वंदे मातरम्’ के स्वाधीनता-संग्राम से जुड़े अध्यायों का उद्घाटन, ‘अवध सम्पदा’ के विशेषांक में इतिहास और राष्ट्रबोध का संगम

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।‘वंदे मातरम्’ की हुंकार ने किस प्रकार औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध भारतीय जनमानस को आंदोलित किया और स्वतंत्रता-संग्राम को वैचारिक ऊर्जा प्रदान की? संस्कृत भारती की पत्रिका ‘अवध सम्पदा’ के ‘वंदे मातरम्’ विशेषांक से संबंधित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्वांतरंजन ने राष्ट्रगीत की ऐतिहासिक यात्रा, उसके राजनीतिक संदर्भों और राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में उसकी भूमिका का सविस्तार विवेचन किया। उनके संबोधन में बंग-भंग आंदोलन से लेकर राष्ट्रगीत को लेकर उत्पन्न वैचारिक मतभेदों तक के ऐसे प्रसंग सामने आए, जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

स्वांतरंजन ने बंग-भंग की ब्रिटिश नीति का उल्लेख करते हुए बताया कि बंगाल विभाजन के विरोध में उठे प्रतिरोध ने ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रवादी चेतना का प्रभावशाली उद्घोष बना दिया। इस गीत ने जनमानस में स्वाधीनता की आकांक्षा को स्वर दिया और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्षरत समाज को प्रेरित किया। वर्ष 1911 में बंग-भंग की समाप्ति का संदर्भ देते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि इस ऐतिहासिक आंदोलन में राष्ट्रभाव, जनप्रतिरोध और सांस्कृतिक अस्मिता का परस्पर गहरा संबंध था।

राष्ट्रचेतना के इसी संस्कारगत पक्ष को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के बाल्यकाल से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख किया। विद्यालयीन जीवन में ‘वंदे मातरम्’ के प्रति उनके समर्पण को रेखांकित करते हुए स्वांतरंजन ने बताया कि राष्ट्रनिष्ठा का निर्माण केवल राजनीतिक आंदोलनों से नहीं होता, बल्कि बाल्यावस्था से विकसित सांस्कृतिक संस्कार और वैचारिक प्रतिबद्धता भी उसमें निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

हालांकि, ‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक यात्रा केवल सर्वस्वीकृति और राष्ट्रवादी उत्साह तक सीमित नहीं रही। स्वांतरंजन ने कांग्रेस के अधिवेशनों में इस गीत को लेकर हुए विरोध तथा कालांतर में मुस्लिम लीग द्वारा अपनाए गए विरोधात्मक रुख का उल्लेख किया। उन्होंने इस परिवर्तन के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर उभरे राजनीतिक और वैचारिक अंतर्विरोधों की ओर ध्यान आकृष्ट किया। उनके संबोधन का यह पक्ष विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण रहा, क्योंकि इसने राष्ट्रगीत के इतिहास को उसके व्यापक राजनीतिक संदर्भों में देखने की आवश्यकता रेखांकित की।

उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक भूमिका को स्वतंत्रता-संग्राम की प्रेरणा, राष्ट्रीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़ते हुए इसके संपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर बल दिया। राष्ट्रगीत के सभी छह छंदों की पुनर्प्रतिष्ठा से जुड़े विमर्श का उल्लेख करते हुए उन्होंने इसकी विरासत को समग्रता में समझने की महत्ता रेखांकित की। इस प्रकार चर्चा का केंद्र केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि राष्ट्रगीत के ऐतिहासिक अवदान और वर्तमान राष्ट्रीय चेतना के बीच संबंध को समझना भी रहा।

संस्कृतभारतीन्यास अवधप्रांत अध्यक्ष जितेन्द्र प्रताप सिंह( पूर्वी क्षेत्र के क्षेत्रीय संपर्कप्रमुख),कन्हैयालाल झा क्षेत्रीय संयोजक, डा चन्द्र भूषण त्रिपाठी अध्यक्ष अवधप्रांत की गरिमामय उपस्थिति में संपन्न कार्यक्रम का संचालन कार्यालय प्रमुख के के तिवारी ने किया।
क्षेत्रीय संगठन मंत्री प्रमोद पंडित ने वंदे मातरम् विशेषांक के विषयों को विस्तार से प्रस्तुत करते हुए गोपबन्धु मिश्र के योगदान व विशेषांक सम्पादक कन्हैयालाल झा, प्रबंध सम्पादक जितेन्द्र प्रताप सिंह की भूमिका से सभा को आलोकित किआ।
समापन अवसर पर उपस्थित जनसमुदाय ने सामूहिक रूप से ‘वंदे मातरम्’ का गायन किया। भारत माता के जयघोष के साथ सभा संपन्न हुई।
‘अवध सम्पदा’ का यह विशेषांक राष्ट्रगीत के ऐतिहासिक प्रसंगों, स्वतंत्रता-संग्राम में उसकी प्रेरक भूमिका और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े विमर्श को एक साथ प्रस्तुत करने का प्रयास है। बंग-भंग के प्रतिरोध से लेकर राष्ट्रगीत की वैचारिक विरासत तक की यह यात्रा स्मरण कराती है कि ‘वंदे मातरम्’ भारतीय इतिहास में केवल एक गीत नहीं, बल्कि स्वाधीनता की आकांक्षा और राष्ट्रबोध का सशक्त प्रतीक रहा है।