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विकसित भारत-2047 की पैरवी करेंगे युवा विधिवेत्ता, योगी बोले— फैसला इतिहास सुनाएगा, बहस आपको करनी है

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विकसित भारत-2047 की पैरवी करेंगे युवा विधिवेत्ता, योगी बोले— फैसला इतिहास सुनाएगा, बहस आपको करनी है
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लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के पंचम दीक्षान्त समारोह में संविधान, न्यायिक स्वतंत्रता और नैतिकता का संदेश; न्यायमूर्ति विक्रम नाथ व मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली की गरिमामयी उपस्थिति। मुख्यमंत्री ने युवा अधिवक्ताओं को बताया 140 करोड़ नागरिकों के विश्वास का प्रतिनिधि, कहा— एआई को सहायक बनाइए, विवेक को नहीं।

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दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।विकसित भारत-2047 की निर्णायक लड़ाई केवल आर्थिक प्रगति के मोर्चे पर नहीं, बल्कि संविधान की सर्वोच्चता, न्याय की निष्पक्षता और नागरिकों के विश्वास की कसौटी पर भी लड़ी जाएगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के पंचम दीक्षान्त समारोह में युवा विधिवेत्ताओं को इसी ऐतिहासिक दायित्व का बोध कराते हुए कहा कि विकसित भारत का मुकदमा देश के 140 करोड़ नागरिकों की आकांक्षाओं से जुड़ा है। इसकी पैरवी आज के युवा विधिवेत्ताओं को करनी है, जबकि फैसला इतिहास सुनाएगा। उनका संदेश स्पष्ट था— विधि की डिग्री केवल करियर का प्रवेशपत्र नहीं, बल्कि संविधान, न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का दायित्व है।

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समारोह में उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरुण भंसाली की गरिमामयी उपस्थिति रही। मुख्यमंत्री ने मेधावी विद्यार्थियों को पदक एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान किए। उन्होंने कहा कि ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ और ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना का सबसे मजबूत आधार संविधान है। शासन की विश्वसनीयता तभी कायम रह सकती है, जब कानून व्यक्ति, पद और सत्ता से ऊपर हो तथा प्रत्येक नागरिक को न्याय पाने का समान अवसर मिले।

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युवा विधिवेत्ताओं को नैतिकता का पाठ पढ़ाते हुए मुख्यमंत्री ने कुलपति प्रो. अमर पाल सिंह द्वारा उद्धृत सूत्र—‘सत्यं वद, धर्मं चर, स्वाध्यायान्मा प्रमदः’—को विधि व्यवसाय की मूल कसौटी बताया। सत्य बोलना, धर्मानुकूल आचरण करना और अध्ययन में निरंतर संलग्न रहना केवल आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता के आधार हैं। उन्होंने आपातकाल और न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना की ऐतिहासिक असहमति का उल्लेख करते हुए समझाया कि न्यायपालिका की वास्तविक शक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों में भी संवैधानिक सिद्धांतों पर अडिग रहने में निहित है। कानून का शासन किसी शासक की इच्छा का पर्याय नहीं, बल्कि सत्ता को भी विधि की मर्यादा में रखने वाली व्यवस्था है।

मुख्यमंत्री ने विधिवेत्ता के व्यक्तित्व को शिव की अविचलता, कृष्ण की संवेदनशीलता और भगवान राम की मर्यादा एवं वचनबद्धता से जोड़ते हुए कहा कि न्याय के लिए तार्किक बुद्धि के साथ मानवीय करुणा और नैतिक दृढ़ता भी आवश्यक है। उन्होंने अप्रासंगिक कानूनों को समाप्त करने, जन विश्वास अधिनियम के तहत छोटे उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने, जीएसटी और दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता जैसे सुधारों का उल्लेख करते हुए कहा कि विधिक सुधारों का उद्देश्य व्यवस्था को अधिक सरल, उत्तरदायी और नागरिक-केंद्रित बनाना होना चाहिए।

उत्तर प्रदेश में वर्ष 2017 के बाद हुए बदलावों का उल्लेख करते हुए योगी आदित्यनाथ ने कानून-व्यवस्था, निवेश और आधारभूत सुविधाओं को विकास की अनिवार्य शर्त बताया। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश में माफिया के प्रभाव की जगह कानून का शासन स्थापित करने की दिशा में निर्णायक काम हुआ है। स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत तीन करोड़ से अधिक शौचालयों के निर्माण तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में इंसेफेलाइटिस के विरुद्ध प्रयासों का उल्लेख करते हुए उन्होंने स्वच्छता, शुद्ध पेयजल और जनस्वास्थ्य को सुशासन से जोड़ा। साथ ही, वर्ष 2029-30 तक उत्तर प्रदेश को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य का उल्लेख किया।

तकनीक के तेजी से बदलते परिदृश्य पर मुख्यमंत्री ने युवा विधिवेत्ताओं को विशेष रूप से सचेत किया। डीपफेक, साइबर अपराध और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से उत्पन्न चुनौतियों के बीच उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की प्रामाणिकता तथा वैज्ञानिक जांच को न्यायिक प्रक्रिया के लिए अनिवार्य बताया। उनका सूत्र था— “एआई को सहायक बनाइए, सारथी नहीं।” मशीन शोध और विश्लेषण में मदद कर सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय मानवीय विवेक, नैतिकता और उत्तरदायित्व के आधार पर ही होना चाहिए। उन्होंने प्रदेश के सभी 75 जनपदों में साइबर थानों की स्थापना, 1,583 थानों में साइबर हेल्प डेस्क और ‘एआई प्रज्ञा’ के माध्यम से युवाओं को तकनीकी प्रशिक्षण देने के प्रयासों का भी उल्लेख किया।

मुख्यमंत्री ने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे अन्याय के सामने मूकदर्शक न बनें, डिजिटल दुनिया तक सीमित न रहें और ग्रामीण समाज की वास्तविक समस्याओं से जुड़ें। छोटे भूमि एवं पारिवारिक विवादों को संवाद के माध्यम से सुलझाने में सहयोग देने, नए कानूनों और न्यायिक निर्णयों का निरंतर अध्ययन करने तथा अनुचित समझौतों से दूर रहने की सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि अधिवक्ता की प्रतिष्ठा उसकी विधिक दक्षता के साथ उसकी नैतिक विश्वसनीयता से भी निर्धारित होती है।

समारोह में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि डिग्री प्राप्त करना यात्रा का अंत नहीं, बल्कि नए दायित्वों की शुरुआत है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरुण भंसाली ने इसे अर्जित ज्ञान और समाज तथा संविधान के प्रति स्वीकार की गई जिम्मेदारियों का अवसर बताया। कुलपति प्रो. अमर पाल सिंह ने विश्वविद्यालय की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां से शिक्षित 250 से अधिक विद्यार्थी विभिन्न न्यायिक सेवाओं में कार्यरत हैं। समारोह में उच्च शिक्षा मंत्री योगेन्द्र उपाध्याय, कुलसचिव केशव कुमार, उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तिगण, विद्यार्थी और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

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