सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन. सिंह ने उठाए गंभीर संवैधानिक प्रश्न, विधानसभा सचिवालय की कार्यप्रणाली पर खड़े हुए नए सवाल
दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय से जुड़ा एक मामला अब केवल प्रशासनिक विवाद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने संवैधानिक वैधता, सार्वजनिक पद की विधिक स्थिति और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ खंडपीठ में लंबित एक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान प्रस्तुत पक्षों के तर्क और उसके बाद विधानसभा सचिवालय द्वारा जारी एक आदेश ने इस पूरे प्रकरण को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है।
प्रकरण की पृष्ठभूमि में वह न्यायिक कार्यवाही है जिसमें राज्य सरकार एवं विधानसभा सचिवालय की ओर से यह प्रारंभिक आपत्ति उठाई गई कि विपक्षी पक्ष संख्या-3 किसी "Public Post" पर आसीन नहीं है तथा वह "Sovereign Functions" का निर्वहन भी नहीं कर रहा है। यह आपत्ति न्यायालय के समक्ष रिकॉर्ड पर आई, जिसके बाद इस विषय पर व्यापक कानूनी चर्चा प्रारंभ हो गई।
इसी बीच एक नया दस्तावेज़ सार्वजनिक हुआ, जिसमें 4 अगस्त 2026 को उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय से फिरोजाबाद के विधायक सचिन यादव के निलंबन संबंधी आदेश जारी होने का उल्लेख है। इस पत्र पर प्रदीप कुमार दुबे, प्रमुख सचिव, उत्तर प्रदेश विधानसभा के हस्ताक्षर अंकित हैं। यही तथ्य अब पूरे विवाद का केंद्र बन गया है।
सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन. सिंह ने इस घटनाक्रम पर गंभीर प्रश्न उठाते हुए कहा है कि यदि न्यायालय में यह कहा गया कि संबंधित अधिकारी किसी सार्वजनिक पद पर आसीन नहीं हैं और संप्रभु प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर रहे हैं, तो फिर उसी अधिकारी द्वारा विधानसभा की ओर से जारी आदेशों पर हस्ताक्षर किस विधिक अधिकार और प्रशासनिक क्षमता में किए गए? उनका कहना है कि यह प्रश्न केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक संस्थाओं की वैधानिक कार्यप्रणाली और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा हुआ है।
रीना एन. सिंह ने यह भी कहा कि उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार प्रदीप दुबे 30 अप्रैल 2019 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं। यदि यह तथ्य सही है, तो यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि सेवानिवृत्ति के बाद वे किस वैधानिक आदेश, पुनर्नियुक्ति या अधिकृत व्यवस्था के अंतर्गत विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव के रूप में कार्य कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस पूरे प्रकरण की जानकारी विधानसभा अध्यक्ष को भी होने की बात कही जा रही है, इसलिए इस विषय पर अधिकृत स्पष्टीकरण आवश्यक है।
रीना एन सिंह का मानना है कि यदि न्यायालय में दिए गए कथन और प्रशासनिक अभिलेखों में कोई वास्तविक विरोधाभास पाया जाता है, तो यह मामला केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का नहीं रहेगा, बल्कि संवैधानिक उत्तरदायित्व, वैधानिक अधिकारिता और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए पक्ष की विश्वसनीयता से भी जुड़ सकता है। ऐसे मामलों में अंतिम निष्कर्ष न्यायालय के समक्ष उपलब्ध अभिलेखों, प्रतिवादों और विधिक परीक्षण के आधार पर ही निर्धारित होगा।
फिलहाल इस प्रकरण पर न्यायिक प्रक्रिया जारी है और संबंधित पक्षों की ओर से विस्तृत उत्तर एवं स्पष्टीकरण अपेक्षित हैं। ऐसे में यह मामला आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था और संवैधानिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण विषय बन सकता है।