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CBI की चार्जशीट, एक साल की बोली-बंदी और फिर ₹3,483 करोड़ के ठेके—आखिर किस कसौटी पर बार-बार मिलती रही हरी झंडी?

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CBI की चार्जशीट, एक साल की बोली-बंदी और फिर ₹3,483 करोड़ के ठेके—आखिर किस कसौटी पर बार-बार मिलती रही हरी झंडी?

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद सड़क में गंभीर क्षति; NHAI की कार्रवाई के बीच उसी कंपनी को उत्तर प्रदेश में दो नए हाईवे प्रोजेक्ट—सार्वजनिक ठेकों की पात्रता, गुणवत्ता परीक्षण और जवाबदेही पर उठे निर्णायक सवाल

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दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।सार्वजनिक धन से बनने वाली सड़कें केवल डामर और कंक्रीट की परतें नहीं होतीं, वे शासन की विश्वसनीयता और नागरिकों की सुरक्षा का प्रत्यक्ष प्रमाण होती हैं। ऐसे में करीब ₹4,200 करोड़ की लागत वाले लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के कुछ ही समय बाद सड़क के क्षतिग्रस्त होने की घटनाओं और उसके बाद भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की कठोर कार्रवाई ने निर्माण गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। लेकिन इस पूरे प्रकरण से भी बड़ा सवाल अब सामने आ रहा है—जिस कंपनी के विरुद्ध पहले CBI की रिश्वत जांच के बाद सरकारी स्तर पर कार्रवाई हुई, जिसे MoRTH ने एक वर्ष के लिए निविदाओं में भाग लेने से अयोग्य किया, उसी कंपनी से जुड़े समूह को फिर लगभग ₹3,483 करोड़ की दो नई परियोजनाएं कैसे मिल गईं? 

मामला यहीं से असाधारण गंभीरता ग्रहण करता है। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, CBI ने वर्ष 2024 में NHAI के अधिकारियों से जुड़े कथित रिश्वत प्रकरण में मामला दर्ज किया और 8 अगस्त 2024 को आरोपपत्र दाखिल किया। इसके बाद NHAI ने 30 अगस्त 2024 को PNC Infratech तथा संबंधित संस्थाओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया। नोटिस में आरोप था कि कंपनी से जुड़े कर्मचारियों ने NHAI के कर्मचारियों को कथित रूप से अनुचित लाभ पहुंचाया। मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम तथा संबंधित दंडात्मक प्रावधानों के अंतर्गत दर्ज हुआ था। 

इसके बाद कार्रवाई केवल नोटिस तक सीमित नहीं रही। न्यायिक रिकॉर्ड में दर्ज विवरण के मुताबिक MoRTH ने 18 अक्टूबर 2024 को PNC Infratech को एक वर्ष के लिए मंत्रालय की निविदा प्रक्रियाओं में भाग लेने से अयोग्य कर दिया था। यह कार्रवाई General Financial Rules और संबंधित सरकारी दिशानिर्देशों के आधार पर की गई थी। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कार्रवाई CBI की जांच और आरोपपत्र की पृष्ठभूमि में हुई थी; इसे किसी आपराधिक मामले में अंतिम दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। 

अब तस्वीर का दूसरा सिरा देखिए। 16 जुलाई 2026 को PNC Infratech से संबंधित विशेष प्रयोजन कंपनियों ने NHAI के साथ उत्तर प्रदेश में दो नए HAM प्रोजेक्ट के concession agreements किए। इन दोनों परियोजनाओं की संयुक्त बोली परियोजना लागत करीब ₹3,483 करोड़ है। एक परियोजना बाराबंकी-मुस्तफाबाद खंड और दूसरी मुस्तफाबाद-बिस्वरिया खंड से संबंधित है। 

यानी एक तरफ पुराने प्रकरण में CBI की जांच, आरोपपत्र और उसके बाद एक वर्ष की बोली-अयोग्यता का सरकारी रिकॉर्ड मौजूद है; दूसरी तरफ 2026 में उसी कॉरपोरेट समूह से जुड़े नए राजमार्ग प्रोजेक्ट सामने आ चुके हैं। यही वह बिंदु है जहां सवाल किसी व्यक्ति या कंपनी पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि सरकारी निविदा व्यवस्था की कसौटी समझने का बन जाता है।

क्या नए ठेके दिए जाते समय कंपनी के पूर्व प्रदर्शन, नियामकीय कार्रवाई, CBI प्रकरण और गुणवत्ता संबंधी रिकॉर्ड का समग्र मूल्यांकन किया गया था? यदि किया गया था, तो उस मूल्यांकन के निष्कर्ष क्या थे? क्या पूर्व की अयोग्यता समाप्त होने के बाद कंपनी ने सभी निर्धारित पात्रता मानकों को पुनः पूरा किया? और क्या नए प्रोजेक्टों के लिए तकनीकी एवं वित्तीय पात्रता की प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से परखी गई?

इन सवालों को लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर हालिया घटनाक्रम और अधिक गंभीर बना देता है। एक्सप्रेसवे के एक हिस्से में क्षति सामने आने के बाद NHAI ने टोल वसूली निलंबित की, परियोजना से जुड़े अधिकारियों के विरुद्ध आरोपपत्र की कार्रवाई की और PNC Infratech को नॉन-परफॉर्मिंग ठेकेदार घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की। क्षति के कारणों की तकनीकी जांच के लिए IIT विशेषज्ञों की मदद लिए जाने की भी रिपोर्ट है। 

यहां एक और तथ्य स्पष्ट रहना चाहिए—किसी कंपनी को ठेका मिलना अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है और CBI जांच में आरोपित होना अंतिम दोषसिद्धि नहीं। लेकिन जब सार्वजनिक परियोजनाओं में गुणवत्ता संबंधी कार्रवाई, पूर्व नियामकीय अयोग्यता और नए हजारों करोड़ रुपये के ठेकों के तथ्य एक साथ सामने आते हैं, तब पारदर्शिता के लिए सवाल उठना स्वाभाविक है।

सबसे बड़ा प्रश्न यही है—

क्या सरकारी ठेका व्यवस्था में केवल वर्तमान तकनीकी पात्रता देखी जाती है, या ठेकेदार का पूरा ‘परफॉर्मेंस रिकॉर्ड’ भी निर्णायक कसौटी होता है?

यदि पूर्व कार्रवाई के बाद कंपनी ने सभी वैधानिक पात्रताएं पुनः अर्जित कर ली थीं, तो सरकार को यह प्रक्रिया सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करनी चाहिए। और यदि किसी पूर्व कार्रवाई का नए ठेकों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, तो करोड़ों-करोड़ रुपये की सार्वजनिक परियोजनाओं में जवाबदेही सुनिश्चित करने का वास्तविक तंत्र क्या है?

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की क्षति ने सड़क की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा किया है; लेकिन CBI प्रकरण → सरकारी कार्रवाई → बोली-अयोग्यता → पुनः बड़े ठेके → फिर नए एक्सप्रेसवे पर गुणवत्ता संबंधी विवाद की पूरी समयरेखा अब एक कहीं अधिक व्यापक संस्थागत प्रश्न सामने रखती है।

सवाल सीधा है—₹3,483 करोड़ के नए ठेकों की फाइल पर हरी झंडी लगाते समय इन सभी पुराने अध्यायों को किस स्तर पर परखा गया?

और यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप हुआ है, तो उन नियमों और पात्रता के आधार को सार्वजनिक करने में संकोच क्यों होना चाहिए?

यही वह जवाब है जिसका इंतजार अब केवल विपक्ष या आलोचकों को नहीं, बल्कि करदाताओं, यात्रियों और देश की सार्वजनिक निर्माण व्यवस्था को भी है।

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