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प्रज्ञा के आलोक से आलोकित हुआ रामपुर: देव परिवार विस्तार अभियान के अंतर्गत पंचदिवसीय पावन प्रज्ञा पुराण कथा का भव्य शुभारंभ

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Dainik India News

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प्रज्ञा के आलोक से आलोकित हुआ रामपुर: देव परिवार विस्तार अभियान के अंतर्गत पंचदिवसीय पावन प्रज्ञा पुराण कथा का भव्य शुभारंभ

मंगल कलश यात्रा ने जागृत किया आध्यात्मिक चेतना का प्रवाह, ग्राम्य जीवन में संस्कार क्रांति का हुआ शुभारंभ

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ऋषि चिंतन, लोकमंगल और आत्मोत्कर्ष के संदेशों से गुंजायमान हुआ शिव गायत्री मंदिर परिसर

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  दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ , बख्शी का तालाब।

जब किसी समाज में केवल उत्सव नहीं, अपितु आत्मजागरण का अभियान प्रारम्भ होता है, तब उसके स्वरूप में केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि युग परिवर्तन की संभावनाएँ भी साकार होने लगती हैं। इसी भावभूमि पर देव परिवार विस्तार अभियान के अंतर्गत ग्राम रामपुर, बख्शी का तालाब स्थित शिव गायत्री मंदिर प्रांगण में पंचदिवसीय पावन प्रज्ञा पुराण कथा का शुभारंभ अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और वैदिक गरिमा के साथ हुआ। यह आयोजन केवल कथा श्रवण तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति, परिवार और समाज के समग्र परिष्कार का एक सशक्त आध्यात्मिक अभियान बनकर उभरा है।

प्रथम दिवस का आरंभ प्रातःकालीन मंगलमय वातावरण में भव्य कलश यात्रा से हुआ। वेदमंत्रों की पावन ध्वनि, पीताम्बर धारण किए मातृशक्ति के सैकड़ों स्वरूप, कलशों की दिव्य शोभा, हाथों में ध्वज-पताकाएँ लिए युवा एवं बालक-बालिकाएँ तथा सद्वाक्यों से अलंकृत बैनरों की अनुशासित श्रृंखला ने समूचे ग्राम क्षेत्र को धर्ममय बना दिया। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्राचीन ऋषि परंपरा स्वयं वर्तमान में अवतरित होकर जनमानस को पुनः संस्कारों की ओर आमंत्रित कर रही हो।

किन्तु इस आयोजन की वास्तविक आत्मा केवल यात्रा नहीं, बल्कि ‘प्रज्ञा’ का वह दिव्य दर्शन है, जिसकी व्याख्या युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने मानव जीवन के सर्वोच्च बौद्धिक एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष के रूप में की है। प्रज्ञा मात्र ज्ञान नहीं, अपितु वह दिव्य विवेक है जो मनुष्य को सत्य और असत्य, उचित और अनुचित, शाश्वत और क्षणभंगुर के मध्य सूक्ष्म भेद करने की क्षमता प्रदान करता है। वेदांत की भाषा में प्रज्ञा वह चेतना है जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है, जीवन को लोकमंगल की दिशा देती है और व्यक्ति को संकीर्ण स्वार्थ से उठाकर विश्वबंधुत्व के विराट भाव तक पहुँचाती है। यही कारण है कि प्रज्ञा पुराण कथा को केवल धार्मिक कथा न मानकर युगनिर्माण का वैचारिक महायज्ञ कहा जाता है।

सायंकाल आयोजित कथा सत्र में युगऋषि के युगानुकूल चिंतन, नैतिक जीवन, आत्मपरिष्कार, राष्ट्रनिर्माण और मानवता के उत्थान से जुड़े संदेशों का प्रभावी प्रस्तुतीकरण किया गया। कथा के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया कि वर्तमान युग की अनेक सामाजिक, नैतिक और पारिवारिक चुनौतियों का समाधान बाह्य साधनों में नहीं, बल्कि अंतःकरण के जागरण में निहित है। जब मनुष्य का चिंतन प्रज्ञामय हो जाता है, तब उसके व्यवहार में करुणा, संयम, सेवा और सदाचार स्वतः प्रकट होने लगते हैं।

यही कारण है कि इस पंचदिवसीय आयोजन को केवल प्रवचन तक सीमित न रखकर एक व्यापक सामाजिक जागरण अभियान का स्वरूप दिया गया है। प्रतिदिन प्रातःकाल बाल संस्कार शाला संचालन, वृक्षारोपण, नशामुक्ति जागरण, दहेज प्रथा उन्मूलन, नारी चेतना संवर्धन तथा संकल्पित परिवारों के आवासों पर देव परिवार ध्वज स्थापना जैसे रचनात्मक कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। इन गतिविधियों का उद्देश्य केवल संदेश देना नहीं, बल्कि समाज के भीतर संस्कारों की ऐसी जड़ें स्थापित करना है जो आने वाली पीढ़ियों के चरित्र निर्माण का आधार बन सकें।

संध्याकालीन कार्यक्रमों में भक्ति संगीत, प्रेरक गीतों और आध्यात्मिक संदेशों के माध्यम से जनमानस को आत्मविकास और लोकसेवा के पथ पर अग्रसर होने का आह्वान किया जा रहा है। श्रद्धालुओं की बढ़ती सहभागिता इस बात का प्रमाण है कि ग्राम्य समाज आज भी उन मूल्यों को आत्मसात करने के लिए तत्पर है, जो भारतीय संस्कृति की आत्मा माने जाते हैं।

इस पावन अवसर पर कार्यकारिणी समन्वयक गिरजा शंकर तिवारी, सह-समन्वयक पवन मिश्र, सदस्य गौरी शंकर सिंह, नरेन्द्र सिंह, कार्तिकेय, बलराज सिंह, संदीप जी, रेनु वर्मा, पयश्विनी, राजरानी माता जी, सुनीता, सविता, गुड्डी, बड़की सहित बड़ी संख्या में ग्रामवासियों ने सक्रिय सहभागिता निभाई। आयोजन की अनुशासित व्यवस्था और सामूहिक समर्पण ने यह सिद्ध कर दिया कि जब समाज स्वयं जागरण का संकल्प लेता है, तब परिवर्तन अवश्यंभावी हो जाता है।

विश्वास व्यक्त किया जा रहा है कि गाँव-गाँव संचालित हो रहे ऐसे प्रज्ञा जागरण अभियानों के माध्यम से बख्शी का तालाब क्षेत्र में एक विशाल, संस्कारित और समर्पित देव परिवार का निर्माण होगा, जो परम वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा एवं युगऋषि के आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाने का माध्यम बनेगा। वस्तुतः यह आयोजन केवल पाँच दिनों की कथा नहीं, बल्कि आत्मजागरण से समाजजागरण और समाजजागरण से राष्ट्रनिर्माण की उस अखंड यात्रा का प्रारंभ है, जिसकी आवश्यकता आज पहले से कहीं अधिक अनुभव की जा रही है।

“प्रज्ञा का दीप जहाँ प्रज्वलित होता है, वहाँ अज्ञान का अंधकार स्वयं विलीन हो जाता है; और जहाँ समाज प्रज्ञामय बनता है, वहाँ से युग परिवर्तन की शुरुआत होती है।”

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