दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दिल्ली।लोकतंत्र में असहमति अभिव्यक्ति का संवैधानिक अधिकार है, किंतु उसका अधिष्ठान असत्य, उसका माध्यम दुष्प्रचार और उसका अभीष्ट अराजकता का प्रसार नहीं हो सकता।
एक प्रचलित उक्ति है कि युद्ध में सर्वप्रथम सत्य की बलि चढ़ती है। दुर्भाग्यवश, समकालीन राजनीतिक परिदृश्य में यह प्रवृत्ति अब वैचारिक प्रतिद्वंद्विता और सत्ता-संघर्ष का भी अभिन्न अंग बनती दिखाई दे रही है। इस संदर्भ में ‘पोस्ट-ट्रुथ’ अर्थात उत्तर-सत्य का विमर्श सार्वजनिक चेतना को प्रभावित करने वाली एक गंभीर चुनौती के रूप में उभरा है। यह वह परिस्थिति है, जिसमें वस्तुनिष्ठ तथ्यों और प्रमाणसम्मत निष्कर्षों की अपेक्षा भावनात्मक आग्रहों, मनगढ़ंत आख्यानों तथा सुनियोजित भ्रामक धारणाओं को अधिक महत्त्व मिलने लगता है। कभी अकादमिक विमर्श तक सीमित रहने वाली यह प्रवृत्ति आज राजनीतिक संप्रेषण के व्यापक क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी है। मिथ्या सूचनाओं और कपटपूर्ण नैरेटिव के माध्यम से केवल जनमत का प्रक्षालन ही नहीं किया जा रहा, बल्कि अविश्वास, संशय और संस्थागत अवमानना का ऐसा वातावरण भी निर्मित किया जा रहा है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिलाओं को दुर्बल कर सकता है। असत्य का निरंतर पुनरावर्तन अंततः उसे सत्याभास में परिणत कर देता है और तब वास्तविकता का स्वर कृत्रिम आख्यानों के कोलाहल में दबने लगता है।
जब कांग्रेस और विपक्ष के कुछ नेता विवादों के सुनियोजित सृजन, भ्रामक प्रचार तथा अप्रमाणित आरोपों के माध्यम से राजनीतिक वातावरण को उद्वेलित करने का प्रयास करते हैं, तब यह प्रश्न स्वाभाविक हो जाता है कि क्या भारतीय लोकतांत्रिक विमर्श भी उत्तर-सत्य की इसी विकृत प्रवृत्ति से आक्रांत हो रहा है? निस्संदेह, लोकतंत्र में कोई भी संवैधानिक संस्था आलोचनात्मक परीक्षण से परे नहीं है। वैचारिक वैभिन्न्य, नीतिगत प्रतिरोध और सत्तापक्ष से असहमति लोकतांत्रिक जीवन की स्वाभाविक एवं अपरिहार्य विशेषताएं हैं। किंतु इस स्वतंत्रता के साथ एक व्यापक राष्ट्रीय उत्तरदायित्व भी संबद्ध है— दलगत स्वार्थों, व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं और तात्कालिक राजनीतिक लाभों से ऊपर राष्ट्रहित को प्रतिष्ठित करना। यही वह नैतिक अनुबंध है, जिसकी अवहेलना लोकतांत्रिक स्वतंत्रता को उत्तरदायित्वहीनता में परिवर्तित कर सकती है। अतः जब विमर्श की विश्वसनीयता ही प्रश्नांकित होने लगे, तब तथ्यों का निर्भीक प्रतिपादन और सत्य का विवेकसम्मत अन्वेषण अनिवार्य हो जाता है।
विगत कुछ समय से विपक्षी दलों द्वारा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता तथा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाए जाते रहे हैं। वर्ष 2024 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारतीय निर्वाचन आयोग प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने ईवीएम के स्थान पर पुनः मतपत्र प्रणाली लागू करने की मांग स्वीकार नहीं की थी। न्यायालय ने चुनावी प्रक्रिया के संबंध में निराधार आशंकाओं और प्रमाणविहीन संदेहों के आधार पर निष्कर्ष निकालने के प्रति भी सावधान किया था। इसके बावजूद ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला समाप्त नहीं हुआ है। किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावी प्रक्रिया पर प्रश्न उठाना अनुचित नहीं, किंतु प्रश्नों की प्रामाणिकता का निर्धारण साक्ष्यों, तकनीकी परीक्षण और विधिसम्मत प्रक्रिया से होना चाहिए; केवल आशंकाओं की पुनरावृत्ति से नहीं।
यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति में नेता प्रतिपक्ष की भागीदारी का प्रावधान है। दूसरी ओर, मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण भारतीय निर्वाचन व्यवस्था की प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा रहा है। वर्ष 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूचियों की शुद्धता को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की अनिवार्य शर्त के रूप में रेखांकित किया और उनकी सटीकता, पूर्णता तथा अखंडता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग से संबद्ध बताई। ऐसी स्थिति में आवश्यक यह है कि मतदाता सूची संबंधी प्रत्येक शिकायत का परीक्षण पारदर्शी, निष्पक्ष और विधिसम्मत ढंग से हो। किंतु किसी प्रशासनिक प्रक्रिया को बिना पर्याप्त प्रमाण के व्यापक षड्यंत्र का स्वरूप प्रदान करना नागरिकों के मन में अनावश्यक संशय उत्पन्न कर सकता है तथा निर्वाचन जैसी महत्त्वपूर्ण संवैधानिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकता है।
संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और स्वायत्तता के प्रश्न पर कांग्रेस का ऐतिहासिक आचरण भी आलोचनात्मक विमर्श का विषय रहा है। देश में प्रथम आम चुनाव से पूर्व ही संविधान संशोधन के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंधों के दायरे का विस्तार किया गया था। आपातकाल का अध्याय भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में नागरिक स्वतंत्रताओं के दमन और संवैधानिक अधिकारों के संकुचन की गंभीर स्मृति के रूप में अंकित है। इन ऐतिहासिक प्रसंगों से यह प्रश्न उभरता है कि क्या संस्थागत स्वतंत्रता का मूल्यांकन राजनीतिक सुविधा के अनुसार किया जाना चाहिए? लोकतांत्रिक परिपक्वता का वास्तविक परिचायक यही है कि संस्थाओं की निष्पक्षता को उनके निर्णयों की अनुकूलता से नहीं, बल्कि उनकी संवैधानिक प्रतिबद्धता, प्रक्रियागत पारदर्शिता और विधिक निष्पक्षता से परखा जाए।
राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर भी उत्तर-सत्य की प्रवृत्ति के दूरगामी दुष्परिणाम हो सकते हैं। वर्ष 2019 में राफेल प्रकरण के संदर्भ में राहुल गांधी द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का हवाला देते हुए की गई टिप्पणियों पर न्यायालय में स्पष्टीकरण और खेद व्यक्त करने की स्थिति उत्पन्न हुई थी। इसी प्रकार, सीमा संबंधी उनके कुछ वक्तव्यों को लेकर भी राजनीतिक विवाद सामने आए। राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्नों पर सत्ता पक्ष से जवाबदेही की मांग करना विपक्ष का लोकतांत्रिक दायित्व है, किंतु ऐसे मामलों में कथनों की प्रामाणिकता, तथ्यों की शुचिता और प्रमाणों की विश्वसनीयता सर्वोपरि होनी चाहिए। राष्ट्रीय हितों से जुड़े विषयों को राजनीतिक लाभ के लिए अतिरंजित अथवा भ्रामक रूप देना सार्वजनिक विश्वास को क्षति पहुंचा सकता है।
लोकतंत्र में असहमति और अराजकता के मध्य विभाजक रेखा को समझना आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक है। बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में अपने ऐतिहासिक संबोधन के दौरान असंवैधानिक उपायों के स्थान पर संवैधानिक साधनों को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया था। उन्होंने ‘ग्रामर ऑफ अनार्की’ अर्थात अराजकता के व्याकरण के माध्यम से उन प्रवृत्तियों के प्रति आगाह किया था, जो लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक मार्ग उपलब्ध होने के बावजूद अवैधानिक उपायों को प्रोत्साहित करती हैं। उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। असहमति लोकतंत्र की प्राणवायु है, लेकिन जब वह तथ्यहीन आरोपों, संस्थागत अविश्वास और विधि-विरुद्ध आचरण का आवरण बन जाए, तब उसका स्वरूप मूल लोकतांत्रिक भावना से विचलित होने लगता है।
हमारी दृष्टि में जीवंत लोकतंत्र की आधारशिला केवल राजनीतिक समानता नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, आर्थिक न्याय और अवसरों की निष्पक्ष उपलब्धता भी है। शासन की सार्थकता इसी में निहित है कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, नागरिक अधिकार सुरक्षित रहें और प्रत्येक संस्था अपनी संवैधानिक मर्यादा के अनुरूप कार्य करे। असहमति एवं जनचिंताओं का समाधान संवाद, विमर्श, पारदर्शिता और विधिसम्मत प्रक्रियाओं के माध्यम से ही संभव है; अविश्वास के कृत्रिम विस्तार अथवा अराजकता के वातावरण से नहीं।
आज भारत की लोकतांत्रिक यात्रा एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर है, जहां राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व के मध्य संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है। सत्ता की आलोचना लोकतंत्र को दुर्बल नहीं करती; बल्कि तथ्याधारित आलोचना उसे अधिक उत्तरदायी और सुदृढ़ बनाती है। किंतु असत्य के सहारे जनचेतना को भ्रमित करना, संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को निराधार आरोपों से आहत करना और राजनीतिक पराजय की हताशा को राष्ट्रीय विमर्श पर आरोपित करना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रतिकूल है।