सरकारी विभागों की आपसी खींचतान में आखिर कब तक पिसती रहेगी आम जनता?
सरकारी गैंगवार में बलि का बकरा बने 72 परिवार!
दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ।उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से प्रशासनिक समन्वय की ऐसी विचित्र कथा सामने आई है, जो सुशासन के तमाम दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है। गोमती तटवर्ती डालीबाग क्षेत्र में स्थित सरदार वल्लभभाई पटेल आवास योजना के 72 फ्लैट आज दो सरकारी विभागों की परस्पर विरोधी कार्यवाहियों के कारण अनिश्चितता के भंवर में फंस गए हैं।
कहानी की शुरुआत उस समय हुई जब लगभग 2314 वर्गमीटर भूमि को माफिया कब्जे से मुक्त कराकर जनकल्याण के उद्देश्य से विकसित किया गया। इसी भूमि पर लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 72 आवासीय फ्लैट निर्मित किए। प्रत्येक फ्लैट की कीमत 10.70 लाख रुपये निर्धारित की गई और योजना को जनता का अभूतपूर्व प्रतिसाद मिला। हजारों आवेदनों के बीच चयनित लाभार्थियों को नवंबर 2025 में स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आवास की चाबियां सौंपते हुए इसे गरीबों के लिए न्याय का प्रतीक बताया था।
किन्तु अब वही आवासीय परियोजना प्रशासनिक विरोधाभास का स्मारक बनती दिखाई दे रही है।
सिंचाई विभाग ने अचानक दावा किया है कि उक्त निर्माण बंधे की भूमि पर किया गया है। विभागीय अधिकारियों ने कैनाल एक्ट, 1873 की धारा 70 के अंतर्गत नोटिस चस्पा कर सात दिन के भीतर कथित अतिक्रमण हटाने का अल्टीमेटम दे दिया है। इतना ही नहीं, नोटिस में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि विभाग स्वयं कार्रवाई करेगा तो उसका व्यय भी आवंटियों से वसूला जा सकता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब परियोजना का नक्शा स्वीकृत हो रहा था, जब निर्माण कार्य चल रहा था, जब करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे थे, तब सिंचाई विभाग कहां था? क्या विभागीय अधिकारियों को तब यह भूमि अपनी नहीं लगी? क्या किसी भी स्तर पर आपत्ति दर्ज नहीं की गई? यदि भूमि विवादित थी तो निर्माण पूर्ण होने और मुख्यमंत्री द्वारा चाबी वितरण के बाद ही विभाग की नींद क्यों टूटी?
यह विवाद केवल 72 फ्लैटों का नहीं है, बल्कि शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर खड़े होते उन सवालों का है जिनका उत्तर लाखों नागरिक जानना चाहते हैं।
यदि एलडीए ने नियमों का उल्लंघन किया है तो जिम्मेदारी अधिकारियों की तय होनी चाहिए, न कि उन परिवारों की जिन्होंने जीवनभर की जमा-पूंजी सरकारी योजना में लगाई। और यदि सिंचाई विभाग का दावा गलत है तो फिर ऐसे नोटिस जारी कर गरीब परिवारों को भयभीत करने का अधिकार किसने दिया?
आज स्थिति यह है कि एक हाथ में मुख्यमंत्री द्वारा प्रदान की गई वैध चाबी है और दूसरे हाथ में सरकारी विभाग द्वारा चस्पा किया गया अवैध निर्माण का नोटिस।
डालीबाग के ये 72 फ्लैट अब केवल आवास नहीं रहे; वे उस प्रशासनिक विडंबना के जीवंत प्रतीक बन गए हैं जिसमें सरकार का एक विभाग निर्माण करता है, दूसरा विभाग उसे अवैध घोषित करता है और दोनों के बीच आम नागरिक अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी पूंजी लेकर असहाय खड़ा रह जाता है।
अब पूरा प्रदेश यह जानना चाहता है कि इस सरकारी बनाम सरकारी संघर्ष में जवाबदेह कौन होगा—एलडीए, सिंचाई विभाग या फिर हमेशा की तरह केवल आम जनता?