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महाशिवरात्रि : अद्वैत-तत्त्व की परम महानिशा — अभयानंद सरस्वती

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Dainik India News

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महाशिवरात्रि : अद्वैत-तत्त्व की परम महानिशा — अभयानंद सरस्वती

दैनिक इंडिया न्यूज़ ,लखनऊ।महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु चेतना के परम जागरण की वह दिव्य महानिशा है, जिसमें साधक भेद-बुद्धि का परित्याग कर अद्वैत-तत्त्व की अनुभूति की ओर अग्रसर होता है। यह रात्रि आत्मसंयम, आत्मनिग्रह और आत्मप्रकाश की त्रिवेणी है। उपवास यहाँ देहाभिमान के क्षय का संकेत है, जागरण चित्तशुद्धि का उपक्रम है, और जप-अर्चन अंतःकरण की निर्मलता का साधन है। किंतु यदि इस पर्व को केवल कर्मकांड तक सीमित कर दिया जाए, तो उसके वास्तविक तात्त्विक महत्त्व का अवमूल्यन हो जाता है। महाशिवरात्रि वस्तुतः उस ब्रह्मतत्त्व के स्मरण की रात्रि है, जो शिव में भी है और नारायण में भी।

पुराण-साहित्य में अनेक प्रसंग इस अद्वैत भाव को प्रतिपादित करते हैं। शिव महापुराण तथा स्कंद पुराण में उल्लेख है कि भगवान शिव ने माता पार्वती को भगवान नारायण की दिव्य कथाएँ श्रवण कराईं। यह प्रसंग केवल भक्ति-परंपरा का संवाद नहीं, बल्कि तत्त्वचिंतन का उद्घोष है। स्वयं शिव कहते हैं—“नारायण हमारे आराध्य हैं”; और नारायण कहते हैं—“शिव हमारे अर्ध हैं।” यह परस्पर स्तुति वेदांत के उस महावाक्य की अनुभूति है—“एकमेवाद्वितीयम्।” जब ईश्वर स्वयं अपने विविध रूपों में एक-दूसरे की वंदना करते हैं, तब साधक के लिए यह स्पष्ट संकेत है कि भेद केवल दृष्टि का है, तत्त्व एक ही है।

गुरु गीता में भगवान शिव पार्वती को उपदेश देते हुए गुरु-तत्त्व की महिमा का निरूपण करते हैं और कहते हैं कि गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं। वही परब्रह्म कभी शिव रूप में, कभी विष्णु रूप में, और कभी निर्गुण-निराकार सत्ता के रूप में प्रकट होता है। वेदांत का सिद्धांत—“ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः”—महाशिवरात्रि की साधना में सजीव हो उठता है। जब साधक ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करता है, तब वह अपने भीतर स्थित चैतन्य-ब्रह्म का आवाहन करता है; और जब ‘नारायण’ का स्मरण करता है, तब उसी अखंड सत्ता का ध्यान करता है। भिन्न मंत्र, भिन्न नाम—परंतु तत्त्व एक, अविभाज्य और अनंत।

वेदांत आश्रम के प्रमुख पूज्य श्री अभयानंद सरस्वती जी महाराज के शब्दों में, “शिव और नारायण दो नहीं, अपितु एक ही परात्पर सत्य के द्विविध आलोक हैं।” यह कथन संप्रदाय-सीमाओं का अतिक्रमण कर समन्वय की प्रतिष्ठा करता है। गीता में प्रतिपादित समत्वयोग और वेदांत का अभेदवाद इसी सत्य की पुष्टि करते हैं कि परमात्मा विविध रूपों में पूजित होकर भी अखंड है। अतः महाशिवरात्रि किसी एक परंपरा का उत्सव नहीं, बल्कि सनातन समन्वय की ज्योति है।

मानव जीवन में इस पर्व की अनिवार्यता इसी कारण है कि यह हमें संकीर्ण दृष्टिकोण से मुक्त कर समग्रता की ओर ले जाता है। आज के युग में, जब भेद और विभाजन की प्रवृत्तियाँ प्रबल होती प्रतीत होती हैं, महाशिवरात्रि अद्वैत की घोषणा करती है—“सर्वं खल्विदं ब्रह्म।” शिव का नीलकंठ स्वरूप त्याग, धैर्य और लोकमंगल का आदर्श प्रस्तुत करता है; नारायण का करुणामय स्वरूप संरक्षण और पालन का। दोनों के अभेद का बोध ही पूर्णता है। जब साधक इस रहस्य को आत्मसात् करता है, तब उसके भीतर द्वेष का अंधकार लुप्त होने लगता है और समत्व का प्रकाश उदित होता है।

अतः महाशिवरात्रि वह परम रात्रि है, जिसमें साधक शिव में नारायण और नारायण में शिव का दर्शन कर अद्वैत-ब्रह्म की अनुभूति करता है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि उपासना का चरम लक्ष्य किसी रूप-विशेष की श्रेष्ठता सिद्ध करना नहीं, बल्कि उस अखंड परब्रह्म का साक्षात्कार करना है, जो समस्त रूपों में व्याप्त है। जब यह बोध जाग्रत होता है, तब जीवन का प्रत्येक क्षण शिवमय, विष्णुमय और ब्रह्ममय हो जाता है—और यही महाशिवरात्रि का परम संदेश है।

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