दैनिक इंडिया न्यूज़ ,लखनऊ।कानून का उद्देश्य पीड़ित को न्याय दिलाना है, न कि उसकी आड़ में सरकारी धन के दुरुपयोग का रास्ता खुला छोड़ना। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आर्थिक सहायता के वितरण में संभावित अनियमितताओं को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्त्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कल्याणकारी योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य है, ताकि सरकारी सहायता वास्तविक पात्रों तक पहुँचे और किसी भी संभावित दुरुपयोग की अनदेखी न हो।
मामले की गंभीरता तब सामने आई, जब झाँसी से संबंधित प्रकरणों में एक अधिवक्ता और उनके परिवार के सदस्यों को लगभग 23.36 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दिए जाने का विवरण न्यायालय के समक्ष आया। हाईकोर्ट ने झाँसी के जिलाधिकारी को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के समन्वय से संबंधित मामलों की विस्तृत जाँच तीन महीने में पूरी करने का निर्देश दिया। साथ ही, प्रदेश में ऐसे मामलों की निगरानी के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया।
न्यायालय के निर्देशों का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि जवाबदेही का दायरा सहायता प्राप्त करने वालों तक सीमित नहीं रहेगा। यदि जाँच में किसी अधिकारी या प्राधिकारी की भूमिका में अनियमितता सामने आती है, तो उसके विरुद्ध भी कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। यह निर्देश सरकारी सहायता के सत्यापन, स्वीकृति और वितरण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की आवश्यकता रेखांकित करता है।
हालाँकि, जाँच का आदेश किसी व्यक्ति को दोषी या किसी शिकायत को झूठा घोषित नहीं करता। वास्तविक पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा और सरकारी धन के संभावित दुरुपयोग पर अंकुश—दोनों समान रूप से आवश्यक हैं। न्याय की असली कसौटी यही है कि न निर्दोष के साथ अन्याय हो, न कानून की आड़ में अनुचित लाभ मिले और न ही जवाबदेही से बचने का अवसर।