महामंडलेश्वर ज्ञानमूर्ति श्री अभयानंद सरस्वती जी महाराज का आध्यात्मिक संदेश
"तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्।"— मुंडकोपनिषद् (1.2.12)
दैनिक इंडिया न्यूज़ 11 जुलाई 2026 नई दिल्ली। भारतीय ऋषि-परम्परा का अनादि उद्घोष है कि परब्रह्म का साक्षात्कार केवल बौद्धिक प्रज्ञा, तर्कशक्ति अथवा शास्त्रों के व्यापक अध्ययन से संभव नहीं होता। आत्मतत्त्व का वास्तविक बोध सद्गुरु की करुणा, कृपा और अनुग्रह से ही प्रकट होता है। गुरु कोई सीमित व्यक्तित्व नहीं, अपितु उस अखण्ड ब्रह्मचैतन्य के साकार आलोक हैं, जिसके स्पर्श मात्र से जीव की सुप्त चेतना जागृत होकर आत्मस्वरूप की ओर उन्मुख हो जाती है। इसलिए गुरुसत्ता किसी देह, नाम अथवा पद का विषय नहीं, बल्कि उस दिव्य परमचेतना का प्राकट्य है जो अज्ञान के घोर तमस को विदीर्ण कर आत्मा में ब्रह्मज्ञान का सूर्य उदित करती है। जिस साधक के हृदय में गुरुतत्त्व के प्रति अहर्निश, निष्काम, निष्कलुष और अविचल निष्ठा प्रतिष्ठित हो जाती है, वही ब्रह्मविद्या के अवतरण का पात्र बनता है।
स्मरण रखना चाहिए कि गुरु-निष्ठा बाह्य आचरण का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अन्तःकरण की परिपूर्ण परावृत्ति है। जब साधक अपने अहंकार, कर्तृत्वाभिमान, ममता, राग, द्वेष और समस्त वासनाओं का समर्पण गुरुचरणों में कर देता है, तभी उसके भीतर आत्मचैतन्य का प्रथम स्पन्दन प्रकट होता है। भगवद्गीता (4.39) का उद्घोष—"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्"—केवल एक शास्त्रीय वचन नहीं, बल्कि समस्त साधनामार्ग का आधार है। श्रद्धा से निष्ठा, निष्ठा से गुरुकृपा, गुरुकृपा से आत्मप्रकाश और आत्मप्रकाश से ब्रह्मसाक्षात्कार की दिव्य यात्रा प्रारम्भ होती है।
गुरुसत्ता के प्रति अखण्ड समर्पण का प्रथम दिव्य प्रसाद है—प्रज्ञा। सामान्य बुद्धि तर्क करती है, विश्लेषण करती है और निर्णय देती है; किन्तु प्रज्ञा सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव कराती है। बुद्धि दृश्य को देखती है, प्रज्ञा अदृश्य का दर्शन कराती है। यह न तो शास्त्रों के अध्ययन से प्राप्त होती है और न ही वाक्चातुर्य से; यह गुरु की मौन कृपा, उनकी करुणामयी दृष्टि तथा शिष्य की निष्कपट पात्रता से स्वतः प्रकट होती है। प्रज्ञा वह अन्तर्दृष्टि है जिसके आलोक में साधक वस्तुओं के बाह्य रूप से परे उनके शाश्वत तत्त्व का साक्षात्कार करता है।
प्रज्ञा की परिपक्वता का चरम स्वरूप है—ऋतंभरा प्रज्ञा। पतञ्जलि योगसूत्र (1.48) में कहा गया है—"ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा"—अर्थात् वह चेतना जो केवल ऋत, अर्थात् शाश्वत सत्य का ही धारण करती है। इस अवस्था में संशय, मिथ्यात्व और द्वैत का पूर्ण लय हो जाता है। साधक सत्य का अध्ययन नहीं करता, अपितु स्वयं सत्य का अनुभव बन जाता है। उसके अन्तःकरण में प्रत्यभिज्ञा का उदय होता है—यह अनुभूति कि जिस परमात्मतत्त्व की खोज बाहर की जा रही थी, वह स्वयं के अन्तःकरण में अनादि काल से प्रकाशित है। यही ऋतंभरा प्रज्ञा साधक को धर्म, मर्यादा, करुणा, समत्व और लोकमंगल का सजीव आधार बना देती है।
गुरुकृपा का तृतीय और सर्वोच्च वरदान है—विवेक। विवेक वह दिव्य आलोक है जो नित्य और अनित्य, आत्मा और अनात्मा, सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म के मध्य सूक्ष्मतम भेद का बोध कराता है। संसार के आकर्षण, मोह, माया और भ्रम के मध्य यही विवेक साधक का ध्रुवतारा बनता है। जिस हृदय में विवेक का दीप प्रज्वलित हो जाता है, वहाँ अज्ञान का अन्धकार स्वतः विलीन हो जाता है। यही विवेक वैराग्य का जन्मदाता है और वैराग्य ब्रह्मसाक्षात्कार का प्रवेशद्वार।
वास्तविक गुरु-भक्ति बाह्य अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि इस भाव में निहित है कि गुरुवाणी ही जीवन का प्रमाण बन जाए, गुरु का संकल्प ही अपना संकल्प बन जाए और गुरु का आदर्श ही जीवन का प्राण बन जाए। जब यह अवस्था आती है, तब साधक का समस्त अस्तित्व गुरुतत्त्व में विलीन होने लगता है। वहाँ भय नहीं रहता, संशय नहीं रहता, केवल समर्पण, श्रद्धा, प्रेम और चैतन्य का अखण्ड प्रवाह शेष रहता है।
जैसे-जैसे यह समर्पण परिपक्व होता है, साधक का अहंकार गलने लगता है, चित्त निर्मल हो जाता है और अन्तःकरण में चिदाकाश का विस्तार होने लगता है। तब साधक अनुभव करता है कि गुरु बाहर से मार्गदर्शन करने वाले व्यक्तित्व नहीं, अपितु अन्तर्यामी रूप से उसकी प्रत्येक श्वास, प्रत्येक संकल्प और प्रत्येक अनुभूति में विद्यमान हैं। यही गुरुसत्ता का वास्तविक अनुभव है, जहाँ गुरु और शिष्य का भेद समाप्त होकर केवल ब्रह्मचैतन्य का अखण्ड प्रवाह शेष रह जाता है।
गुरुगीता में भगवान सदाशिव माता पार्वती से गुरु-महिमा का अमर रहस्य उद्घाटित करते हुए कहते हैं—
"ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः, पूजामूलं गुरोः पदम्।
मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं, मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥"
यह एक श्लोक सम्पूर्ण गुरु-तत्त्व का सार है। गुरु का स्वरूप ध्यान का आधार है, उनके चरण साधना का केन्द्र हैं, गुरुवचन समस्त मन्त्रों का प्राण हैं और उनकी कृपा ही मोक्ष का मूल कारण है। जिस क्षण शिष्य का चित्त पूर्णतः गुरुचरणों में प्रतिष्ठित हो जाता है, उसी क्षण उसके भीतर ब्रह्मविद्या, आत्मप्रबोध, चैतन्य-स्फुरण, अखण्डाकार-वृत्ति और परमानन्द का उदय होने लगता है। यह साधना का नहीं, गुरुकृपा का चमत्कार है।
स्कन्दपुराण में गुरु की महिमा का निरूपण करते हुए कहा गया है कि असंख्य यज्ञ, तप, दान, व्रत और तीर्थयात्राएँ भी उस परम फल की तुलना नहीं कर सकतीं जो सद्गुरु की निष्काम सेवा, अखण्ड श्रद्धा और पूर्ण समर्पण से प्राप्त होता है। गुरु केवल शास्त्रों का अर्थ नहीं समझाते; वे शिष्य के भीतर सुप्त ब्रह्मतेज का जागरण करते हैं। उनके सान्निध्य में साधक अविद्या से विद्या, अहंता से समता, ममता से समर्पण, चित्तविक्षेप से समाधि तथा जीवभाव से शिवभाव की यात्रा पूर्ण करता है। यही वह आध्यात्मिक उत्कर्ष है जहाँ सीमित व्यक्तित्व सच्चिदानन्द में विलीन होकर ब्रह्मानुभूति का अधिकारी बनता है।
कठोपनिषद् का अमर उद्घोष—"उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत"—आज भी प्रत्येक साधक के अन्तःकरण में जागरण का दिव्य शंखनाद करता है। उठो, जागो और सद्गुरु की शरण में पहुँचकर आत्मतत्त्व का बोध प्राप्त करो। गुरु ही वह दिव्य सेतु हैं जो जीव को शिव से, सीमित को असीम से और आत्मा को परमात्मा से जोड़ते हैं। गुरु ही भवसागर के कर्णधार हैं, गुरु ही ब्रह्मविद्या के सूर्य हैं और गुरु ही परम करुणामूर्ति हैं।
अन्ततः यही सनातन सत्य है कि गुरु-निष्ठा केवल एक आध्यात्मिक साधना नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के आन्तरिक उत्कर्ष का मूलाधार है। जहाँ गुरु का सम्मान जीवित रहता है, वहाँ संस्कृति सुरक्षित रहती है; जहाँ संस्कृति सुरक्षित रहती है, वहाँ धर्म अक्षुण्ण रहता है; और जहाँ धर्म अक्षुण्ण रहता है, वहाँ राष्ट्र दिव्यता का स्पर्श करता है। इसलिए गुरुसत्ता के प्रति अहर्निश निष्ठा ही वह अमृतधारा है, जिससे प्रज्ञा का उदय, ऋतंभरा प्रज्ञा का प्रस्फुटन, विवेक का आलोक, आत्मबोध का जागरण और ब्रह्मसाक्षात्कार का परम पुरुषार्थ सिद्ध होता है। यही वेदान्त का हृदय है, यही उपनिषदों का सार है, यही गुरु-परम्परा का अमर संदेश है और यही भारत की सनातन आत्मा का अनश्वर उद्घोष है।