हरेंद्र सिंह दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दिल्ली।राष्ट्रों का पतन अचानक नहीं होता। वह धीरे-धीरे आरंभ होता है — पहले उनकी स्मृतियाँ छीनी जाती हैं, फिर उनके प्रतीक धूमिल किए जाते हैं, फिर उनकी संतानों को उनके ही इतिहास पर संदेह करना सिखाया जाता है। और अंततः एक ऐसा समय आता है जब कोई सभ्यता अपने ही तीर्थों के सामने स्वयं को पराया अनुभव करने लगती है। भारत ने यह पीड़ा केवल देखी नहीं, शताब्दियों तक भोगी है। किंतु इतिहास का एक अटल नियम है — सत्य चाहे जितनी गहराई में दबा दिया जाए, वह किसी न किसी दिन पृथ्वी को फाड़कर पुनः बाहर आता ही है। मध्यप्रदेश के धार स्थित भोजशाला की कथा उसी दबे हुए सत्य के पुनरुत्थान की कथा है। यह केवल एक प्राचीन स्थल की कहानी नहीं, बल्कि उस राष्ट्रात्मा की व्यथा है जिसे सदियों तक मौन रखने का प्रयास किया गया। यह केवल न्यायालय का मुकदमा नहीं, बल्कि उस सभ्यता का प्रतिघोष है जो अपमान, विकृति और ऐतिहासिक धुंध के बीच भी जीवित रही।
धार की उस भूमि पर जब प्रातःकालीन सूर्य की पहली किरण उतरती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो पत्थरों के भीतर दबे हजारों वर्षों के शब्द फिर से जाग उठे हों। भोजशाला कोई साधारण स्थापत्य नहीं थी। वह भारत की ज्ञान-संस्कृति का धड़कता हुआ हृदय थी। यह वही भूमि मानी जाती है जहाँ माँ वाग्देवी, माँ सरस्वती का प्राकट्य हुआ। वही भूमि जहाँ ज्ञान केवल अर्जित नहीं किया जाता था, साधा जाता था। जहाँ शास्त्र केवल पढ़े नहीं जाते थे, जिए जाते थे। जहाँ शिक्षा जीविका नहीं, साधना थी। कहते हैं कि भोजशाला के प्रांगण में जब विद्वान वेदों की ऋचाएँ गाते थे, तब वातावरण केवल ध्वनित नहीं होता था, वह दिव्यता से स्पंदित हो उठता था। संस्कृत के श्लोकों की तरंगें दूर-दूर तक फैलती थीं और उस समय का भारत संसार को यह बता रहा था कि सभ्यता केवल शस्त्रों से नहीं, शास्त्रों से महान बनती है।
उस युग का केंद्र थे परमार वंश के महाप्रतापी सम्राट राजा भोज। इतिहास के असंख्य राजाओं के बीच राजा भोज का व्यक्तित्व किसी अलौकिक नक्षत्र की भाँति चमकता है। वे केवल सिंहासन पर बैठने वाले राजा नहीं थे; वे विचारों के सम्राट थे। वह समय जब संसार का बड़ा भाग युद्ध, रक्तपात और साम्राज्य विस्तार में डूबा हुआ था, उस समय राजा भोज ज्ञान, साहित्य, स्थापत्य, चिकित्सा, खगोल, दर्शन और विज्ञान का ऐसा साम्राज्य निर्मित कर रहे थे जिसकी गूँज आज भी भारतीय चेतना में सुनाई देती है। कहा जाता है कि उन्होंने 84 से अधिक ग्रंथों की रचना की। समरांगण सूत्रधार जैसे ग्रंथ केवल वास्तुशास्त्र नहीं थे; वे भारतीय वैज्ञानिक प्रतिभा के जीवंत प्रमाण थे। उसमें नगर निर्माण, यांत्रिकी, स्थापत्य और यहाँ तक कि उड़ने वाले यंत्रों तक का उल्लेख मिलता है। सरस्वतीकण्ठाभरण संस्कृत व्याकरण का अनुपम वैभव था और राजमार्तण्ड भारतीय दर्शन की गंभीर व्याख्या। धार उस समय केवल एक राजधानी नहीं थी — वह संपूर्ण भारत की बौद्धिक राजधानी थी।
किंतु इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि जहाँ प्रकाश सबसे अधिक होता है, आक्रमण भी वहीं सबसे क्रूर होते हैं। भोजशाला भी विदेशी आक्रांताओं की विकृत दृष्टि से बच नहीं सकी। उसके मूल स्वरूप को धूमिल करने का प्रयास हुआ। उसके प्रतीकों को विकृत किया गया। उसके वैभव पर परत-दर-परत धूल डाली गई। किंतु कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिन्हें मिटाने के लिए सदियाँ भी अपर्याप्त सिद्ध होती हैं। भोजशाला के स्तंभों पर अंकित संस्कृत अभिलेख निरंतर गवाही देते रहे। देवी सरस्वती से जुड़े पुरातात्त्विक साक्ष्य मौन होकर भी सत्य उद्घाटित करते रहे। परमारकालीन स्थापत्य शैली हर पत्थर से अपनी पहचान पुकारती रही। ब्रिटिश गजेटियरों के उल्लेख भी संकेत देते रहे कि यह स्थल मूलतः एक प्राचीन सरस्वती मंदिर एवं शिक्षा केंद्र था।
फिर भी समय ऐसा आया जब उसी भूमि पर, जहाँ कभी वेदों का निनाद होता था, हिंदुओं के प्रवेश तक पर प्रतिबंध जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी गईं। यह केवल धार्मिक पीड़ा नहीं थी; यह सभ्यता की आत्मा पर किया गया प्रहार था। एक ऐसा प्रहार जिसने असंख्य लोगों के भीतर मौन वेदना को जन्म दिया, किंतु अधिकांश लोग उस पीड़ा को शब्द नहीं दे पाए। इतिहास जैसे किसी ऐसे व्यक्ति की प्रतीक्षा कर रहा था जो उस मौन को आवाज दे सके।
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जनपद में मई 1984 में जन्मे कुलदीप तिवारी शायद स्वयं भी नहीं जानते थे कि उनका जीवन एक दिन भारत के सबसे चर्चित सांस्कृतिक संघर्षों में दर्ज होने वाला है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से संचालित सरस्वती शिशु मंदिर एवं विद्या मंदिर में प्राप्त संस्कारों ने उनके भीतर राष्ट्र और संस्कृति के प्रति गहरी आस्था का बीजारोपण किया। उन्होंने लगभग 18 वर्षों तक शिक्षक के रूप में कार्य किया। वे विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाते थे; वे उन्हें राष्ट्रचेतना का संस्कार देते थे। किंतु इतिहास उन लोगों को कभी सामान्य जीवन नहीं जीने देता जिनके हिस्से में संघर्ष लिखा होता है। काशी, मथुरा, ज्ञानवापी और भोजशाला जैसे विषयों को मुखरता से उठाने के कारण वर्ष 2024 में उन्हें शिक्षण कार्य से कार्यमुक्त कर दिया गया। बहुतों के लिए यह अंत होता, परंतु उनके लिए यह प्रारंभ था।
और फिर एक दिन एक ऐसा क्षण आया जिसने इतिहास की दिशा बदल दी। सोशल मीडिया पर एक पोस्टर उनकी दृष्टि में आया। उस पोस्टर पर लिखा था — “भोजशाला में हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है।” यह केवल एक वाक्य नहीं था; यह किसी सभ्यता के घाव पर रखा गया जलता हुआ अंगार था। कुलदीप तिवारी बताते हैं कि उस एक पंक्ति ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। माता सरस्वती के प्राकट्य स्थल पर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित? यह केवल धार्मिक अन्याय नहीं था; यह राष्ट्र की आत्मा का अपमान था। उसी क्षण उनके भीतर एक ऐसा संकल्प जन्मा जिसने आने वाले वर्षों में इतिहास की दिशा मोड़ दी।
जुलाई 2021 से भोजशाला विषय पर व्यवस्थित अध्ययन आरंभ हुआ। सोशल मीडिया, इंटरनेट, प्रशासनिक दस्तावेज, पुरातात्त्विक साक्ष्य, ऐतिहासिक अभिलेख — हर स्रोत को खंगाला गया। अगस्त 2021 में धार भोजशाला समिति से संपर्क स्थापित हुआ। अनेक अड़चनें आईं। कई लोगों ने इसे असंभव संघर्ष बताया। कई लोगों ने कहा कि सदियों पुराना यह विषय कभी निर्णायक परिणाम तक नहीं पहुँच सकेगा। किंतु इतिहास उन्हीं के पक्ष में खड़ा होता है जो असंभव के सामने घुटने नहीं टेकते।
सबसे बड़ा प्रश्न था — न्यायालय में इस संघर्ष की अगुवाई कौन करेगा? तभी वरिष्ठ अधिवक्ता हरि शंकर जैन से संपर्क किया गया। ज्ञानवापी और मथुरा जैसे मामलों से जुड़े हरि शंकर जैन ने जब भोजशाला का तथ्यात्मक पक्ष सुना, तो वे सहर्ष तैयार हो गए। प्रमाणों का संग्रह प्रारंभ हुआ। दस्तावेजों की खोज हुई। पुरातात्त्विक साक्ष्यों को व्यवस्थित किया गया। 13 नवंबर 2021 को कुलदीप तिवारी पहली बार धार पहुँचे। उन्होंने भोजशाला का केवल निरीक्षण नहीं किया; उन्होंने उस मौन इतिहास को महसूस किया जो सदियों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहा था। कहते हैं कि जब उन्होंने उन स्तंभों को छुआ जिन पर संस्कृत उत्कीर्ण थी, तो उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो इतिहास स्वयं अपनी मुक्ति की याचना कर रहा हो।
इसके बाद संघर्ष ने विधिक स्वरूप धारण किया। जबलपुर, भोपाल और धार से याचिकाकर्ताओं की टीम बनाई गई। 02 मई 2022 को इंदौर उच्च न्यायालय में दो महत्वपूर्ण जनहित याचिकाएँ दाखिल की गईं। पहली — PIL क्रमांक 10484/2022 — कुलदीप तिवारी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया। दूसरी — PIL क्रमांक 10497/2022 — हिन्दू फ्रंट फॉर जस्टिस बनाम यूनियन ऑफ इंडिया। यह केवल याचिकाएँ नहीं थीं; यह भारत की सांस्कृतिक चेतना का अभियोग पत्र थीं। बाद में विद्वान अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन भी इस संघर्ष से जुड़े। इंदौर उच्च न्यायालय के युवा अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने कानूनी और ऐतिहासिक पक्षों को अत्यंत प्रखरता से न्यायालय के समक्ष रखा। भोज उत्सव समिति के गोपाल शर्मा एवं उनके सहयोगियों ने तथ्य और प्रमाण उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। धीरे-धीरे यह संघर्ष केवल अदालत की फाइल नहीं रहा; यह जनचेतना का आंदोलन बन गया।
फिर आया 15 मई 2026। वह दिन जिसने सदियों के मौन को भंग कर दिया। लगभग चार वर्षों तक चले कठिन न्यायिक संघर्ष के बाद इंदौर उच्च न्यायालय ने वह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। न्यायालय ने हिंदू पक्ष की दोनों याचिकाओं के प्रमुख बिंदुओं को स्वीकार करते हुए उन्हें allow किया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा 07 अप्रैल 2003 को पारित आदेश को असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त कर दिया गया। मंदिर प्रांगण में वर्षों से चली आ रही नमाज व्यवस्था समाप्त कर दी गई। हिंदू पक्ष को वर्ष के सभी 365 दिन प्रातः से सायं तक अखंड पूजा, दर्शन, राग, भोग और आरती का अधिकार प्रदान किया गया। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि भोजशाला महाराजा भोज द्वारा निर्मित प्राचीन सरस्वती मंदिर एवं शिक्षा का भव्य केंद्र था।
उस दिन केवल एक निर्णय नहीं हुआ था। उस दिन इतिहास ने अपनी खोई हुई पहचान पुनः प्राप्त की थी। सदियों से मौन पड़े पत्थर जैसे बोल उठे थे। जिन शिलाओं ने अपमान देखा था, वे अब पुनर्जागरण की साक्षी बन रही थीं। आज जब भोजशाला में पुनः आरती की ध्वनि गूँजती है, तो वह केवल घंटियों का नाद नहीं होता; वह भारत की जागती हुई आत्मा का उद्घोष होता है। वह उन असंख्य पीढ़ियों की स्मृति है जिन्होंने अपनी सभ्यता को बचाए रखने के लिए संघर्ष किया।
अयोध्या, काशी, मथुरा और भोजशाला — ये केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं। ये भारत की आत्मा के चार दीपस्तंभ हैं। भोजशाला का पुनर्जागरण यह संदेश देता है कि सभ्यताएँ कभी समाप्त नहीं होतीं। उन्हें केवल कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है। और जब कोई समाज अपने इतिहास के लिए खड़ा हो जाता है, तब पत्थर भी साक्ष्य बन जाते हैं, शिलाएँ भी बोल उठती हैं और सदियाँ भी हार मान लेती हैं। क्योंकि सत्य का एक स्वभाव होता है — उसे जितना दबाया जाता है, वह उतनी ही प्रचंडता से पुनः प्रकट होता है। और शायद भोजशाला उसी प्रचंड पुनर्जागरण का नाम है, जहाँ केवल आरती नहीं लौटी — भारत की आत्मा लौट आई।