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स्वांतरंजन जी की स्नेहमयी उपस्थिति में संस्कृत भारती न्यास की ऐतिहासिक कार्यकारिणी बैठक सम्पन्न

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स्वांतरंजन जी की स्नेहमयी उपस्थिति में संस्कृत भारती न्यास की ऐतिहासिक कार्यकारिणी बैठक सम्पन्न

न्यास का पुनर्गठन, नवघोषित पदाधिकारियों एवं न्यासियों ने ग्रहण किया दायित्व; अनुभवी मार्गदर्शन और युवा ऊर्जा के समन्वय से संस्कृत-जागरण के नवयुग का हुआ शंखनाद

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।संस्कृत भाषा, भारतीय ज्ञान-परंपरा एवं सांस्कृतिक पुनर्जागरण के व्यापक लक्ष्य को मूर्त रूप प्रदान करने की दिशा में संस्कृत भारती न्यास की कार्यकारिणी बैठक बुधवार को अत्यंत गरिमामय, चिंतनपरक एवं दूरदर्शी वातावरण में सम्पन्न हुई। शिव मंदिर परिसर, महानगर स्थित न्यास कार्यालय में आयोजित इस महत्त्वपूर्ण बैठक ने केवल संगठनात्मक पुनर्संरचना का औपचारिक दायित्व ही पूर्ण नहीं किया, बल्कि संस्कृत के माध्यम से राष्ट्रचेतना के पुनरुत्थान का ऐसा वैचारिक घोष भी किया, जिसने उपस्थित प्रत्येक कार्यकर्ता के अंतर्मन में नवसंकल्प का संचार कर दिया।

बैठक की अध्यक्षता संस्कृत भारती न्यास के अध्यक्ष जितेन्द्र प्रताप सिंह ने की। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख स्वांतरंजन जी मुख्य अतिथि के रूप में अपनी स्नेहमयी एवं प्रेरणास्पद उपस्थिति से समस्त कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करने हेतु उपस्थित रहे। वहीं प्रमोद पंडित, क्षेत्रीय संगठन मंत्री (पूर्व उत्तर प्रदेश क्षेत्र), विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में सम्मिलित हुए। इन दोनों वरिष्ठ व्यक्तित्वों की उपस्थिति ने बैठक को केवल प्रशासनिक आयोजन न रहने देकर उसे वैचारिक मंथन के एक ऐतिहासिक अवसर में परिवर्तित कर दिया।

बैठक के प्रारम्भ में पूर्वनिर्धारित कार्यसूची के प्रत्येक बिंदु पर अत्यंत गंभीरता, संगठनात्मक परिपक्वता एवं दूरगामी दृष्टि के साथ क्रमवार विचार-विमर्श किया गया। संस्कृत के प्रचार-प्रसार, न्यास की भावी कार्ययोजना, संगठन के विस्तार, जनसंपर्क अभियान तथा नवपीढ़ी को संस्कृत से जोड़ने की अभिनव रणनीतियों पर विस्तृत विमर्श हुआ। प्रत्येक प्रस्ताव केवल वर्तमान की आवश्यकताओं तक सीमित नहीं था, बल्कि आने वाले वर्षों के सांस्कृतिक परिदृश्य को दृष्टिगत रखते हुए तैयार किया गया।

बैठक का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण निर्णय न्यास के पुनर्गठन एवं नव न्यासियों के मनोनयन का रहा। सर्वसम्मति एवं उनकी सहमति के आधार पर डॉ. चन्द्र भूषण त्रिपाठी, अखिलेश सिंह, सुजीत चतुर्वेदी तथा कृष्ण कुमार तिवारी को संस्कृत भारती न्यास का न्यासी नियुक्त किया गया। इनके सम्मिलित होने से न्यास की संगठनात्मक क्षमता, वैचारिक व्यापकता तथा कार्यगत सक्रियता में उल्लेखनीय विस्तार होने की अपेक्षा व्यक्त की गई।

पुनर्गठन के उपरांत अब न्यास में अध्यक्ष जितेन्द्र प्रताप सिंह, शोभनलाल उकील, नीरज अग्रवाल सहित कुल सात न्यासियों का सशक्त समूह कार्य करेगा। वरिष्ठजनों के अनुभव, संगठनात्मक अनुशासन तथा युवाओं की नवोन्मेषी सोच का यह समन्वय न्यास की भावी कार्ययोजना को अधिक प्रभावशाली, परिणामोन्मुख एवं जनसरोकारों से जुड़ा बनाने में निर्णायक सिद्ध होगा। उपस्थित सदस्यों ने इसे संस्कृत भारती न्यास के विकास-पथ का एक स्वर्णिम अध्याय बताया।

अपने उद्बोधन में स्वांतरंजन जी ने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की सनातन आत्मा की अभिव्यक्ति है। भारतीय संस्कृति, दर्शन, विज्ञान, अध्यात्म तथा जीवन-मूल्यों का मूल स्रोत संस्कृत ही है। उन्होंने कहा कि यदि भारत को उसकी वास्तविक सांस्कृतिक चेतना से पुनः जोड़ना है तो संस्कृत को समाज के व्यवहार, शिक्षा, परिवार और जनजीवन का स्वाभाविक अंग बनाना होगा। उन्होंने कार्यकर्ताओं का आह्वान किया कि वे संगठनात्मक विस्तार के साथ-साथ संस्कृत को लोकजीवन तक पहुँचाने के लिए समर्पण, अनुशासन और सतत सक्रियता का परिचय दें।

विशेष आमंत्रित सदस्य प्रमोद पंडित ने संगठनात्मक सुदृढ़ीकरण पर बल देते हुए कहा कि किसी भी वैचारिक आंदोलन की स्थायी सफलता उसके समर्पित कार्यकर्ताओं एवं सशक्त संगठनात्मक संरचना पर निर्भर करती है। संस्कृत भारती न्यास का यह पुनर्गठन निश्चित रूप से संस्कृत-जागरण अभियान को नई गति, नई दिशा और नई ऊँचाइयाँ प्रदान करेगा।

अध्यक्ष जितेन्द्र प्रताप सिंह ने सभी अतिथियों, नव नियुक्त न्यासियों एवं कार्यकारिणी सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि न्यास का उद्देश्य केवल संस्कृत शिक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय अस्मिता और सनातन जीवन-दर्शन को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाना है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि वरिष्ठों के मार्गदर्शन एवं युवाओं की कर्मनिष्ठ ऊर्जा के समन्वय से संस्कृत भारती न्यास आने वाले समय में जनजागरण का एक सशक्त राष्ट्रीय माध्यम बनकर उभरेगा।

बैठक का समापन राष्ट्रचेतना, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और संस्कृत के व्यापक प्रसार के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ। उपस्थित प्रत्येक सदस्य के मन में यह दृढ़ विश्वास स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ कि यह पुनर्गठन केवल पदों का पुनर्विन्यास नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण के एक नवोन्मेषी अध्याय का शुभारम्भ है। आने वाले समय में संस्कृत भारती न्यास अपनी सुदृढ़ संगठनात्मक संरचना, वैचारिक प्रखरता और समाजनिष्ठ कार्ययोजनाओं के माध्यम से संस्कृत के पुनरुत्थान को एक व्यापक जनांदोलन का स्वरूप प्रदान करेगा।

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