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लखनऊ नगर निगम में सियासी भूचाल: भाजपा के 32 पार्षदों ने अपनी ही महापौर के विरुद्ध खोला मोर्चा, प्रदेश नेतृत्व से की हस्तक्षेप की मांग

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Dainik India News

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लखनऊ नगर निगम में सियासी भूचाल: भाजपा के 32 पार्षदों ने अपनी ही महापौर के विरुद्ध खोला मोर्चा, प्रदेश नेतृत्व से की हस्तक्षेप की मांग

दैनिक इंडिया न्यूज़ ,लखनऊ। राजधानी की नगर राजनीति में शुक्रवार को ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने भारतीय जनता पार्टी के भीतर व्याप्त असंतोष को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया। सत्ता पक्ष के ही 32 भाजपा पार्षद सामूहिक रूप से प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के समक्ष पहुंचे और महापौर सुषमा खर्कवाल के विरुद्ध गंभीर शिकायतों का विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। इस अभूतपूर्व घटनाक्रम ने नगर निगम की कार्यप्रणाली, संसाधनों के वितरण तथा राजनीतिक समन्वय पर अनेक प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।

वरिष्ठ पार्षद देव शर्मा मिश्रा 'मुन्ना मिश्रा' के नेतृत्व में पहुंचे प्रतिनिधिमंडल ने आरोप लगाया कि विकास योजनाओं एवं वित्तीय संसाधनों के आवंटन में निष्पक्षता के स्थान पर राजनीतिक पसंद-नापसंद को आधार बनाया गया। पार्षदों का कहना था कि जिन वार्डों के जनप्रतिनिधि महापौर के विचारों अथवा राजनीतिक समीकरणों से मेल नहीं खाते, उन्हें योजनाओं और बजट से व्यवस्थित रूप से वंचित रखा गया, जिससे अनेक आवश्यक विकास कार्य ठप पड़ गए।

बैठक के दौरान कार्यकारिणी सदस्य राजेश सिंह गब्बर, प्रमोद सिंह राजन, शैलेंद्र वर्मा, मुकेश सिंह मोंटी, विमल तिवारी, कमलेश सिंह, कौशलेंद्र द्विवेदी सहित अन्य जनप्रतिनिधियों ने अपने-अपने वार्डों से संबंधित अभिलेख, बजट विवरण तथा विकास कार्यों का तुलनात्मक ब्यौरा प्रदेश अध्यक्ष के समक्ष प्रस्तुत किया। उनका दावा था कि उपलब्ध दस्तावेज स्वयं यह प्रमाणित करते हैं कि वित्तीय संसाधनों का वितरण समानता और आवश्यकता के सिद्धांत के अनुरूप नहीं किया गया।

सबसे गंभीर आरोप वित्तीय आवंटन को लेकर सामने आया। पार्षद मुकेश सिंह मोंटी ने कहा कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 88 वार्डों के विकास के लिए लगभग 18 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए, जबकि मोहनलालगंज लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले मात्र 22 वार्डों के लिए लगभग 32 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी गई। उनका कहना था कि यदि ये आंकड़े अभिलेखों के अनुरूप हैं तो विकास निधि के वितरण की नीति पर गंभीर पुनर्विचार आवश्यक है।

पार्षदों ने यह भी आरोप लगाया कि 15वें वित्त आयोग तथा अवस्थापना निधि से प्राप्त धनराशि के आवंटन में भी समानता का सिद्धांत नहीं अपनाया गया। उनका कहना था कि महापौर के निकट माने जाने वाले वार्डों को प्राथमिकता देकर उदारतापूर्वक विकास कार्य स्वीकृत किए गए, जबकि अनेक अन्य क्षेत्रों में सड़क, नाली, जलनिकासी, प्रकाश व्यवस्था तथा नागरिक सुविधाओं से जुड़े प्रस्ताव लंबित पड़े हैं। परिणामस्वरूप जनता में असंतोष लगातार बढ़ रहा है और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को अपने ही क्षेत्र में जवाब देना कठिन हो रहा है।

सूत्रों के अनुसार, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने प्रतिनिधिमंडल की शिकायतों को गंभीरतापूर्वक सुना और आश्वस्त किया कि सभी तथ्यों की निष्पक्ष समीक्षा कराई जाएगी। उन्होंने यह भरोसा भी दिलाया कि भविष्य में किसी भी वार्ड के साथ पक्षपात नहीं होने दिया जाएगा तथा विकास निधि का वितरण समानता, पारदर्शिता और जनहित के सिद्धांतों के अनुरूप सुनिश्चित किया जाएगा।

उधर, इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए महापौर सुषमा खर्कवाल ने कहा कि फिलहाल उन्हें इस विषय पर कुछ नहीं कहना है। उनका कहना था कि जब उनसे औपचारिक रूप से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा, तब वह अपनी विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगी। उन्होंने यह भी कहा कि नगर निगम द्वारा सभी क्षेत्रों में विकास कार्य कराए गए हैं।

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि एक ही राजनीतिक दल के 32 निर्वाचित पार्षद सामूहिक रूप से अपनी ही महापौर के विरुद्ध प्रदेश नेतृत्व के समक्ष शिकायत लेकर पहुंचते हैं, तो क्या यह केवल आंतरिक असहमति है अथवा नगर निगम की विकास नीति पर गंभीर अविश्वास का संकेत? इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच और तथ्यपरक निष्कर्ष न केवल भाजपा संगठन, बल्कि राजधानी की जनता की अपेक्षाओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे। यदि आरोप तथ्यात्मक रूप से सिद्ध होते हैं तो यह केवल प्रशासनिक निर्णयों का नहीं, बल्कि सुशासन, पारदर्शिता और समान विकास के सिद्धांतों की भी कठोर परीक्षा होगी।

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