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लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर में महाघोटाले की दस्तक? करोड़ों के राजकोषीय दुरुपयोग, दोहरे वित्तीय लाभ और पद के दुरुपयोग पर उठे गंभीर प्रश्न; विजिलेंस, सीबीआई व न्यायिक जांच की तेज़ हुई मांग

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लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर में महाघोटाले की दस्तक? करोड़ों के राजकोषीय दुरुपयोग, दोहरे वित्तीय लाभ और पद के दुरुपयोग पर उठे गंभीर प्रश्न; विजिलेंस, सीबीआई व न्यायिक जांच की तेज़ हुई मांग

दैनिक इंडिया न्यूज़ , लखनऊ। उत्तर प्रदेश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के सर्वोच्च संस्थान—विधानसभा एवं विधान परिषद—पर अब ऐसे गंभीर आरोपों की छाया पड़ती दिखाई दे रही है, जिन्होंने शासन-प्रशासन की पारदर्शिता, वित्तीय अनुशासन और संवैधानिक मर्यादाओं पर गहरे प्रश्नचिह्न अंकित कर दिए हैं। शीर्ष प्रशासनिक पदों पर आसीन अधिकारियों पर करोड़ों रुपये के राजकोषीय अनियमितताओं, सेवा नियमों की कथित अवहेलना, पद के दुरुपयोग, दोहरे वित्तीय लाभ तथा नियुक्तियों और पदोन्नतियों में व्यापक अनियमितताओं के आरोपों ने राजनीतिक एवं प्रशासनिक गलियारों में तीव्र हलचल उत्पन्न कर दी है। अब इस पूरे प्रकरण की विजिलेंस, सीबीआई अथवा उच्चस्तरीय न्यायिक जांच की मांग मुखर होती जा रही है।

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राजकोष पर दोहरा प्रहार?—एक साथ पेंशन और पूर्ण वेतन लेने के आरोप

सबसे गंभीर आरोप विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे तथा विधान परिषद के प्रमुख सचिव डॉ. राजेश सिंह से संबंधित बताए जा रहे हैं। आरोप है कि अप्रैल 2019 से प्रदीप कुमार दुबे राजकीय कोषागार से नियमित पेंशन प्राप्त करने के साथ-साथ विधानसभा से पूर्ण वेतन भी आहरित कर रहे हैं। इसी प्रकार जुलाई 2023 में सेवानिवृत्त हो चुके डॉ. राजेश सिंह को विधान परिषद से पेंशन एवं वेतन दोनों का भुगतान एक ही वेतन-पर्ची के माध्यम से किए जाने का दावा किया गया है। आरोप लगाने वालों का कहना है कि वित्तीय नियमावली में ऐसी दोहरी वित्तीय सुविधा का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। यदि ये आरोप सत्य सिद्ध होते हैं, तो यह राजकोषीय अनुशासन पर अत्यंत गंभीर आघात माना जाएगा।

क्या सेवा विस्तार भी नियमों से परे? पुनर्नियुक्ति पर उठे संवैधानिक प्रश्न

प्रकरण का दूसरा अत्यंत संवेदनशील पक्ष कथित पुनर्नियुक्ति एवं सेवा विस्तार से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि संवैधानिक प्रक्रिया एवं सक्षम प्राधिकारी की विधिवत स्वीकृति के अभाव में शीर्ष अधिकारियों को पद पर बनाए रखा गया। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार, एक स्तर पर यह कहा गया कि प्रमुख सचिव का पद अप्रैल 2022 से रिक्त है, जबकि सूचना के अधिकार के अंतर्गत वरिष्ठ अधिकारी द्वारा दिए गए उत्तर में यह उल्लेख किया गया कि संबंधित पद 30 अप्रैल 2019 से रिक्त माना गया, जिस दिन तत्कालीन प्रमुख सचिव सेवानिवृत्त हुए थे। इन परस्पर विरोधी अभिलेखीय तथ्यों ने प्रशासनिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

नियुक्तियों और पदोन्नतियों में कथित धांधली, वरिष्ठता सूची पर भी सवाल

आरोप केवल वित्तीय अनियमितताओं तक सीमित नहीं हैं। दोनों अधिकारियों पर कर्मचारियों की पदोन्नतियों, वरिष्ठता सूची में कथित हस्तक्षेप तथा नियुक्तियों में व्यापक अनियमितताओं के आरोप भी लगाए गए हैं। इसके अतिरिक्त प्रेमपाल आत्महत्या प्रकरण तथा राजकुमार पाल से जुड़े लगभग ₹19 लाख के सहकारी समिति ऋण एवं आवास प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग भी लंबे समय से उठती रही है। आरोपकर्ताओं का कहना है कि इन मामलों की स्वतंत्र जांच से अनेक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।

न्यायालय में लंबित याचिकाएँ, जवाब दाखिल करने में विलंब पर भी प्रश्न

इस पूरे प्रकरण से संबंधित अनेक याचिकाएँ—जिनमें नियमावली विवाद, सीबीआई जांच की मांग तथा रिट ऑफ क्वो वारंटो (Quo Warranto) जैसी संवैधानिक याचिकाएँ शामिल हैं—माननीय उच्च न्यायालय में विचाराधीन बताई जा रही हैं। आरोप है कि न्यायालय द्वारा समय-समय पर अवसर दिए जाने के बावजूद संबंधित पक्षों द्वारा समयबद्ध एवं समुचित उत्तर प्रस्तुत नहीं किए गए, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की जा रही है।

पारदर्शिता बनाम संरक्षण—अब उठ रही निष्पक्ष जांच की मांग

आरोप लगाने वालों का कहना है कि यदि लोकतंत्र के सर्वोच्च संस्थानों में ही वित्तीय अनुशासन, सेवा नियमों और संवैधानिक मर्यादाओं के पालन पर प्रश्न उठने लगें, तो जनविश्वास को गहरा आघात पहुँचता है। इसलिए पूरे प्रकरण की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध विजिलेंस, सीबीआई अथवा न्यायिक जांच कराकर सभी तथ्यों को सार्वजनिक किया जाना आवश्यक है, ताकि यदि कोई दोषी हो तो उसके विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई हो सके और यदि आरोप निराधार हों तो सत्य भी जनता के सामने स्पष्ट हो।

(नोट: उपर्युक्त समाचार में वर्णित आरोप संबंधित पक्षों द्वारा लगाए गए दावों एवं उपलब्ध अभिलेखों पर आधारित हैं। इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों का पक्ष तथा सक्षम जांच अथवा न्यायालय का अंतिम निर्णय आना शेष है।)

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