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“भोजशाला की विजय सनातन स्वाभिमान का पुनर्जागरण” — जितेंद्र प्रताप सिंह

ज्ञानवापी और मथुरा विजय के लिए कुलदीप तिवारी को दी अग्रिम शुभकामनाएँ, कहा — “यह संघर्ष किसी व्यक्ति का नहीं, समस्त राष्ट्र की आत्मा का युद्ध है”

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Dainik India News

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“भोजशाला की विजय सनातन स्वाभिमान का पुनर्जागरण” — जितेंद्र प्रताप सिंह

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।  राष्ट्रीय सनातन महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह ने भोजशाला प्रकरण में प्राप्त ऐतिहासिक विजय पर याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी को विशेष बधाई एवं शुभकामनाएँ प्रेषित करते हुए कहा कि यह निर्णय केवल न्यायालय की विजय नहीं, बल्कि भारत की सनातन चेतना, सांस्कृतिक स्वाभिमान और सभ्यतागत पुनर्जागरण का ऐतिहासिक उद्घोष है। उन्होंने कहा कि सदियों तक दबाई गई आस्था जब पुनः न्याय के साथ खड़ी होती है, तब केवल एक मंदिर नहीं जागता — राष्ट्र की आत्मा जागती है।

जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि कुलदीप तिवारी ने जिस धैर्य, राष्ट्रनिष्ठा, वैचारिक प्रखरता और अदम्य संकल्प के साथ भोजशाला प्रकरण को न्यायालय तक पहुँचाया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत रहेगा। उन्होंने कहा कि कुलदीप तिवारी का यह प्रयास किसी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा या प्रसिद्धि का विषय नहीं, बल्कि सनातन की मूल चेतना को पुनः जागृत करने का अभियान है। उनका संघर्ष उन करोड़ों लोगों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो भारत की सांस्कृतिक विरासत को उसके वास्तविक स्वरूप में पुनः स्थापित होते देखना चाहते हैं।

उन्होंने विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि जिस प्रकार भोजशाला प्रकरण में सत्य ने अंततः विजय प्राप्त की है, उसी प्रकार ज्ञानवापी और मथुरा के विषय में भी सत्य का सूर्य अवश्य उदित होगा। उन्होंने कुलदीप तिवारी को अग्रिम शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि यह लड़ाई केवल न्यायालयों में लड़ी जाने वाली कानूनी लड़ाई नहीं है, बल्कि यह भारत की सभ्यतागत स्मृतियों, सनातन अस्मिता और राष्ट्र आत्मगौरव की पुनर्प्रतिष्ठा का संघर्ष है।

जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि कुलदीप तिवारी का स्वभाव बचपन से ही राष्ट्रप्रेम और भारतीय संस्कृति के प्रति समर्पण से ओतप्रोत रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से प्राप्त संस्कारों ने उनके भीतर राष्ट्र और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा का निर्माण किया। यही कारण है कि उन्होंने अपने जीवन की व्यक्तिगत सुविधाओं से ऊपर उठकर उन विषयों को अपना दायित्व बनाया जिन्हें अधिकांश लोग केवल इतिहास मानकर छोड़ चुके थे।

उन्होंने कहा कि इतिहास में कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो स्वयं से बड़े उद्देश्य के लिए जीते हैं। कुलदीप तिवारी उन्हीं व्यक्तित्वों में से एक हैं। उनका संघर्ष केवल उनका व्यक्तिगत संघर्ष नहीं, बल्कि समस्त सनातन समाज और राष्ट्र चेतना का संघर्ष है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राष्ट्रीय सनातन महासंघ और राष्ट्रनिष्ठ समाज का प्रत्येक कार्यकर्ता इस लड़ाई में उनके साथ कदम से कदम मिलाकर खड़ा है और भविष्य में भी पूर्ण शक्ति एवं प्रतिबद्धता के साथ खड़ा रहेगा।

जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि भोजशाला की विजय यह प्रमाणित करती है कि सत्य को कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है, किंतु पराजित नहीं किया जा सकता। जब कोई समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने का साहस करता है, तब इतिहास स्वयं करवट लेता है। उन्होंने कहा कि आज भारत एक ऐसे कालखंड में प्रवेश कर रहा है जहाँ वह अपनी सभ्यता को संकोच से नहीं, बल्कि गर्व और आत्मविश्वास के साथ देखना चाहता है। भोजशाला उसी जागृत भारत का प्रतीक है।

उन्होंने अंत में कहा कि आने वाला समय भारत की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का समय है। ज्ञानवापी, मथुरा और ऐसे अनेक विषय केवल मंदिरों के प्रश्न नहीं हैं, बल्कि वे उस राष्ट्र की आत्मा से जुड़े विषय हैं जिसने हजारों वर्षों तक विश्व को ज्ञान, अध्यात्म और मानवता का मार्ग दिखाया। ऐसे में कुलदीप तिवारी जैसे राष्ट्रनिष्ठ व्यक्तित्वों का संघर्ष केवल वर्तमान का संघर्ष नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सांस्कृतिक भविष्य का संरक्षण है।

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