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प्रबोधन वर्ग के पंचम दिवस पर विज्ञान, संस्कार और संस्कृत चेतना का विराट संगम

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Dainik India News

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प्रबोधन वर्ग के पंचम दिवस पर विज्ञान, संस्कार और संस्कृत चेतना का विराट संगम

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।प्रबोधन वर्ग के पंचम दिवस का सत्र एक गंभीर, गरिमामय और बौद्धिक ऊर्जा से परिपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ, जहाँ दीप प्रज्वलन के साथ आरंभ हुआ यह आयोजन मात्र एक औपचारिक कार्यक्रम न रहकर संस्कृत चेतना, शैक्षिक दायित्व और वैचारिक जागरण का सजीव मंच बन गया। सत्र का शुभारंभ डॉ. महेन्द्र देव, डॉ. सी. एम. सिंह, जितेन्द्र प्रताप सिंह एवं धर्मेन्द्र प्रताप सिंह तोमर के करकमलों द्वारा किया गया। इस अवसर पर उपस्थित प्रशिक्षणार्थियों, अध्यापकों एवं संस्कृतानुरागियों के मन में न केवल उत्साह का संचार हुआ, बल्कि भाषा, संस्कृति और राष्ट्रबोध के प्रति एक नवीन प्रतिबद्धता भी दृष्टिगोचर हुई।


कार्यक्रम का वातावरण प्रारंभ से ही गंभीरता और बौद्धिक उत्कर्ष से ओतप्रोत रहा। प्रबोधन वर्ग का यह पंचम दिवस इस दृष्टि से विशिष्ट रहा कि यहाँ संस्कृत को केवल एक भाषा के रूप में नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन, विज्ञान और मूल्यबोध के संवाहक के रूप में प्रस्तुत किया गया। सत्र में सहभाग कर रहे साधकों के चेहरों पर जिज्ञासा, आत्मसात करने की उत्कंठा और वैचारिक परिपक्वता स्पष्ट दिखाई दे रही थी, मानो प्रत्येक मन संस्कृत के माध्यम से अपने भीतर छिपी बौद्धिक चेतना को स्पर्श कर रहा हो।


इस अवसर पर प्रमुख अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. सी. एम. सिंह, निदेशक, राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान चिकित्सासंस्थान, लखनऊ, ने अपने बहुआयामी व्यक्तित्व से कार्यक्रम को विशेष ऊँचाई प्रदान की। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित सोशल प्रिवेंटिव मेडिसिन के विद्वान, पटना आयुर्विज्ञान संस्थान के पूर्व विभागाध्यक्ष तथा अनेक वैश्विक शोध-पत्रों के लेखक डॉ. सिंह ने यह सिद्ध किया कि संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं, बल्कि आधुनिक चिकित्सा, अनुसंधान और मानव कल्याण की गहन वैज्ञानिक दृष्टि से भी गहराई से जुड़ी हुई है। संस्कृत सप्ताह–2025 के अंतर्गत संस्कृत चिकित्सा पद्धति पर आयोजित उनकी प्रदर्शनी को उपस्थित जनसमुदाय ने विशेष रूप से स्मरण किया, जिसने परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु का कार्य किया।


कार्यक्रम में डॉ. महेन्द्र देव, निदेशक, माध्यमिक शिक्षा, उत्तर प्रदेश की उपस्थिति ने आयोजन को प्रशासनिक और शैक्षिक दृष्टि से भी सुदृढ़ता प्रदान की। उन्होंने प्रदेश में माध्यमिक संस्कृत विद्यालयों के सुदृढ़ीकरण, शिक्षकों के प्रशिक्षण और संस्कृत शिक्षण को नई दिशा देने हेतु किए गए अपने प्रयासों के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि यदि नीति, नीयत और संस्कार एक साथ हों, तो शिक्षा केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण की प्रक्रिया बन जाती है। संस्कृतभारती के प्रति उनका सतत सहयोग और प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता, संगठनात्मक चेतना का प्रेरक उदाहरण है।


प्रबोधन वर्ग का यह सत्र केवल वक्तव्यों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक वैचारिक संवाद, एक अंतर्मंथन और एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण की अनुभूति में परिवर्तित हो गया। यहाँ संस्कृत को स्मरण की नहीं, साधना की भाषा के रूप में अनुभव किया गया। प्रशिक्षणार्थियों का भाषा के प्रति समर्पण, अनुशासन और ग्रहणशीलता यह संकेत दे रही थी कि संस्कृत आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा, समाधान और दिशा प्रदान करने में सक्षम है।


समग्र रूप से यह पंचम दिवस संस्कृत, शिक्षा और चेतना के त्रिवेणी संगम के रूप में स्मरणीय बन गया, जहाँ ज्ञान ने संस्कार को, संस्कार ने दृष्टि को और दृष्टि ने जीवन को अर्थ प्रदान किया। यही प्रबोधन वर्ग की वास्तविक उपलब्धि है—मनुष्य को भाषा नहीं, दृष्टिकोण देना।

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