
वायुसेना दिवस पर संस्कृतभारती के पूर्वी क्षेत्र सम्पर्कप्रमुख की भावी वायुसेना प्रमुख से शिष्टाचार भेंट; विमानों, कार्यालयों और प्रेरक अभिलेखों में संस्कृत को स्थान देने की पहल

दैनिक इंडिया न्यूज़, 8 OCT 2026 नई दिल्ली।भारतीय वायुसेना की सामरिक अभिव्यक्ति में संस्कृत की संभावित उपस्थिति का प्रस्ताव सामने आया है। वायुसेना दिवस के अवसर पर संस्कृतभारती के पूर्वी क्षेत्र सम्पर्कप्रमुख जितेंद्र प्रताप सिंह ने दिल्ली स्थित वायुसेना के भावी प्रमुख एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित से शिष्टाचार भेंट कर युद्धक विमानों, कार्यालयों, कार्यशालाओं तथा प्रेरक अभिलेखों में संस्कृत को स्थान देने का आग्रह किया। इस अवसर पर उन्होंने पुष्पगुच्छ एवं प्रथम दिवस आवरण भेंट कर उन्हें भावी दायित्व के लिए शुभकामनाएं दीं।

भेंट के दौरान जितेंद्र प्रताप सिंह ने सुझाव रखा कि भारतीय वायुसेना के युद्धक विमानों और अन्य सैन्य परिसंपत्तियों पर संस्कृत के सारगर्भित ध्येय-वाक्य, प्रेरक सूक्तियां अथवा राष्ट्रचेतना से अनुप्राणित संदेश अंकित किए जा सकते हैं। इसी क्रम में वायुसेना के कार्यालयों, प्रशिक्षण संस्थानों और कार्यशालाओं में भी संस्कृत के चयनित वाक्यों एवं अभिलेखों को स्थान देने की संभावनाओं पर विचार किया जाए। उनके अनुसार इसका उद्देश्य किसी परंपरा को आरोपित करना नहीं, बल्कि आधुनिक सैन्य सामर्थ्य के साथ भारत की चिरंतन ज्ञान-परंपरा की प्रतीकात्मक और प्रेरणात्मक उपस्थिति को प्रतिष्ठित करना है।
यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि संस्कृत केवल प्राचीन ग्रंथों की भाषा नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन, व्याकरण, न्याय, आयुर्विज्ञान, गणित, साहित्य और ज्ञान-विज्ञान की दीर्घकालिक बौद्धिक परंपरा की संवाहिका रही है। ऐसे में सैन्य संस्थानों में उसके चयनित सूक्तियों और ध्येय-वाक्यों का प्रयोग राष्ट्रीय स्वत्व, अनुशासन, कर्तव्यबोध और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को अभिव्यक्त करने का एक अभिनव माध्यम बन सकता है। प्रस्ताव के केंद्र में यही विचार है कि भारत की सामरिक आधुनिकता अपनी सभ्यतागत स्मृति से विच्छिन्न न होकर उसी से ऊर्जा ग्रहण करे।
एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित के संदर्भ में यह भेंट विशेष महत्व रखती है। भारत सरकार ने उन्हें भारतीय वायुसेना के 29वें प्रमुख के रूप में नियुक्त किया है और वह 31 अक्टूबर 2026 की दोपहर से वायुसेना प्रमुख का पदभार ग्रहण करेंगे। वर्तमान में वह एयर मार्शल के पद पर वायुसेना के उपप्रमुख हैं। अतः जितेंद्र प्रताप सिंह द्वारा रखा गया संस्कृत के प्रयोग का यह विचार फिलहाल एक प्रस्ताव और आग्रह है; इसे वायुसेना का स्वीकृत निर्णय, आदेश अथवा आधिकारिक नीति नहीं माना जा सकता।
एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित का सैन्य अनुभव भी व्यापक रहा है। 6 दिसंबर 1986 को भारतीय वायुसेना की फाइटर स्ट्रीम में कमीशन प्राप्त करने के बाद उन्होंने विभिन्न महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया है। उन्हें 3,500 से अधिक घंटे की उड़ान का अनुभव है और उन्होंने मिराज-2000, मिग श्रेणी के विभिन्न विमानों, जगुआर, किरण, हॉक, आईएल-78 तथा तेजस जैसे विमानों पर सेवाएं दी हैं। वह ऑपरेशन सफेद सागर, ऑपरेशन रक्षक सहित अनेक महत्वपूर्ण अभियानों और सैन्य गतिविधियों से जुड़े रहे हैं तथा केंद्रीय वायु कमान के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ और चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ जैसे महत्वपूर्ण दायित्व भी संभाल चुके हैं।
संस्कृतभारती की ओर से रखा गया यह प्रस्ताव वस्तुतः भाषा के विस्तार से कहीं व्यापक विमर्श की ओर संकेत करता है। प्रश्न केवल इतना नहीं है कि किसी विमान पर संस्कृत में कोई सूक्ति अंकित हो; प्रश्न यह भी है कि क्या भारत की प्राचीन ज्ञान-संपदा आधुनिक राष्ट्रीय संस्थाओं की दृश्य और वैचारिक अभिव्यक्ति का हिस्सा बन सकती है। यदि भविष्य में सक्षम प्राधिकारी इस विचार पर विचार करते हैं और किसी स्तर पर इसे स्वीकृति मिलती है, तभी यह प्रस्ताव संस्थागत स्वरूप ग्रहण करेगा।
आकाश में भारत की सामरिक शक्ति का प्रदर्शन करने वाले विमानों के साथ यदि कभी संस्कृत का कोई ध्येय-वाक्य भी दिखाई देता है, तो वह किसी तत्काल लिए गए निर्णय का परिणाम नहीं, बल्कि आज रखे गए ऐसे विचार की संभावित परिणति होगी, जिसमें आधुनिक भारत की गति और उसकी चिरंतन सभ्यतागत चेतना को एक-दूसरे का पूरक बनाने की आकांक्षा निहित है।