लंदन की चमक से लेकर उत्तर प्रदेश की धरती तक, प्रशासनिक दायित्व से स्वतंत्र राजनीतिक यात्रा तक—दिव्या मित्तल का निर्णय केवल व्यक्तिगत परिवर्तन नहीं, बल्कि उस बड़े प्रश्न को सामने रखता है कि जब व्यवस्था में साधन मौजूद हों, फिर भी सामान्य नागरिक की समस्या क्यों अनसुलझी रह जाती है?
दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दिल्ली। किसी प्रशासनिक अधिकारी का पद छोड़कर राजनीति में प्रवेश करना अपने आप में असाधारण घटना नहीं है; भारतीय लोकतंत्र में नौकरशाही और राजनीति के बीच अनेक लोगों ने मार्ग बदला है। किंतु कुछ यात्राएं इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती हैं क्योंकि उनके साथ केवल पद परिवर्तन नहीं, बल्कि अनुभवों का एक लंबा संचय जुड़ा होता है। पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल का वर्तमान निर्णय इसी कारण चर्चा के केंद्र में है। 29 सितंबर 2026 को जारी अपने वीडियो संदेश में उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश उनकी कर्मभूमि है और वे स्वतंत्र रूप से राजनीतिक यात्रा आरंभ करना चाहती हैं। उनका कहना है कि प्रशासनिक जीवन में उन्होंने बार-बार ऐसी परिस्थितियां देखीं, जहां स्वीकृति, धन और नियम मौजूद होने के बावजूद जनता की समस्या का समाधान नहीं हुआ।
लेकिन इस घोषणा को समझने के लिए केवल आज के राजनीतिक वक्तव्य को सुनना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे उस जीवन-यात्रा को देखना होगा, जिसमें रेवाड़ी के सामान्य परिवेश से निकलकर आईआईटी दिल्ली और आईआईएम बेंगलुरु तक पहुंचना, लंदन में जेपी मॉर्गन जैसी वैश्विक वित्तीय संस्था में काम करना और फिर उस स्थापित पेशेवर जीवन को छोड़कर भारत लौटना शामिल है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई आईआईटी दिल्ली से और प्रबंधन शिक्षा आईआईएम बेंगलुरु से प्राप्त की तथा लंदन में काम करने के बाद सिविल सेवा का मार्ग चुना।
यहीं उनकी कहानी का पहला महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता है—जिस व्यक्ति के सामने व्यक्तिगत समृद्धि और अंतरराष्ट्रीय पेशेवर जीवन का रास्ता खुला हो, वह प्रशासनिक सेवा की कठिन, अनिश्चित और उत्तरदायित्वपूर्ण दुनिया क्यों चुने? इसका उत्तर स्वयं उनके पुराने सार्वजनिक वक्तव्यों में मिलता है। उन्होंने अपनी यात्रा को केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों की श्रृंखला के रूप में नहीं, बल्कि अपने देश और समाज के प्रति किसी अधूरे दायित्व की अनुभूति से जोड़कर देखा है। यही भाव उनके 13 वर्ष के प्रशासनिक जीवन की व्याख्या करने में भी उपयोगी है।
वर्ष 2013 बैच की उत्तर प्रदेश कैडर की अधिकारी के रूप में उन्होंने विभिन्न प्रशासनिक दायित्व निभाए और संत कबीर नगर, मिर्जापुर तथा देवरिया की जिलाधिकारी रहीं। मिर्जापुर का कार्यकाल विशेष रूप से इसलिए स्मरण किया जाता है क्योंकि लहुरियादह जैसे दुर्गम गांव में पाइप से पेयजल पहुंचाने का कार्य उनके कार्यकाल के दौरान हुआ। भारतीय एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार वहां लंबे समय से लोग टैंकरों पर निर्भर थे और 2023 में पाइप जलापूर्ति पहुंचने के बाद यह कार्य व्यापक सार्वजनिक चर्चा में आया।
किसी गांव में पानी पहुंचना अपने आप में कोई राजनीतिक दर्शन नहीं है; लेकिन जिस गांव में पीढ़ियों से पानी पहुंचने की प्रतीक्षा हो और सरकारी व्यवस्था के पास योजना भी हो, संसाधन भी हों, फिर भी समाधान दूर हो—वह स्थिति शासन की वास्तविक परीक्षा अवश्य बन जाती है। यही वह बिंदु है जहां फाइल और जीवन के बीच का अंतर दिखाई देता है। कागज पर स्वीकृत योजना और जमीन पर बहता हुआ पानी—इन दोनों के बीच की दूरी ही प्रशासन की सफलता या विफलता का वास्तविक पैमाना है।
दिव्या के प्रशासनिक अनुभवों का यही पक्ष उनके वर्तमान राजनीतिक वक्तव्य को अर्थ देता है। अपने नए वीडियो संदेश में उन्होंने ऐसे उदाहरणों का उल्लेख किया जिनमें उनके अनुसार विद्यालय के लिए स्वीकृति और संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद निर्माण आगे नहीं बढ़ा; भूमि के आधिकारिक आवंटन के बावजूद लाभार्थी को वास्तविक कब्जा नहीं मिला; और ग्रामीण अवसंरचना, सड़कों, रोजगार तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक जैसे विषयों पर उन्होंने चिंता व्यक्त की। उन्होंने इन समस्याओं को केवल प्रशासनिक कमियों के रूप में नहीं, बल्कि नीति और क्रियान्वयन के बीच मौजूद उस खाई के रूप में प्रस्तुत किया है, जहां अंततः सबसे कमजोर नागरिक फंस जाता है।
और यहीं से उनका प्रश्न व्यवस्था के एक अधिक गहरे स्तर तक पहुंचता है—यदि कानून है, योजना है, बजट है, अधिकारी हैं और आदेश भी हैं, तो फिर नागरिक को उसका अधिकार प्राप्त करने के लिए इतनी लंबी प्रतीक्षा क्यों करनी पड़ती है?
यह प्रश्न किसी एक अधिकारी, एक सरकार अथवा किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। यह भारतीय लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था के सामने खड़ा वह प्रश्न है, जिसका उत्तर सत्ता बदलने से अधिक कठिन है। शासन की सबसे बड़ी चुनौती कानून बनाना नहीं, बल्कि कानून के लाभ को अंतिम व्यक्ति तक बिना अवरोध पहुंचाना है। इसी कारण दिव्या मित्तल का प्रशासन से राजनीति की ओर जाना तभी सार्थक अर्थ ग्रहण करेगा, जब उनके द्वारा उठाए जा रहे प्रश्न व्यक्तिकेंद्रित राजनीति से आगे निकलकर संस्थागत जवाबदेही का विमर्श बनें।
उनकी कहानी का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष भी यहीं सामने आता है। प्रशासनिक सेवा में रहते हुए अधिकारी के पास अधिकार होता है, लेकिन उसका अधिकार संवैधानिक और विधिक मर्यादाओं से बंधा होता है। राजनीति में पहुंचने के बाद जनप्रतिनिधि के पास जनादेश हो सकता है, पर वहां जवाबदेही का दायरा और व्यापक हो जाता है। अधिकारी के सामने फाइल होती है; राजनेता के सामने मतदाता। अधिकारी आदेश लागू करता है; राजनेता को उस व्यवस्था के निर्माण और दिशा के लिए जनता के बीच जवाब देना पड़ता है। इसलिए आईएएस से राजनीति की यात्रा केवल कुर्सी बदलने का नाम नहीं—यह उत्तरदायित्व की प्रकृति बदलने का निर्णय है।
मित्तल ने अपने इस्तीफे के समय व्यक्तिगत कारणों, पारिवारिक प्राथमिकताओं और जीवन के नए लक्ष्यों का उल्लेख किया था। 15 सितंबर 2026 को उनका इस्तीफा स्वीकार हुआ। उस समय राजनीति में आने को लेकर अटकलें अवश्य चल रही थीं, किंतु अब 29 सितंबर के उनके सार्वजनिक वक्तव्य ने उस अनिश्चितता को समाप्त कर दिया है। उन्होंने किसी मौजूदा राजनीतिक दल से जुड़ने के बजाय नागरिकों के साथ स्वतंत्र राजनीतिक मंच बनाने की बात कही है।
यहां एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा। स्वतंत्र राजनीति की घोषणा करना और स्वतंत्र राजनीति को सफलतापूर्वक संस्थागत रूप देना—दो बिल्कुल अलग अवस्थाएं हैं। पहली घोषणा से प्रारंभ होती है; दूसरी संगठन, विचार, आर्थिक पारदर्शिता, नीतिगत स्पष्टता, स्थानीय नेतृत्व, कार्यकर्ताओं और दीर्घकालिक जनविश्वास से निर्मित होती है। यदि राजनीति को केवल व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द खड़ा किया गया, तो वह भी उसी व्यक्तिकेंद्रित राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन सकती है, जिसकी आलोचना स्वयं दिव्या मित्तल कर रही हैं।
उनका सबसे बड़ा परीक्षण यहीं से प्रारंभ होगा। प्रशासन में रहते हुए किसी समस्या पर कार्रवाई का अधिकार सीमित दायरे में स्पष्ट होता है; राजनीति में प्रवेश के बाद समस्याओं का समाधान केवल प्रशासनिक आदेश से नहीं होता। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, ग्रामीण अवसंरचना, महिला सुरक्षा, कृषि, औद्योगिकीकरण, शहरी नियोजन, परीक्षा प्रणाली और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में रोजगार—इन सभी पर ठोस नीति, वित्तीय संसाधन, विधायी पहल और दीर्घकालिक क्रियान्वयन की आवश्यकता होती है। अपने वीडियो में उन्होंने इनमें से कई प्रश्नों को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाने की बात कही है।
विशेषकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रश्न उल्लेखनीय है। आज राजनीति यदि केवल सड़क, बिजली और पानी तक सीमित रहती है तो वह आने वाले दशक की वास्तविक चुनौतियों से आंखें मूंद लेगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता रोजगार के स्वरूप को बदल रही है, शिक्षा की पद्धति बदल रही है और प्रशासनिक निर्णयों की प्रकृति बदल रही है। ऐसे समय में राजनीति को यह प्रश्न पूछना ही होगा कि तकनीकी परिवर्तन से पैदा होने वाले अवसरों का लाभ किसे मिलेगा और विस्थापन का भार किस पर पड़ेगा। दिव्या मित्तल ने अपने वक्तव्य में युवाओं के रोजगार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रभाव को इसी व्यापक संदर्भ में उठाया है।
लेकिन किसी भी नई राजनीतिक यात्रा के लिए केवल प्रश्न पर्याप्त नहीं होते। प्रश्न जितने कठिन हों, उत्तर उतने ही ठोस होने चाहिए। यदि सड़कें खराब हैं तो सुधार की समयसीमा क्या होगी? यदि विद्यालय स्वीकृत होकर भी नहीं बनते तो उत्तरदायित्व किसका तय होगा? यदि पात्र व्यक्ति को भूमि का कब्जा नहीं मिलता तो कौन-सी संस्थागत व्यवस्था उसे समयबद्ध न्याय देगी? यदि प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक होता है तो परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पुनर्स्थापित करने का तंत्र क्या होगा? और यदि राजनीति में धन तथा जातीय समीकरण निर्णायक माने जाते हैं, तो उनके स्थान पर जनभागीदारी का व्यावहारिक मॉडल क्या होगा?
यही वह कसौटी होगी जिस पर दिव्या मित्तल की राजनीतिक यात्रा को समय परखा करेगा—न कि वे कितनी लोकप्रिय हैं, बल्कि वे जिन समस्याओं की ओर संकेत कर रही हैं, उनके समाधान के लिए कितना स्पष्ट, मापनीय और सार्वजनिक उत्तर प्रस्तुत करती हैं।
उनकी स्वतंत्र राजनीति की घोषणा में एक और बात ध्यान देने योग्य है। उन्होंने कहा है कि उनका उद्देश्य केवल राजनीतिक नेतृत्व बदलना नहीं, बल्कि राजनीति के काम करने के तरीके में परिवर्तन लाना है। यह कथन सुनने में जितना सरल है, व्यवहार में उतना ही दुर्धर्ष। राजनीति की कार्यप्रणाली बदलने का अर्थ होगा उम्मीदवार चयन से लेकर चंदे की पारदर्शिता, जनसंपर्क से लेकर नीतिगत विमर्श, संगठन निर्माण से लेकर निर्वाचित प्रतिनिधियों की जवाबदेही तक प्रत्येक स्तर पर नए मानदंड स्थापित करना।
और शायद यही वह जगह है जहां उत्तर प्रदेश की जनता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। लोकतंत्र में कोई भी नेता जनता का विकल्प नहीं हो सकता और कोई भी जनता किसी नेता की निजी संपत्ति नहीं होती। यदि स्वतंत्र राजनीति की कोई वास्तविक शक्ति है तो वह मतदाता की विवेकशील भागीदारी में है। शिक्षक, किसान, विद्यार्थी, चिकित्सक, श्रमिक, अधिवक्ता, उद्यमी और सामान्य नागरिक—इन सभी को केवल समर्थक बनने के बजाय प्रश्नकर्ता और सहभागी बनना होगा। स्वयं दिव्या मित्तल ने भी अपने संदेश में विभिन्न वर्गों से सामूहिक भागीदारी का आह्वान किया है।
दिव्या मित्तल के लिए भी यह क्षण केवल उत्साह का नहीं, आत्मपरीक्षण का है। प्रशासनिक सेवा ने उन्हें व्यवस्था को भीतर से देखने का अवसर दिया; राजनीति अब उन्हें उसी व्यवस्था के निर्माण में जनता के साथ खड़े होने की चुनौती दे रही है। यहां उनके सामने सबसे कठिन परीक्षा यह होगी कि व्यक्तिगत लोकप्रियता को संस्थागत विश्वसनीयता में कैसे बदला जाए और प्रशासनिक अनुभव को ऐसी सार्वजनिक नीति में कैसे रूपांतरित किया जाए जिसका लाभ उस नागरिक तक पहुंचे, जिसकी आवाज अब तक व्यवस्था के किसी कोने में दब जाती रही है।
लहुरियादह का वह नल इस पूरी यात्रा का एक प्रतीक माना जा सकता है—क्योंकि वहां उपलब्धि किसी भाषण से नहीं, परिणाम से दिखाई दी। राजनीति में भी अंततः भाषण नहीं, परिणाम ही निर्णायक होंगे। जनता को सड़क चाहिए तो सड़क दिखनी चाहिए; विद्यालय चाहिए तो विद्यालय खड़ा होना चाहिए; भूमि का अधिकार चाहिए तो कब्जा मिलना चाहिए; रोजगार चाहिए तो अवसर की संरचना बननी चाहिए; और न्याय चाहिए तो उसकी प्राप्ति समयबद्ध होनी चाहिए।
इसलिए दिव्या मित्तल का राजनीति में प्रवेश न तो केवल किसी पूर्व अधिकारी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए और न ही पहले से किसी निष्कर्ष का प्रमाण मान लिया जाना चाहिए। यह एक सार्वजनिक प्रयोग है—एक ऐसा प्रयोग जिसमें प्रशासनिक अनुभव, जनभागीदारी और स्वतंत्र राजनीतिक संरचना को एक साथ परखा जाना है। इसकी सफलता या असफलता का निर्णय किसी परिचय, पद, प्रशंसा या आलोचना से नहीं, बल्कि समय, नीति और जनविश्वास करेंगे।
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और विविधतापूर्ण प्रदेश में सकारात्मक परिवर्तन की आकांक्षा रखने वाले नागरिकों के लिए असली प्रश्न भी यही है—क्या राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया बनी रहेगी, या वह वास्तव में शासन की गुणवत्ता सुधारने का माध्यम बन सकती है? दिव्या मित्तल ने इस प्रश्न को अपने अनुभवों के आधार पर सार्वजनिक विमर्श में रखा है। अब उत्तर केवल उनके पास नहीं है; उत्तर उस जनता के पास भी है, जो लोकतंत्र में अंतिम निर्णायक शक्ति है।
क्योंकि अंततः लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति अकेले परिवर्तन नहीं करता। एक व्यक्ति प्रश्न उठा सकता है, एक अधिकारी उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है, एक नेता दिशा सुझा सकता है—लेकिन व्यवस्था तभी बदलती है, जब जागरूक नागरिक उस परिवर्तन को अपनी सामूहिक जिम्मेदारी बना लेते हैं।