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अशोक सिंघल का जीवन राष्ट्रसेवा की वह तपःगाथा, जिसका ऋण भारत कभी नहीं भूल सकता

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अशोक सिंघल का जीवन राष्ट्रसेवा की वह तपःगाथा, जिसका ऋण भारत कभी नहीं भूल सकता

राष्ट्रीय सनातन महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा—अशोक सिंघल ने अपना संपूर्ण जीवन सांस्कृतिक जागरण, सामाजिक समरसता और राष्ट्रोत्थान के लिए अर्पित किया; अयोध्या में आज दिखाई दे रहा भव्य राम मंदिर उनके त्याग, तपस्या और अदम्य संकल्प की जीवंत परिणति

दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।“वृक्ष कभी अपने फल स्वयं नहीं खाते, नदियां अपना जल अपने लिए संचित नहीं करतीं और संतस्वभावी मनुष्य अपने सुख के लिए नहीं, बल्कि परमार्थ के लिए जीवन धारण करते हैं।” इसी भारतीय जीवन-दृष्टि को अशोक सिंघल के व्यक्तित्व की मूल प्रेरणा बताते हुए राष्ट्रीय सनातन महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि सिंघल का संपूर्ण जीवन लोकमंगल, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित रहा। उन्होंने कहा कि अशोक सिंघल केवल एक संगठनकर्ता नहीं थे, बल्कि वह व्यक्तित्व थे जिन्होंने अपने जीवन की प्रत्येक सांस को भारत की सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्र के पुनरुत्थान के संकल्प के साथ जोड़ दिया।

अशोक सिंघल की जन्मशती के अवसर पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करते हुए जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि ऐसे महापुरुषों का मूल्यांकन केवल उनके द्वारा प्राप्त पदों अथवा उपलब्धियों से नहीं किया जा सकता। उनका वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होता है कि उन्होंने अपने जीवन का कितना अंश समाज और राष्ट्र के लिए अर्पित किया। अशोक सिंघल का जीवन इसी त्यागपरक परंपरा का ऐसा अध्याय है, जिसकी प्रेरणा आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक मिलती रहेगी।

उन्होंने कहा कि अशोक सिंघल का जीवन आध्यात्मिक साधना, सांस्कृतिक जागरण, संगठनात्मक अनुशासन और सामाजिक सरोकारों का अद्भुत समन्वय था। उन्होंने देश के दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचकर समाज के वंचित वर्गों के बीच काम किया और प्राकृतिक आपदाओं के समय भी सेवा कार्यों को प्राथमिकता दी। उनके लिए समाजसेवा कोई अवसर नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक धर्म था।

प्रयागराज की सांस्कृतिक भूमि से उनके गहरे संबंध का उल्लेख करते हुए जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि संगम का आध्यात्मिक परिवेश, साधु-संतों का सान्निध्य और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के प्रति अनुराग उनके व्यक्तित्व को निरंतर संस्कारित करता रहा। यही संस्कार आगे चलकर राष्ट्र और समाज के प्रति उनके समर्पण का आधार बने। संगठन में मिली प्रत्येक जिम्मेदारी को उन्होंने अनुशासन, परिश्रम और पूर्ण निष्ठा के साथ निभाया।

जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि अशोक सिंघल की संगठनात्मक क्षमता असाधारण थी। उनकी वाणी में ओज था, विचारों में स्पष्टता थी और कार्यकर्ताओं के प्रति व्यवहार में आत्मीयता। वे बड़े से बड़े आयोजन को व्यापक सामाजिक चेतना से जोड़ने की क्षमता रखते थे। देश ही नहीं, विदेशों में आयोजित हिंदू सम्मेलनों में भी उन्होंने विभिन्न समूहों और समुदायों को एक मंच पर लाने के लिए अथक प्रयास किए।

रामजन्मभूमि आंदोलन में अशोक सिंघल के योगदान को स्मरण करते हुए जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि अयोध्या में आज जो भव्य राम मंदिर भारत और विश्व के सामने दिखाई दे रहा है, उसके पीछे असंख्य लोगों का संघर्ष और त्याग है, लेकिन अशोक सिंघल का समर्पण उस संघर्ष की अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी रहा। उन्होंने कहा कि अशोक सिंघल ने रामजन्मभूमि के लिए अपने जीवन का सर्वस्व लगा दिया। आंदोलन के कठिन दौर में उनका संघर्ष, उनका संकल्प और विपरीत परिस्थितियों में भी उनकी अडिग प्रतिबद्धता भारतीय समाज की स्मृति में सदैव जीवित रहेगी।

उन्होंने कहा कि आज हम अयोध्या में भगवान राम का जो भव्य मंदिर देख पा रहे हैं, उसमें अशोक सिंघल जी का जो त्याग और तपस्या निहित है, उसने भारत की जनता के हृदय में उनके प्रति ऐसा सम्मान और अनुराग उत्पन्न किया है, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं है। यह केवल एक मंदिर के निर्माण की कथा नहीं, बल्कि उस दीर्घ संघर्ष की परिणति है जिसमें अशोक सिंघल जैसे लोगों ने अपने जीवन के वर्षों को समर्पित कर दिया।

सामाजिक समरसता के प्रति अशोक सिंघल की प्रतिबद्धता का उल्लेख करते हुए जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि उनका चिंतन समाज को विभाजित करने के बजाय जोड़ने वाला था। वे प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान और समान गरिमा के पक्षधर थे। समाज के वंचित वर्गों को धार्मिक और सामाजिक मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान दिलाने के उनके प्रयास इसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा थे। अयोध्या में राम मंदिर से जुड़े महत्वपूर्ण अवसर पर वंचित वर्ग से आने वाले कामेश्वर चौपाल को सम्मानजनक भूमिका दिए जाने तथा काशी में डोम राजा के सम्मान जैसे प्रसंग उनके इसी सामाजिक दृष्टिकोण को रेखांकित करते हैं।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रनिर्माण की उनकी दृष्टि केवल धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं थी। शिक्षा, विशेषकर वैदिक शिक्षा, उनके प्रिय विषयों में रही। दूर-दराज के ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों तक शिक्षा पहुंचाने वाली एकल विद्यालय जैसी पहलों से उनका जुड़ाव इसी व्यापक राष्ट्रदृष्टि का परिचायक था। वे स्वयं अध्ययनशील थे और युवा कार्यकर्ताओं को भी पुस्तकों के अध्ययन तथा भारतीय ज्ञान-परंपरा से जुड़ने के लिए प्रेरित करते थे।

अशोक सिंघल के संगीतप्रेम को स्मरण करते हुए जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि उनका व्यक्तित्व जितना ओजस्वी था, उतना ही संवेदनशील भी। वे मधुर स्वर में गीत गाते थे और उनके गायन से बैठकों का वातावरण भी ऊर्जस्वित हो उठता था। संगीत उनके लिए केवल रुचि नहीं, बल्कि आत्माभिव्यक्ति का एक माध्यम था।

उन्होंने कहा कि अशोक सिंघल की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने स्वयं को कभी केंद्र में रखकर जीवन नहीं जिया। उन्होंने संगठन को आगे रखा, समाज को आगे रखा और राष्ट्र को सर्वोपरि माना। उनका जीवन त्याग, अनुशासन, साधना और कर्मनिष्ठा का ऐसा उदाहरण है, जिसमें व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए कोई स्थान नहीं था।

जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि अशोक सिंघल की जन्मशती केवल अतीत को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि उनके जीवन-मूल्यों को वर्तमान और भविष्य से जोड़ने का अवसर है। नई पीढ़ी को उनके संघर्ष, अध्ययनशीलता, संगठननिष्ठा, सामाजिक समरसता और राष्ट्रसेवा की भावना से परिचित कराना ही उनके प्रति वास्तविक श्रद्धांजलि होगी। उन्होंने कहा कि जिन महापुरुषों ने अपने जीवन को राष्ट्र के लिए अर्पित कर दिया, उनका स्मरण तभी सार्थक होगा जब उनके आदर्शों को समाज और राष्ट्र के जीवन में आगे बढ़ाया जाए।

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