ब्रेकिंग न्यूज़
इस्कॉन लखनऊ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर भव्य अभिषेक एवं पूजन | महापौर के निर्देश से जोन 3 की समस्याओं के निदान के लिए त्वरित कार्रवाई की सहमति | एक करोड़ के चेक से हथकड़ी-बेड़ियों तक के आरोप, अदालत ने मांगी पुलिस आख्या | जनगणना में संस्कृत की असली तस्वीर सामने लाने की मुहिम | राजधानी लखनऊ रामपुर देवरई में आयुष चिकित्सा को मिला नया संस्थागत आधार | 70 साल बाद भी बीमा बाजार का भरोसा, एलआईसी ने खोला सामाजिक दायित्व का नया अध्याय | 43 कंपनियों के कर्ज में ₹3.53 लाख करोड़ का अंतर | जम्मू में यूपी की 38 सदस्यीय वोवीनाम टीम दिखाएगी दम | इस्कॉन लखनऊ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर भव्य अभिषेक एवं पूजन | महापौर के निर्देश से जोन 3 की समस्याओं के निदान के लिए त्वरित कार्रवाई की सहमति | एक करोड़ के चेक से हथकड़ी-बेड़ियों तक के आरोप, अदालत ने मांगी पुलिस आख्या | जनगणना में संस्कृत की असली तस्वीर सामने लाने की मुहिम | राजधानी लखनऊ रामपुर देवरई में आयुष चिकित्सा को मिला नया संस्थागत आधार | 70 साल बाद भी बीमा बाजार का भरोसा, एलआईसी ने खोला सामाजिक दायित्व का नया अध्याय | 43 कंपनियों के कर्ज में ₹3.53 लाख करोड़ का अंतर | जम्मू में यूपी की 38 सदस्यीय वोवीनाम टीम दिखाएगी दम |
हाइलाइट न्यूज़
खुफिया रिपोर्ट पर शासन सतर्क, बृजलाल के सवाल पर सरकार हुई अलर्ट — हजारों सफाईकर्मियों पर जांच की आंच गोरखपुर में विकास की रफ्तार: मुख्यमंत्री ने दिए सुरक्षा और पर्यटन को नई दिशा अधिकारी मस्त किसान पस्त, मुख्यमंत्री की उम्मीदों पर पानी फेर रहा है सहकारिता विभाग RSS के वरिष्ठ प्रचारक बालकृष्ण के निधन पर सीएम योगी ने दी विनम्र श्रद्धांजलि मुख्यमंत्री ने किसान सम्मेलन को सम्बोधित किया, Dainik India News Hiring Freshers for Software & Marketing Teams लखनऊ का सौभाग्य कि श्रद्धेय अटल जी ने इसका प्रतिनिधित्व किया था: सीएम योगी खुफिया रिपोर्ट पर शासन सतर्क, बृजलाल के सवाल पर सरकार हुई अलर्ट — हजारों सफाईकर्मियों पर जांच की आंच गोरखपुर में विकास की रफ्तार: मुख्यमंत्री ने दिए सुरक्षा और पर्यटन को नई दिशा अधिकारी मस्त किसान पस्त, मुख्यमंत्री की उम्मीदों पर पानी फेर रहा है सहकारिता विभाग RSS के वरिष्ठ प्रचारक बालकृष्ण के निधन पर सीएम योगी ने दी विनम्र श्रद्धांजलि मुख्यमंत्री ने किसान सम्मेलन को सम्बोधित किया, Dainik India News Hiring Freshers for Software & Marketing Teams लखनऊ का सौभाग्य कि श्रद्धेय अटल जी ने इसका प्रतिनिधित्व किया था: सीएम योगी
अपराध ब्रेकिंग हिन्दी

26 वर्ष से अधिक कारावास के बाद भी दारा सिंह की रिहाई अधर में, 19 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में निर्णायक सुनवाई

D

Dainik India News

19417 views

स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड की प्रक्रिया, दीर्घ कारावास और जेल में सदाचरण के बावजूद निर्णय लंबित; वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. ए.पी. सिंह ने उठाए गंभीर प्रश्न—क्या न्यायिक प्रक्रिया, सरकारी निर्णय और संवैधानिक मर्यादा के बीच कहीं कोई अदृश्य अवरोध खड़ा है?

दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।छब्बीस वर्ष से अधिक का कारावास, जेल में संतोषजनक आचरण, समयपूर्व रिहाई पर विचार की प्रक्रिया और स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड की कवायद—इन सबके बावजूद दारा सिंह की रिहाई का प्रश्न अभी भी अनिर्णीत है। वर्ष 1999 के बहुचर्चित ग्राहम स्टेन्स हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे दारा सिंह की समयपूर्व रिहाई को लेकर अब निगाहें 19 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय में होने वाली सुनवाई पर टिक गई हैं। इस बीच वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. ए.पी. सिंह ने रिहाई में हो रहे विलंब को लेकर गंभीर प्रश्न उठाते हुए शासन-प्रशासन से निर्णय के आधार को स्पष्ट करने की आवश्यकता पर बल दिया है।

दारा सिंह का प्रकरण भारतीय न्यायिक इतिहास के उन मामलों में शामिल है, जिसने देश की सामाजिक चेतना और विधिक विमर्श दोनों को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। 22 जनवरी 1999 को ओडिशा के क्योंझर जिले के मनोहरपुर गांव में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टुअर्ट स्टेन्स और उनके दो नाबालिग पुत्रों की वाहन के भीतर जलाकर हत्या कर दी गई थी। अभियोजन के अनुसार, इस जघन्य कृत्य में दारा सिंह की प्रमुख भूमिका थी। घटना के बाद देशभर में तीव्र आक्रोश उत्पन्न हुआ और मामला राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया।

मामले की न्यायिक परिणति भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही। निचली अदालत ने वर्ष 2003 में दारा सिंह को मृत्युदंड सुनाया था। इसके पश्चात ओडिशा हाई कोर्ट ने वर्ष 2005 में मृत्युदंड को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया। आगे चलकर सर्वोच्च न्यायालय ने भी आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा। इस प्रकार वर्तमान विवाद उनकी दोषसिद्धि अथवा मूल दंडादेश को चुनौती देने का नहीं, बल्कि दीर्घ कारावास के पश्चात समयपूर्व रिहाई यानी remission की वैधानिक प्रक्रिया से संबंधित है।

रिहाई के प्रश्न ने क्यों पकड़ा जोर?

दारा सिंह की ओर से लंबे समय से कारावास में रहने के आधार पर समयपूर्व रिहाई की मांग की गई है। इसी क्रम में स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड के समक्ष उनके मामले पर विचार हुआ। इस प्रक्रिया में कैदी की कारावास अवधि, जेल आचरण तथा अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों का परीक्षण किया जाता है। किंतु किसी बंदी द्वारा निर्धारित अवधि पूर्ण कर लेना अपने आप में उसकी रिहाई का स्वतःसिद्ध अधिकार नहीं बन जाता; अंतिम निर्णय लागू नियमों, समीक्षा प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय पर निर्भर करता है।

यहीं से वर्तमान घटनाक्रम महत्वपूर्ण हो जाता है। जुलाई में ओडिशा के स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड के समक्ष अनेक आजीवन कारावास भुगत रहे कैदियों के मामलों पर विचार हुआ। बाद में राज्य सरकार की ओर से कुछ कैदियों को समयपूर्व रिहाई प्रदान की गई, लेकिन दारा सिंह का नाम उस सूची में नहीं आया। इसके बाद उनकी रिहाई को लेकर प्रश्न और अधिक मुखर हो गया।

डॉ. ए.पी. सिंह ने पूछा—आखिर विलंब का कारण क्या है?

वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. ए.पी. सिंह ने अपने वक्तव्य में प्रश्न उठाया कि यदि दारा सिंह 26 वर्ष से अधिक समय जेल में व्यतीत कर चुके हैं, उनका जेल आचरण संतोषजनक रहा है और स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड की प्रक्रिया भी हो चुकी है, तो 14 अगस्त तक उनकी रिहाई क्यों नहीं हुई।

डॉ. सिंह ने इस संदर्भ में यह भी प्रश्न किया कि कहीं इस मामले में कोई राजनीतिक अथवा धार्मिक प्रभाव तो बाधक नहीं बन रहा। हालांकि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि राजनीतिक अथवा धार्मिक कारण से रिहाई रोके जाने की बात फिलहाल स्थापित तथ्य नहीं है, बल्कि वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा व्यक्त की गई आशंका और उठाया गया प्रश्न है। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी में प्रक्रिया से संबंधित रिकॉर्ड, सत्यापन और प्रशासनिक विचार-विमर्श जैसे पहलू सामने आए हैं।

यही अंतर इस मामले को कानूनी रूप से संवेदनशील बनाता है। किसी आशंका को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उसके उत्तर के लिए सक्षम शासन अथवा न्यायालय की ओर देखना ही पत्रकारिता और विधिक मर्यादा दोनों की अपेक्षा है।

‘एक दिन की पैरोल भी नहीं हुई’—मानवीय पक्ष भी सामने

डॉ. ए.पी. सिंह ने दारा सिंह के दीर्घ कारावास के मानवीय पक्ष को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि उनके अनुसार दारा सिंह को इतने लंबे समय में एक दिन की पैरोल अथवा अंतरिम जमानत तक नहीं मिली। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उनके माता-पिता और परिवार के अनेक सदस्य अब इस दुनिया में नहीं हैं।

यह पक्ष किसी भी प्रकार से मूल अपराध या दोषसिद्धि को कमतर नहीं करता, किंतु समयपूर्व रिहाई की व्यवस्था में दंडात्मक प्रतिफल, सुधारात्मक दृष्टिकोण, बंदी के आचरण और मानवीय परिस्थितियों के बीच संतुलन का प्रश्न अवश्य उपस्थित करता है।

19 अगस्त पर टिकी न्यायिक दृष्टि

मामले में अब 19 अगस्त की सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह देखा जाना है कि राज्य सरकार ने दारा सिंह की remission याचिका पर क्या निर्णय लिया है और समीक्षा की प्रक्रिया किस निष्कर्ष तक पहुंची है।

यहां यह तथ्य विशेष रूप से रेखांकित किया जाना आवश्यक है कि सर्वोच्च न्यायालय ने दारा सिंह को अभी रिहा करने का अंतिम आदेश नहीं दिया है। वर्तमान चरण में प्रश्न राज्य सरकार की remission प्रक्रिया और उसके निर्णय से संबंधित है। अतः 19 अगस्त की सुनवाई को किसी निश्चित रिहाई के रूप में देखना कानूनी दृष्टि से उचित नहीं होगा।

दारा सिंह प्रकरण से जुड़ा सबसे संवेदनशील प्रश्न

ग्राहम स्टेन्स और उनके दोनों मासूम पुत्रों की हत्या की स्मृति आज भी इस मामले को असाधारण संवेदनशीलता प्रदान करती है। इसलिए दारा सिंह की समयपूर्व रिहाई का प्रश्न केवल एक बंदी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है। इसके साथ पीड़ित परिवार की पीड़ा, दंड की अवधारणा, सुधारात्मक न्याय, राज्य की remission नीति और न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता जैसे बहुआयामी प्रश्न जुड़े हुए हैं।

एक ओर दीर्घकालिक कारावास के पश्चात सुधार और पुनर्वास की अवधारणा है, तो दूसरी ओर उस जघन्य अपराध से जुड़े पीड़ित पक्ष के प्रति न्याय और संवेदनशीलता का प्रश्न है। विधि का वास्तविक संतुलन इसी द्वंद्व के बीच अपनी कसौटी पर परखा जाता है।

बार और बेंच की गरिमा पर डॉ. ए.पी. सिंह की चिंता

इसी प्रकरण के संदर्भ में डॉ. ए.पी. सिंह ने न्यायपालिका और अधिवक्ता समुदाय के पारस्परिक संबंधों पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने बार काउंसिल ऑफ इंडिया, बार एसोसिएशनों तथा जिला बार एसोसिएशनों को अधिवक्ताओं के लिए मार्गदर्शक और संस्कारदाता संस्थाओं के रूप में रेखांकित किया।

उनका कहना है कि अधिवक्ताओं को न्यायालय के प्रति सम्मान, पेशेवर आचरण तथा बार और बेंच के मध्य गरिमापूर्ण समन्वय की शिक्षा इन्हीं संस्थाओं से प्राप्त होती है। यदि न्यायालयों के आदेशों अथवा निर्णयों के प्रति सम्मान की भावना क्षीण होती है, तो उसका दुष्प्रभाव आने वाली पीढ़ी के अधिवक्ताओं तथा संपूर्ण न्यायिक व्यवस्था पर पड़ सकता है।

डॉ. सिंह ने चेताया कि यदि बार और बेंच के मध्य संवाद की मर्यादा भंग हुई और अपमानजनक अथवा अशोभनीय भाषा का चलन बढ़ा, तो भविष्य में अनावश्यक टकराव की परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। उन्होंने इसे न्याय व्यवस्था की गरिमा के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया।

‘हम अपनी मां और जननी को भूल रहे हैं

अधिवक्ता संगठनों की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए डॉ. ए.पी. सिंह ने जिला बार एसोसिएशन को अधिवक्ताओं की ‘मां’ और ‘जननी’ के समान बताया। उनका आशय था कि जिस संस्था से अधिवक्ता पेशेवर संस्कार, अनुशासन और न्यायालय की गरिमा का पाठ सीखता है, उसके मूल्यों की उपेक्षा अंततः उसी न्यायिक व्यवस्था को प्रभावित करती है जिसकी सेवा का संकल्प अधिवक्ता लेता है।

दारा सिंह प्रकरण अब इसी दोहरे विमर्श के बीच खड़ा है—एक ओर 26 वर्ष से अधिक के कारावास के बाद समयपूर्व रिहाई की वैधानिक कसौटी, दूसरी ओर 1999 के जघन्य अपराध की स्मृति और पीड़ित पक्ष के न्याय का प्रश्न। इन दोनों के बीच विधि का संतुलन ही अंतिम निर्णायक होना चाहिए।

19 अगस्त की सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई इसलिए महज एक अगली तारीख नहीं, बल्कि इस पूरे प्रकरण की आगामी दिशा निर्धारित करने वाला महत्वपूर्ण न्यायिक पड़ाव है। निगाहें अब इस बात पर हैं कि ओडिशा सरकार remission के प्रश्न पर क्या निर्णय प्रस्तुत करती है और सर्वोच्च न्यायालय उस निर्णय तथा संबंधित अभिलेखों के आलोक में आगे क्या रुख अपनाता है।

वीडियो

टिप्पणियाँ

अभी कोई टिप्पणी नहीं। पहले टिप्पणी करें!