प्रमुख सचिव विधानसभा की नियुक्ति पर हाईकोर्ट की कड़ी नजर, याचिका पर नोटिस जारी
याचिकाकर्ता ने नियुक्ति प्रक्रिया, सेवा विस्तार और नियम संशोधनों पर उठाए गंभीर संवैधानिक प्रश्न
दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव पद पर नियुक्ति को लेकर दायर याचिका ने सोमवार को एक नया और महत्वपूर्ण मोड़ ले लिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में हुई सुनवाई के दौरान उठे संवैधानिक और प्रशासनिक प्रश्नों ने इस मामले को महज एक सेवा विवाद से आगे बढ़ाकर संस्थागत जवाबदेही की बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।
न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान एवं न्यायमूर्ति देवेश चंद्र सावंत की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता कर्मेश प्रताप सिंह की ओर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन. सिंह तथा प्रतिवादी पक्ष के अधिवक्ताओं की दलीलें सुनने के बाद याचिका पर संज्ञान लेते हुए विधानसभा अध्यक्ष एवं प्रमुख सचिव को नोटिस जारी किया। न्यायालय ने याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत प्रदान करते हुए मामले की अगली सुनवाई 6 जुलाई निर्धारित की है।
करीब आधे घंटे तक चली सुनवाई के दौरान न्यायालय के समक्ष कई ऐसे प्रश्न उठे, जिनका संबंध विधानसभा सचिवालय की नियुक्ति प्रक्रिया, सेवा शर्तों तथा संवैधानिक प्रावधानों के अनुपालन से बताया गया। याचिकाकर्ता की ओर से प्रस्तुत पक्ष में कहा गया कि मामला उत्तर प्रदेश विधानसभा के सर्वोच्च प्रशासनिक पद से जुड़ा है, इसलिए न्यायिक परीक्षण आवश्यक है।
अधिवक्ता रीना एन. सिंह ने न्यायालय के समक्ष तर्क रखा कि प्रमुख सचिव पद पर नियुक्ति की वैधानिकता गंभीर परीक्षण की मांग करती है। उन्होंने अनुरोध किया कि याचिका के अंतिम निस्तारण तक संबंधित नियुक्ति के प्रभाव और उससे जुड़े प्रशासनिक अधिकारों पर विचार किया जाए। दूसरी ओर, प्रतिवादी पक्ष ने याचिका की पोषणीयता पर प्रश्न उठाते हुए प्रारंभिक स्तर पर ही इसे चुनौती दी।
दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद न्यायालय ने मामले को विचारणीय मानते हुए नोटिस जारी किया। अब सभी की निगाहें आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस विवाद से जुड़े कानूनी और संवैधानिक पहलुओं पर और विस्तार से बहस होने की संभावना है।
दिलचस्प तथ्य यह भी रहा कि सोमवार को प्रारंभिक स्तर पर जब मामले की सुनवाई आरंभ हुई, तब न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने इस प्रकरण को अपने समक्ष सुनने से अलग करने का अनुरोध किया। इसके बाद मामला नई खंडपीठ को हस्तांतरित किया गया, जहां विस्तृत सुनवाई हुई।
याचिकाकर्ता कर्मेश प्रताप सिंह, जो विधानसभा अध्यक्ष के पूर्व सूचना अधिकारी रह चुके हैं, ने क्वो वारंटो (अधिकार-पृच्छा) याचिका के माध्यम से प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति को चुनौती दी है। उनका दावा है कि वर्ष 2009 में हुई नियुक्ति विधानसभा सचिवालय (भर्ती एवं सेवा शर्तें) नियमावली, 1974 के प्रावधानों के अनुरूप नहीं थी।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि चयन श्रेणी के पदों के लिए निर्धारित अधिकतम आयु सीमा 52 वर्ष थी, जबकि नियुक्ति के समय संबंधित अधिकारी की आयु इससे अधिक थी। साथ ही यह भी कहा गया है कि नियुक्ति प्रक्रिया में विज्ञापन, प्रतिस्पर्धी चयन, लोक सेवा आयोग से परामर्श तथा संविधान के अनुच्छेद 187 के अंतर्गत आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।
याचिकाकर्ता ने वर्ष 2010-11 में विधानसभा सचिवालय सेवा नियमों में किए गए संशोधनों पर भी प्रश्न उठाए हैं। याचिका के अनुसार इन संशोधनों की वैधानिकता और उनकी प्रक्रिया न्यायिक परीक्षण की अपेक्षा करती है। साथ ही यह दावा भी किया गया है कि बाद में दिए गए सेवा विस्तार इन्हीं संशोधनों के आधार पर प्रदान किए गए।
याचिका में यह भी कहा गया है कि संबंधित अधिकारी 30 अप्रैल 2019 को निर्धारित आयु पूर्ण कर चुके थे और उसके बाद हुए विधिक परिवर्तनों का लाभ उन्हें प्राप्त नहीं हो सकता था। इन दावों के आधार पर हाईकोर्ट से क्वो वारंटो रिट जारी कर यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि संबंधित अधिकारी प्रमुख सचिव पद पर बने रहने का वैधानिक अधिकार सिद्ध करें।
हालांकि, यह उल्लेखनीय है कि याचिका में लगाए गए सभी आरोप अभी न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं और उन पर अंतिम निर्णय आना शेष है।