्यापक आशय भाषा-शिक्षण से आगे जाता है। संस्कृत के व्यवहारिक प्रयोग को बढ़ावा देकर भारतीय ज्ञान परंपरा के उन स्रोतों से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है, जिनमें भारत के दर्शन, साहित्य, विज्ञान और सांस्कृतिक चिंतन की दीर्घ परंपरा संचित है। इस दृष्टि से संभाषण शिविर भाषा के पुनर्प्रयोग के साथ ज्ञान-विरासत के पुनर्संप्रेषण का भी माध्यम बनने की दिशा में अग्रसर है।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित प्रतिभागियों ने संस्कृत के अध्ययन तथा दैनिक व्यवहार में उसके अधिकाधिक प्रयोग का संकल्प लिया। आयोजन ने यह संदेश स्पष्ट किया कि संस्कृत की प्रासंगिकता केवल अतीत की धरोहर के रूप में नहीं, बल्कि वर्तमान में संवाद और ज्ञान-अभिव्यक्ति की समर्थ भाषा के रूप में भी बनी हुई है। शिविर इसी चेतना को व्यवहार में परिणत करने का प्रयास है।