गीता के दो श्लोकों के बीच छिपा वह रहस्य, जहां ज्ञान, भक्ति और शरणागति एक ही यात्रा के पड़ाव बन जाते हैं—क्या ‘मैं’ की समाप्ति ही आत्मबोध की शुरुआत है?
दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दिल्ली।कृष्ण को समझना केवल उनके जीवन की घटनाओं को जान लेना नहीं है। उनके जीवन की कथा जितनी विराट है, उनके शब्दों के भीतर छिपा संसार उससे कहीं अधिक गहरा है। गीता पढ़ते हुए एक समय ऐसा आता है, जब कृष्ण अर्जुन से संवाद करते-करते मानो प्रत्येक मनुष्य से संवाद करने लगते हैं। प्रश्न युद्धभूमि का हो सकता है, किंतु उत्तर मनुष्य के भीतर चल रहे उस संघर्ष तक पहुंच जाता है, जहां सबसे कठिन प्रश्न सामने खड़ा होता है—मैं कौन हूं?
यहीं से गीता का स्वर बदलने लगता है। वह केवल यह नहीं बताती कि मनुष्य को क्या करना चाहिए, बल्कि धीरे-धीरे उस सत्ता की ओर संकेत करती है, जो प्रत्येक कर्म के पीछे स्वयं को ‘कर्ता’ मानती है। मनुष्य कहता है—मैंने किया, मैंने पाया, मैंने खोया, मुझे सुख मिला, मुझे दुख हुआ। लेकिन यदि इस ‘मैं’ को ही एक क्षण के लिए प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर दिया जाए, तो फिर मनुष्य के अनुभव का आधार क्या बचेगा?
शायद गीता के सबसे गहरे रहस्यों में से एक इसी प्रश्न के आसपास खुलता है। श्रीकृष्ण के दो श्लोक इस रहस्य को समझने के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण दिखाई देते हैं। एक सातवें अध्याय में आता है और दूसरा अठारहवें अध्याय में। दोनों के बीच गीता का लगभग पूरा दार्शनिक विस्तार फैला हुआ है, लेकिन ध्यान से देखने पर लगता है कि दोनों के बीच कोई अदृश्य सूत्र लगातार जुड़ा हुआ है।
सातवें अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं—
«“बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥”
—श्रीमद्भगवद्गीता, 7.19»
अर्थात् अनेक जन्मों के अंत में ज्ञानवान पुरुष मेरी शरण में आता है और यह अनुभव करता है कि वासुदेव ही सर्वस्व हैं। ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।
इस श्लोक में एक शब्द विशेष रूप से ध्यान खींचता है—“सुदुर्लभः”। कृष्ण केवल यह नहीं कहते कि ऐसा ज्ञानी कम मिलता है; वे उसे अत्यंत दुर्लभ बताते हैं। अर्थात् मनुष्य का ईश्वर के बारे में सुन लेना एक बात है, ईश्वर की उपासना करना दूसरी बात है, और उस स्थिति तक पहुंच जाना जहां समूचा अस्तित्व ही वासुदेवमय दिखाई देने लगे—यह उससे कहीं अधिक गहरी अवस्था है।
यहीं गीता के एक और वचन को साथ रखकर देखना आवश्यक हो जाता है। सातवें अध्याय में ही कृष्ण ज्ञानवान भक्त के विषय में कहते हैं—
«“तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥”
—श्रीमद्भगवद्गीता, 7.17»
अर्थात् उन भक्तों में ज्ञानवान, निरंतर मुझमें स्थित और एकनिष्ठ भक्त विशेष रूप से श्रेष्ठ है; क्योंकि मैं ज्ञानवान को अत्यंत प्रिय हूं और वह ज्ञानवान भी मुझे अत्यंत प्रिय है।
अब सातवें अध्याय के इन दोनों प्रसंगों को साथ पढ़ने पर गीता की एक अद्भुत आंतरिक यात्रा दिखाई देती है। कृष्ण के लिए भक्ति केवल भाव-विभोर होकर उनका नाम लेने तक सीमित नहीं है और ज्ञान केवल दार्शनिक विचारों का संग्रह भी नहीं है। ज्ञान जब भक्ति में उतरता है और भक्ति जब ज्ञान से प्रकाशित होती है, तब साधक के भीतर वह परिवर्तन आरंभ होता है, जिसमें भगवान उसके लिए केवल आराध्य नहीं रहते—वे उसके अस्तित्व की अंतिम वास्तविकता के रूप में प्रकट होने लगते हैं।
और यही वह बिंदु है, जहां “वासुदेवः सर्वमिति” अपने वास्तविक अर्थ की ओर संकेत करता है।
कृष्ण मानो अर्जुन से कह रहे हैं कि असंख्य मनुष्यों में से कितने लोग उन्हें खोजते हैं, कितने उनकी भक्ति करते हैं और कितने ज्ञान की तलाश में निकलते हैं—लेकिन वह अवस्था अत्यंत दुर्लभ है, जहां ज्ञान अपनी परिपक्वता पर पहुंचकर साधक को इस अनुभूति तक ले जाए कि वासुदेव ही सर्वस्व हैं।
यही कारण है कि “सुदुर्लभः” शब्द इस पूरे विमर्श का एक मौन, किंतु अत्यंत शक्तिशाली केंद्र बन जाता है।
मनुष्य मंदिर तक पहुंच सकता है, शास्त्र तक पहुंच सकता है, मंत्र तक पहुंच सकता है, दर्शन तक पहुंच सकता है; लेकिन क्या वह उस बिंदु तक पहुंच सकता है जहां उसके भीतर का ‘मैं’ स्वयं प्रश्न बन जाए?
यही प्रश्न गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ से कहीं अधिक गहरी आत्मिक यात्रा में बदल देता है।
यदि वासुदेव ही सर्वस्व हैं, तो फिर वासुदेव से अलग क्या बचता है? और यदि कुछ भी उनसे अलग नहीं है, तो मनुष्य जिस ‘मैं’ को अपने अस्तित्व का केंद्र मानता है, उसकी अंतिम सत्ता क्या है?
यहीं से गीता का दर्शन केवल ईश्वर की चर्चा नहीं रह जाता। प्रश्न स्वयं मनुष्य की पहचान पर आ जाता है।
‘अनेक जन्मों’ का अर्थ केवल शरीरों के बदलते रहने की कालगणना तक सीमित कर देना इस श्लोक की आध्यात्मिक गहराई को छोटा कर देगा। भारतीय चिंतन में मनुष्य की यात्रा केवल देह की यात्रा नहीं है। चेतना भी यात्रा करती है। अनुभवों से विवेक जन्म लेता है, विवेक से वैराग्य, वैराग्य से आत्मान्वेषण और आत्मान्वेषण से वह प्रश्न पैदा होता है, जिसे संसार की कोई उपलब्धि पूरी तरह शांत नहीं कर सकती—मैं वास्तव में कौन हूं?
लेकिन इस यात्रा का सबसे आश्चर्यजनक पक्ष यहीं सामने आता है। मनुष्य सत्य को खोजता है और अंततः सत्य के बारे में कोई बाहरी सूचना प्राप्त नहीं करता; बल्कि उसकी अपनी दृष्टि बदलने लगती है। जिस संसार को वह पहले अलग-अलग वस्तुओं, व्यक्तियों और घटनाओं का समूह समझता था, उसी में उसे किसी व्यापक एकत्व की अनुभूति होने लगती है।
इसीलिए “वासुदेवः सर्वमिति” का महत्व केवल इतना नहीं है कि संसार में ईश्वर विद्यमान हैं। प्रश्न इससे कहीं अधिक गहरा है। यदि सर्वत्र वही परम तत्त्व है, तो ‘मैं’ और ‘दूसरे’ के बीच खड़ी वह दीवार कहां से आती है?
उपनिषदों की परंपरा में भी यही खोज बार-बार दिखाई देती है। छांदोग्य उपनिषद् कहता है—“सर्वं खल्विदं ब्रह्म।” बृहदारण्यक उपनिषद् सीमित अवधारणाओं से आगे बढ़ने के लिए “नेति, नेति” कहता है। कठोपनिषद् मनुष्य को उस आत्मतत्त्व की ओर ले जाता है, जो इंद्रियों की सामान्य पकड़ से परे है। अलग-अलग शब्दों और प्रसंगों के बावजूद प्रश्न लगभग वही है—अनेकता के पीछे वह कौन-सा तत्त्व है, जो सबको आधार देता है?
गीता की विशेषता यह है कि वह इस प्रश्न को किसी निर्जीव दार्शनिक सूत्र की तरह नहीं रखती। वह इसे कृष्ण और अर्जुन के जीवंत संवाद में उतार देती है। इसलिए “वासुदेवः सर्वम्” केवल श्रद्धा का वाक्य नहीं रह जाता; वह मनुष्य को उसकी अपनी पृथकता के बोध पर विचार करने के लिए विवश करता है।
यहीं अद्वैत वेदांत की दृष्टि इस प्रश्न को और गहरा करती है। आदि शंकराचार्य की व्याख्या में परम सत्य ब्रह्म है—अद्वितीय और अविभाज्य। जीव की पृथकता का अनुभव अविद्या और अध्यास से जुड़ा है। रस्सी को अंधकार में सर्प समझ लेने का उदाहरण इसी बात को समझाने के लिए दिया जाता है। ज्ञान आने पर रस्सी को नया रूप नहीं दिया जाता; केवल भ्रम दूर होता है।
मुक्ति भी इसी अर्थ में किसी नई वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि उस सत्य का आवरण हटना है जो पहले से विद्यमान है। तब प्रश्न यह नहीं रहता कि ईश्वर कहां से आएंगे; प्रश्न यह हो जाता है कि उन्हें देखने में बाधा कौन-सी है।
यहीं “वासुदेवः सर्वम्” का अर्थ और सूक्ष्म हो जाता है। वृक्ष वृक्ष ही रहता है, नदी नदी ही रहती है और मनुष्य मनुष्य ही रहता है। बदलती वस्तुएं नहीं, देखने वाली चेतना है। विविधता समाप्त नहीं होती, लेकिन विविधता को अंतिम और स्वतंत्र सत्य मानने का आग्रह कमजोर पड़ने लगता है।
फिर गीता अचानक एक और प्रश्न सामने रख देती है।
यदि ज्ञानवान पुरुष यह देख चुका है कि “वासुदेवः सर्वम्”, तो फिर अठारहवें अध्याय में कृष्ण को यह क्यों कहना पड़ा—“मामेकं शरणं व्रज”?
यदि सब कुछ उसी परम तत्त्व में प्रतिष्ठित है, तो शरण किसकी और किसके प्रति?
यही वह बिंदु है, जहां ज्ञान और भक्ति के बीच दिखाई देने वाला अंतर धीरे-धीरे धुंधला पड़ने लगता है।
क्योंकि ज्ञान केवल जान लेने का नाम नहीं है। मनुष्य बहुत कुछ जान सकता है और फिर भी अपने भीतर यह विश्वास बचाए रख सकता है कि अंतिम कर्ता वही है। वह ब्रह्म पर चर्चा कर सकता है, आत्मा पर ग्रंथ पढ़ सकता है, उपनिषदों के मंत्र स्मरण कर सकता है और फिर भी भीतर से कह सकता है—मैं जानता हूं।
यहीं ज्ञान स्वयं अहंकार का नया आधार बन सकता है।
इसलिए गीता का ज्ञान केवल सूचनाओं का संचय नहीं है। वह ऐसी अनुभूति की ओर ले जाता है, जिसमें ज्ञान प्राप्त करने वाला व्यक्ति भी अपने ‘मैं’ की सीमाओं को देखने लगता है। सातवें अध्याय के 7.19 श्लोक में आया एक शब्द इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है—“प्रपद्यते”।
कृष्ण यह नहीं कहते कि ज्ञानवान केवल मुझे जानता है। वे कहते हैं—वह मेरी शरण में आता है।
अर्थात् ज्ञान की यात्रा कहीं न कहीं समर्पण की भूमि तक पहुंचती है। जब तक ज्ञान व्यक्ति के भीतर यह आग्रह बनाए रखता है कि “मैं जानता हूं”, तब तक ज्ञाता और ज्ञेय के बीच दूरी बनी रहती है। लेकिन जब वही ज्ञान भीतर उतरता है, तो ज्ञाता स्वयं अपने अहंकार की सीमाओं को देखने लगता है।
और शायद यहीं से सातवें अध्याय का प्रश्न अठारहवें अध्याय के उत्तर की ओर बढ़ता है।
गीता के अंतिम चरण में श्रीकृष्ण कहते हैं—
«“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥”
—श्रीमद्भगवद्गीता, 18.66»
अर्थात् सभी धर्मों का परित्याग करके मेरी एकमात्र शरण में आओ; मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा, शोक मत करो।
इस श्लोक का अर्थ उसके पूरे संदर्भ से अलग करके देखना गीता के संदेश को सीमित कर सकता है। कृष्ण ने अर्जुन को कर्म से पलायन का मार्ग नहीं बताया। पूरी गीता में कर्म, स्वधर्म, लोकसंग्रह और कर्तव्य का महत्व सामने आता है। इसलिए “सर्वधर्मान्परित्यज्य” को केवल बाहरी कर्तव्यों को छोड़ देने का आदेश मानना उसके व्यापक संदर्भ को संकुचित कर देगा।
यहां प्रश्न शायद उन मानसिक आश्रयों का है, जिनके सहारे मनुष्य स्वयं को परम सत्य से अलग अनुभव करता है। कर्म रह सकता है, लेकिन कर्तृत्व का अहंकार बदल सकता है। कर्तव्य रह सकता है, लेकिन उसके पीछे फल की आसक्ति का आग्रह छूट सकता है। संसार वही रह सकता है, लेकिन संसार के साथ मनुष्य का संबंध बदल सकता है।
यहीं शरणागति कर्म से पलायन नहीं, बल्कि कर्म के भीतर से अहंकार के क्षरण की दिशा बनती है।
मनुष्य का सबसे मजबूत आश्रय अक्सर बाहर नहीं होता। वह उसके भीतर बैठा हुआ ‘मैं’ होता है। वही कहता है—मैंने किया, मैंने पाया, मैंने खोया। वही अपने सम्मान और अपमान का हिसाब रखता है। वही सुख को पकड़कर रखना चाहता है और दुख से भागना चाहता है। वही परिवर्तन से डरता है, क्योंकि परिवर्तन उसके बनाए हुए ‘मैं’ को चुनौती देता है।
कृष्ण का “मामेकं शरणं व्रज” इसी केंद्र को छूता है।
जिस ‘मैं’ को मनुष्य अपना अंतिम आश्रय समझता है, क्या वह स्वयं स्थायी है?
यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही गहरा है। क्योंकि यदि ‘मैं’ बदलता रहता है—बचपन का मैं, युवावस्था का मैं, वृद्धावस्था का मैं; विचारों के साथ बदलता हुआ मैं, अनुभवों के साथ बदलता हुआ मैं—तो फिर वह कौन है, जो इन सभी परिवर्तनों को देख रहा है?
यहीं से आत्मबोध की खोज आरंभ होती है।
अठारहवें अध्याय का अगला वाक्य भी इसी कारण महत्वपूर्ण है—“मा शुचः”, अर्थात् शोक मत करो। यह केवल सांत्वना का सामान्य वाक्य नहीं लगता। जब मनुष्य अपने पुराने आश्रयों को छोड़ने लगता है, तब भय स्वाभाविक है। कृष्ण उसी भय के पार जाने का आश्वासन देते हैं।
अब दोनों श्लोकों को एक साथ रखकर देखिए।
सातवें अध्याय में कहा गया—“बहूनां जन्मनामन्ते”। फिर आया—“ज्ञानवान्”। उसके बाद—“प्रपद्यते”। और अंततः—“वासुदेवः सर्वमिति।”
अठारहवें अध्याय में वही यात्रा दूसरे रूप में सामने आती है—“सर्वधर्मान्परित्यज्य”, फिर “मामेकं शरणं व्रज”, और अंत में—“मा शुचः।”
एक ओर ज्ञान परिपक्व होकर शरणागति की ओर जाता दिखाई देता है, दूसरी ओर शरणागति भय और बंधन से मुक्ति के आश्वासन तक पहुंचती है।
तब ज्ञान और भक्ति दो बिल्कुल अलग दिशाएं नहीं रह जातीं। ज्ञान सत्य की ओर दृष्टि खोलता है और भक्ति उस सत्य के सामने ‘मैं’ को झुकना सिखाती है।
यहीं वेदांत का पुराना प्रश्न फिर सामने आता है—ब्रह्म क्या है, जीव कौन है और जगत का अंतिम सत्य क्या है?
अद्वैत वेदांत इन प्रश्नों को ब्रह्म की अद्वितीयता और अविद्या के संदर्भ में देखता है। वैष्णव वेदांत की विभिन्न परंपराएं जीव और परमेश्वर के संबंध की अलग-अलग व्याख्याएं करती हैं। इसलिए “वासुदेवः सर्वम्” को किसी एक बाद की दार्शनिक प्रणाली में पूरी तरह सीमित कर देना उचित नहीं होगा। गीता का यह वाक्य इतना व्यापक है कि विभिन्न वेदांत-परंपराओं ने इसमें अपने-अपने दार्शनिक आलोक को देखा है।
फिर भी एक बात बार-बार सामने आती है—मनुष्य की वर्तमान आत्म-पहचान अंतिम नहीं है।
जिस ‘मैं’ को हम प्रतिदिन अपना परिचय मानकर चलते हैं, उसके भीतर उससे कहीं गहरा प्रश्न छिपा हो सकता है। उपनिषद् उसे आत्मा की खोज के रूप में देखते हैं, वेदांत उसके परम आधार की तलाश करता है और भक्ति उसी परम सत्ता को भगवान के रूप में अनुभव करती है। गीता इन धाराओं को एक ही संवाद में साथ लेकर चलती है।
इसीलिए कृष्ण का रहस्य केवल यह नहीं है कि उन्होंने अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार किया। उससे कहीं बड़ा रहस्य यह है कि उन्होंने अर्जुन के बाहरी संकट को उसके भीतर के संकट से जोड़ दिया।
अर्जुन के सामने युद्ध था, लेकिन कृष्ण उसे केवल युद्ध नहीं दिखा रहे थे। वे उसे मोह और विवेक के बीच का संघर्ष दिखा रहे थे। वे उसे भय और अभय के बीच का अंतर दिखा रहे थे। वे उसे कर्तृत्व और समर्पण के बीच का संबंध समझा रहे थे।
और शायद इसीलिए गीता का अंतिम रहस्य किसी एक श्लोक में बंद नहीं है।
वह उन दोनों श्लोकों के बीच की उस अदृश्य यात्रा में है, जहां “वासुदेवः सर्वम्” का बोध धीरे-धीरे “मामेकं शरणं व्रज” की अनुभूति की ओर बढ़ता है।
पहले मनुष्य कृष्ण को खोजता है।
फिर कृष्ण के शब्दों को समझने का प्रयास करता है।
फिर उसे लगता है कि जिस सत्य को वह बाहर खोज रहा था, उसका संबंध उसके अपने अस्तित्व से ही है।
और अंततः प्रश्न कृष्ण से हटकर स्वयं ‘मैं’ पर आ टिकता है।
यहीं साधना का स्वरूप बदल जाता है।
खोजने वाला ही खोज का विषय बन जाता है।
तब प्रश्न यह नहीं रह जाता कि कृष्ण कहां हैं।
प्रश्न यह बन जाता है—
वह कौन है, जो कृष्ण से पृथक होकर उन्हें खोज रहा है?
शायद गीता का सबसे गहरा रहस्य इसी प्रश्न की अग्नि में खुलता है।
क्योंकि जब चेतना वास्तव में “वासुदेवः सर्वम्” को देखने की दिशा में बढ़ती है, तब संसार में कुछ भी केवल ‘दूसरा’ नहीं रह जाता। और जब वही चेतना अपने भीतर के अंतिम आग्रह को भी छोड़ने लगती है, तब कृष्ण का वाक्य सुनाई देता है—
“मामेकं शरणं व्रज।”
तब ज्ञान केवल विचार नहीं रहता और भक्ति केवल भावना नहीं रहती। दोनों मिलकर उस आंतरिक परिवर्तन की ओर संकेत करते हैं, जिसमें मनुष्य अपने सीमित अहंकार को अंतिम सत्य मानना छोड़ देता है।
शायद मुक्ति भी इसी अर्थ में बाहर से प्राप्त की जाने वाली कोई वस्तु नहीं है। वह उस आवरण के हटने का नाम है, जिसने मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से अनजान कर रखा है।
इसीलिए कृष्ण को पढ़ने का अर्थ केवल उनके शब्दों को स्मरण कर लेना नहीं है।
अर्थ शायद तब आरंभ होता है, जब उनका कोई एक वाक्य भीतर इतनी गहराई तक उतर जाए कि वह हमारे ‘मैं’ की नींव पर ही प्रश्न खड़ा कर दे।
और यदि कभी ऐसा हुआ, तो गीता केवल पढ़ी नहीं जाएगी।
वह भीतर घटित होगी।