जिसके साथ सोते हैं, उसे चुनने से पहले स्वयं को पहचाना!
दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ । मनुष्य के जीवन में कुछ अनुभव क्षणभर में घटित होते हैं, किंतु उनकी प्रतिध्वनि लंबे समय तक मन की गहराइयों में सुनाई देती रहती है। संभोग भी ऐसा ही एक अनुभव है। यह शरीर की निकटता से आरंभ हो सकता है, लेकिन इसके साथ विश्वास, आकांक्षाएँ, संवेदनाएँ और भावनात्मक अपेक्षाएँ भी जुड़ सकती हैं। इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं कि आप किसके साथ संभोग कर रहे हैं; प्रश्न यह भी है कि उस निकटता के माध्यम से आप अपने जीवन में किसे स्थान दे रहे हैं और अपने अंतर्मन का कितना अंश उसके सामने उद्घाटित कर रहे हैं।
शरीर की निकटता सहज हो सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति के मन, स्वभाव, संस्कार और जीवन-दृष्टि को समझना एक गहरी प्रक्रिया है। आकर्षण की तीव्रता में मनुष्य प्रायः वही देखता है, जो उसे प्रिय लगता है। उसकी दृष्टि उन संकेतों से भी विमुख हो सकती है, जिन्हें सामान्य परिस्थितियों में वह आसानी से पहचान लेता। यही वह क्षण है, जब इच्छा और विवेक के बीच संघर्ष आरंभ होता है। इच्छा वर्तमान का सुख दिखाती है; विवेक उस सुख के साथ जुड़ी संभावनाओं, उत्तरदायित्वों और परिणामों को भी देखने की क्षमता देता है।
संभोग का संबंध प्रजनन से भी है, यद्यपि प्रत्येक अंतरंग संबंध का उद्देश्य संतानोत्पत्ति नहीं होता। फिर भी स्वयं से कुछ प्रश्न पूछना आवश्यक है—क्या जिस व्यक्ति के साथ आप इतनी निजी निकटता स्थापित कर रहे हैं, उसके साथ उत्तरदायित्व बाँटने की आपकी तत्परता भी है? यदि गर्भधारण की संभावना उत्पन्न हो जाए, तो क्या आप दोनों उस परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार हैं? यदि संबंध केवल वर्तमान के आकर्षण तक सीमित है, तो क्या यह बात दोनों के बीच स्पष्ट है? इन प्रश्नों का उद्देश्य किसी की स्वतंत्रता को सीमित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि स्वतंत्रता का उपयोग विवेक और उत्तरदायित्व के साथ हो।
लेकिन इस विषय का सबसे गहरा पक्ष भविष्य की जिम्मेदारियों से भी आगे जाता है। अनेक बार मनुष्य किसी संबंध में प्रेम के कारण नहीं, बल्कि अकेलेपन के भय से बना रहता है। उसे आशंका होती है कि यदि यह व्यक्ति उसके जीवन से चला गया, तो उसके पास कोई नहीं बचेगा। इसी भय में वह उस संबंध को भी स्वीकार करता रहता है, जिसमें उसका सम्मान घट रहा हो, मन अशांत हो और आत्मविश्वास धीरे-धीरे क्षीण पड़ रहा हो। वह संबंध को बचाने में इतना व्यस्त हो जाता है कि स्वयं को बचाने का प्रश्न ही भूल जाता है।
ऐसे समय में स्वयं से एक प्रश्न पूछिए—क्या मैं इस व्यक्ति को इसलिए चुन रहा हूँ कि उसके साथ मेरा जीवन अधिक सार्थक बनता है, या इसलिए कि उसके बिना रहने का साहस मुझमें नहीं है? इस प्रश्न का उत्तर कभी-कभी पीड़ादायक हो सकता है। मनुष्य अपनी विवशता को प्रेम और अपने भय को समर्पण का नाम दे सकता है। किंतु आत्मबोध की शुरुआत उसी क्षण होती है, जब वह अपने मन को बहलाने के बजाय उसके सामने सत्य स्वीकार करने का साहस जुटाता है।
संभोग के साथ भावनात्मक लगाव उत्पन्न हो सकता है, परंतु प्रत्येक व्यक्ति का अनुभव समान नहीं होता। किसी के लिए शारीरिक निकटता प्रेम और प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति होती है, तो किसी के लिए वह एक निजी अनुभव भर हो सकती है। कठिनाई तब जन्म लेती है, जब एक व्यक्ति उस निकटता को स्थायी संबंध का संकेत मान लेता है और दूसरा उसे क्षणिक आकर्षण समझकर आगे बढ़ जाता है। अनुभव साझा होने पर भी उसकी व्याख्या समान हो, यह आवश्यक नहीं। इसीलिए स्पष्ट संवाद के अभाव में निकटता कभी-कभी आत्मीयता के स्थान पर भ्रम और पीड़ा को जन्म दे सकती है।
आधुनिक मनोविज्ञान इस बात को समझने में सहायता करता है कि मनुष्य के संबंधों पर उसकी पूर्व स्मृतियाँ, भावनात्मक आवश्यकताएँ, विश्वास और असुरक्षाएँ प्रभाव डाल सकती हैं। जिन लोगों ने पहले अस्वीकृति, छल या उपेक्षा का अनुभव किया हो, वे कभी-कभी नए संबंधों में भी उसी प्रकार की आशंका लेकर प्रवेश करते हैं। दूसरी ओर, सुरक्षित और सम्मानपूर्ण संबंध व्यक्ति को भरोसा विकसित करने का अवसर दे सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि अतीत ही भविष्य निर्धारित करता है; बल्कि यह कि अपने अनुभवों को समझकर व्यक्ति अपने वर्तमान निर्णयों को अधिक सजग बना सकता है।
इसीलिए किसी के साथ अंतरंग होने से पहले यह समझना आवश्यक है कि आपके बीच केवल आकर्षण है या विश्वास भी; केवल इच्छा है या उत्तरदायित्व भी; केवल निकटता है या एक-दूसरे की भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता भी। क्या सामने वाला आपकी असहमति का सम्मान करता है? क्या वह आपकी सीमाओं को समझता है? क्या उसके शब्द और व्यवहार एक-दूसरे के अनुरूप हैं? किसी व्यक्ति का चरित्र केवल उसके द्वारा किए गए वादों से नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों में किए गए व्यवहार से भी प्रकट होता है, जहाँ उसे आपकी इच्छा का सम्मान करने के लिए अपनी इच्छा पर विराम लगाना पड़े।
आध्यात्मिक दृष्टि से मनुष्य की गरिमा इस बात में नहीं कि वह अपनी प्रत्येक इच्छा पूरी कर ले, बल्कि इसमें है कि वह अपनी इच्छाओं को पहचानते हुए उनके प्रति विवेकपूर्ण निर्णय ले सके। भारतीय दर्शन में आत्मसंयम को आत्मविकास का महत्त्वपूर्ण साधन माना गया है। इसका आशय शरीर को अपवित्र समझना या कामेच्छा को स्वभावतः अनुचित ठहराना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है अपनी प्रवृत्तियों को समझना, उनके प्रभाव में विवेक न खोना और अपने आचरण को उन मूल्यों के अनुरूप रखना, जिन्हें मनुष्य अपने जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण मानता है।
आत्मसंयम और दमन में अंतर है। दमन में व्यक्ति किसी भावना को समझे बिना उससे संघर्ष करता है; संयम में वह उस भावना को पहचानकर उसके अनुसार आचरण करने का विवेकपूर्ण निर्णय लेता है। कामेच्छा स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति है, लेकिन प्रत्येक इच्छा का तत्काल अनुसरण करना आवश्यक नहीं। मनुष्य की स्वतंत्रता केवल अपनी इच्छा पूरी कर लेने में नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उसे स्थगित करने या अस्वीकार करने की क्षमता में भी निहित है। जिस व्यक्ति के पास ‘हाँ’ कहने की स्वतंत्रता है, उसके लिए विवेकपूर्वक ‘नहीं’ कह सकना भी उतना ही आवश्यक है।
आध्यात्मिक परंपराएँ मनुष्य को अपने भीतर उठने वाली इच्छाओं और प्रतिक्रियाओं का साक्षी बनने की प्रेरणा देती हैं। ध्यान का एक महत्त्वपूर्ण अभ्यास यही है कि व्यक्ति विचार को विचार के रूप में, भावना को भावना के रूप में और इच्छा को इच्छा के रूप में पहचान सके—बिना तत्काल उसके अधीन हुए। जब मनुष्य अपने भीतर उठने वाले प्रत्येक आवेग को आदेश समझना छोड़ देता है, तब उसके सामने चुनाव की संभावना खुलती है। यही सजगता आत्मसंयम को केवल उपदेश नहीं रहने देती, बल्कि उसे व्यवहार में उतारने का मार्ग बनाती है।
विज्ञान की दृष्टि से भी अंतरंग संबंधों का प्रभाव समझने योग्य है। आकर्षण, स्पर्श, यौन अनुभव और भावनात्मक निकटता मस्तिष्क की पुरस्कार-प्रणाली तथा सामाजिक जुड़ाव से संबंधित प्रक्रियाओं के साथ अंतःक्रिया कर सकते हैं। डोपामिन जैसे तंत्रिका-संदेशवाहक प्रेरणा और पुरस्कार से जुड़ी प्रक्रियाओं में भूमिका निभाते हैं, जबकि ऑक्सीटोसिन जैसे हार्मोन सामाजिक बंधन और अन्य शारीरिक प्रक्रियाओं में भाग लेते हैं। लेकिन इन जैविक प्रक्रियाओं को सरल सूत्र में बाँधकर यह कहना उचित नहीं कि कोई एक हार्मोन प्रेम पैदा करता है या संभोग हर व्यक्ति को अनिवार्य रूप से भावनात्मक रूप से बाँध देता है। मानवीय संबंधों पर जैविक प्रक्रियाओं के साथ व्यक्तिगत अनुभव, परिस्थिति, अपेक्षाएँ और सामाजिक परिवेश भी प्रभाव डालते हैं।
इसी प्रकार यह दावा करना भी वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा कि संभोग के दौरान दूसरे व्यक्ति की आत्मा, उसके समस्त मानसिक घाव अथवा कोई अदृश्य ऊर्जा अनिवार्य रूप से हमारे भीतर स्थानांतरित हो जाती है। ऐसी धारणाएँ कुछ आध्यात्मिक व्याख्याओं में मिल सकती हैं, लेकिन उन्हें स्थापित वैज्ञानिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। फिर भी एक व्यावहारिक सत्य स्पष्ट है—अंतरंग अनुभव हमारी स्मृतियों, भावनाओं, आत्मधारणा और भविष्य के संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं। इसीलिए किसी संबंध में प्रवेश करते समय सजगता आवश्यक है; भय या अंधविश्वास के कारण नहीं, बल्कि अपने अनुभवों और उनके संभावित प्रभावों को समझने के लिए।
अब प्रश्न यह है कि मनुष्य अपनी इच्छाओं के सामने विवेक को कैसे सुरक्षित रखे। इसका उत्तर केवल विचारों में नहीं, दैनिक जीवन के अभ्यास में भी छिपा है। जब कोई इच्छा अत्यंत प्रबल हो, तो तत्काल निर्णय लेने के बजाय स्वयं को कुछ समय दीजिए। अपने आप से पूछिए—क्या मैं यह निर्णय स्वतंत्र इच्छा से ले रहा हूँ, अथवा तनाव, अकेलेपन, अस्वीकृति के भय या किसी को प्रभावित करने की चाह से? क्या यह निर्णय मेरे मूल्यों के अनुरूप है? क्या इसके परिणामों को स्वीकार करने की तैयारी मुझमें है? यह विराम इच्छा को नकारने के लिए नहीं, बल्कि उसके प्रभाव में विवेक खोने से बचने के लिए है।
अपने जीवन की उन परिस्थितियों को पहचानिए, जिनमें आप बार-बार ऐसे निर्णय लेते हैं, जिन पर बाद में पछतावा होता है। पर्याप्त नींद, नियमित शारीरिक गतिविधि, सार्थक कार्य, स्वस्थ सामाजिक संबंध और ध्यान मनोवैज्ञानिक संतुलन बनाए रखने में सहायता कर सकते हैं। यदि अकेलापन या तनाव आपको बार-बार आवेगपूर्ण निर्णयों की ओर ले जाता है, तो केवल इच्छाशक्ति पर निर्भर रहने के बजाय अपनी दिनचर्या और वातावरण को भी व्यवस्थित कीजिए। अपने समय, डिजिटल व्यवहार और व्यक्तिगत सीमाओं के प्रति सजग होना आत्मसंयम को व्यवहार में उतारने का व्यावहारिक मार्ग है।
ध्यान का अभ्यास भी इसी दिशा में सहायक हो सकता है। प्रतिदिन कुछ समय शांत बैठकर अपने विचारों और भावनाओं को बिना तत्काल प्रतिक्रिया दिए देखिए। आकर्षण उत्पन्न हो, तो उसे पहचानिए; अकेलापन आए, तो उसे स्वीकारिए; किसी संबंध की इच्छा हो, तो उसके पीछे छिपी आवश्यकता को समझिए। प्रत्येक भावना पर तुरंत कर्म करना आवश्यक नहीं। इच्छा और निर्णय के बीच का सजग अंतराल व्यक्ति को अपने व्यवहार का चुनाव करने का अवसर देता है। यह अभ्यास इच्छाओं को समाप्त करने का वादा नहीं करता, लेकिन उनके सामने अधिक स्पष्टता से निर्णय लेने में सहायता कर सकता है।
आत्मसंयम का अर्थ अपने शरीर को दंडित करना या भावनाओं को दबाना नहीं, बल्कि स्वयं और दूसरे व्यक्ति के प्रति उत्तरदायी होना है। यदि किसी संबंध में आपकी सीमाओं की निरंतर उपेक्षा होती है, आपको अपमानित किया जाता है या आपकी इच्छा के विरुद्ध किसी कार्य के लिए विवश किया जाता है, तो केवल संबंध बचाने के लिए पीड़ा सहते रहना प्रेम नहीं है। अपनी बात स्पष्ट करना, सहायता माँगना और आवश्यकता पड़ने पर संबंध से बाहर निकलना आत्मसम्मान के रूप हैं। इसी प्रकार, अंतरंग संबंधों में स्पष्ट और स्वतंत्र सहमति, सुरक्षित यौन व्यवहार, गर्भनिरोध तथा यौन संचारित संक्रमणों से बचाव के विषय में जानकारी रखना भी जिम्मेदार जीवन का आवश्यक पक्ष है। आध्यात्मिकता का अर्थ वास्तविक जीवन के जोखिमों से आँखें मूँद लेना नहीं, बल्कि सजगता के साथ उनका सामना करना है।
यह संदेश किसी एक पीढ़ी, किसी एक लिंग या किसी विशेष जीवनशैली के लिए नहीं है। युवा हों या प्रौढ़, स्त्री हों या पुरुष, कलाकार हों या जनप्रतिनिधि, आध्यात्मिक साधक हों या सामान्य गृहस्थ—हर व्यक्ति के सामने इच्छा, आकर्षण और आत्मसम्मान के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती आ सकती है। धन, पद और प्रसिद्धि बाहरी पहचान दे सकते हैं, किंतु वे अंतर्मन की शांति का स्थान नहीं ले सकते। जीवन की वास्तविक समृद्धि इस बात में भी प्रकट होती है कि व्यक्ति अपने संबंधों में कितना ईमानदार है, दूसरे की गरिमा का कितना सम्मान करता है और कठिन परिस्थितियों में अपने विवेक को कितना सुरक्षित रख पाता है।
यहीं ‘संभोग से समाधि तक’ की अवधारणा को उसके व्यापक आध्यात्मिक अर्थ में समझना चाहिए। इसका आशय यह नहीं कि संभोग अपने आप समाधि तक पहुँचा देता है। समाधि भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में गहन साधना और चेतना की विशिष्ट अवस्था से जुड़ी अवधारणा है; उसकी व्याख्या विभिन्न परंपराओं में भिन्न हो सकती है। यहाँ यह शीर्षक देहबोध से आत्मबोध की यात्रा का रूपक है—एक ऐसी यात्रा, जिसमें मनुष्य अपनी सहज इच्छाओं को समझता है, संबंधों में सजगता विकसित करता है और बाहरी आकर्षण के पार अपने भीतर स्थिरता खोजने का प्रयास करता है।
इस यात्रा का अर्थ संसार का निषेध नहीं, बल्कि संसार के बीच रहते हुए अपने विवेक को जागृत रखना है। प्रेम की सार्थकता केवल निकटता में नहीं, बल्कि उस निकटता में सुरक्षित सम्मान, विश्वास और उत्तरदायित्व में भी है। किसी के साथ सोने से पहले स्वयं से पूछिए कि आप उस व्यक्ति के साथ किस प्रकार का संबंध चाहते हैं; क्या आप दोनों अपनी अपेक्षाओं के विषय में ईमानदार हैं; और क्या एक-दूसरे की स्वतंत्रता तथा सीमाओं का सम्मान कर सकते हैं? यदि उत्तर स्पष्ट नहीं है, तो ठहर जाना दुर्बलता नहीं। कभी-कभी प्रतीक्षा करना उस निर्णय से अधिक साहसपूर्ण होता है, जिसे हम केवल इच्छा की तीव्रता में लेना चाहते हैं।
अंततः मनुष्य की उपलब्धि केवल यह नहीं कि कितने लोग उसके निकट आए, बल्कि यह भी है कि उन संबंधों के बीच उसने अपने विवेक, आत्मसम्मान और संवेदनशीलता को कितना सुरक्षित रखा। संभोग शरीर की निकटता का अनुभव हो सकता है; प्रेम उस निकटता को अर्थ दे सकता है; और आत्मबोध मनुष्य को अपनी इच्छाओं तथा जीवन-मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करना सिखा सकता है। इन तीनों को समझने के लिए न शरीर को तिरस्कृत करना आवश्यक है, न इच्छा को सर्वोच्च मान लेना। आवश्यकता है सजगता, ईमानदारी और विवेक की।
स्वयं को खोकर किसी को पा लेना उपलब्धि नहीं; स्वयं को समझते हुए किसी के साथ जीवन बाँटना अधिक गहरी उपलब्धि है। अपने शरीर का सम्मान कीजिए, अपनी भावनाओं को समझिए और दूसरे व्यक्ति की गरिमा को उतना ही महत्त्व दीजिए, जितना अपने सम्मान को देते हैं। ऐसा प्रेम चुनिए, जिसमें भय से अधिक विश्वास हो; ऐसी निकटता चुनिए, जिसमें दबाव से अधिक सहमति हो; और ऐसे निर्णय लीजिए, जिनके परिणामों को स्वीकार करने का साहस भी आपमें हो।
क्योंकि जीवन का वास्तविक प्रश्न यह नहीं कि आपने अपनी इच्छाओं को कितनी बार पूरा किया, बल्कि यह है कि उन इच्छाओं के बीच आपने स्वयं को कितना पहचाना। आत्मसंयम सुख का निषेध नहीं, विवेकपूर्ण सुख की साधना है; प्रेम आत्मविस्मृति नहीं, परस्पर सम्मान का विस्तार है; और आत्मबोध संसार से दूर जाना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए अपने अंतर्मन से जुड़े रहना है। यही देहबोध से आत्मबोध की यात्रा का सार है।