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राग, रस और परंपरा का अनुपम उत्सव: ललित कला अकादमी के 72वें स्थापना दिवस पर भारतीय संगीत की सुरसरिता में डूबा लखनऊ

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राग, रस और परंपरा का अनुपम उत्सव: ललित कला अकादमी के 72वें स्थापना दिवस पर भारतीय संगीत की सुरसरिता में डूबा लखनऊ

मेघ मल्हार से लेकर शुद्ध सारंग तक गूंजा भारतीय संगीत का वैभव, शास्त्रीय एवं लोक-संवेदना के अद्भुत समन्वय ने श्रोताओं को किया भावविभोर

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दैनिक इंडिया न्यूज़ 5 अगस्त 2026लखनऊ।भारतीय कला एवं संस्कृति की गौरवशाली परंपरा को नवीन ऊर्जा प्रदान करते हुए ललित कला अकादमी, क्षेत्रीय केन्द्र, लखनऊ ने अपने 72वें स्थापना दिवस पर एक ऐसी सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया, जिसने संगीत, साधना और सौंदर्यबोध का अनुपम समागम प्रस्तुत किया। व्याख्यान एवं सांस्कृतिक प्रस्तुति से सुसज्जित इस आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय शास्त्रीय संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता, सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक संवेदना का जीवंत आधार है। प्रारंभ से लेकर समापन तक सभागार सुर, लय और भाव के दिव्य वातावरण से अनुप्राणित रहा।

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कार्यक्रम का सर्वाधिक आकर्षण उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी की उपाध्यक्ष एवं सुप्रसिद्ध शास्त्रीय एवं उपशास्त्रीय गायिका श्रीमती विभा सिंह की विलक्षण प्रस्तुति रही। उन्होंने राग मेघ मल्हार, सोहनी और जोग में बंदिश एवं तराना प्रस्तुत कर श्रोताओं को भारतीय रागदारी संगीत की सूक्ष्मता और गहनता का साक्षात्कार कराया। इसके उपरांत ठुमरी, कजरी, चैती और दादरा जैसी उपशास्त्रीय एवं लोकविधाओं की उनकी सजीव अभिव्यक्ति ने संगीत को जनमानस की संवेदनाओं से जोड़ दिया। उनकी प्रस्तुति में शास्त्रीय अनुशासन और लोकजीवन की सहज आत्मीयता का ऐसा संतुलन दिखाई दिया, जिसने उपस्थित प्रत्येक श्रोता को भावविभोर कर दिया।

सांस्कृतिक संध्या का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम युवा एवं प्रतिभाशाली बांसुरी वादक अथर्व प्रताप सिंह की मनोहारी प्रस्तुति रही। उन्होंने राग शुद्ध सारंग में बड़े एवं छोटे ख्याल, जोड़, झाला तथा विविध लयकारियों का अत्यंत परिष्कृत और प्रभावशाली प्रदर्शन किया। इसके पश्चात प्रस्तुत पारंपरिक धुनों ने भारतीय संगीत की बहुरंगी परंपरा को सजीव रूप में श्रोताओं के समक्ष उपस्थित कर दिया। उनकी बांसुरी की मधुर स्वर-लहरियों ने सभागार में ऐसा सौम्य वातावरण निर्मित किया कि प्रत्येक प्रस्तुति के पश्चात देर तक तालियों की गूंज सुनाई देती रही।

पूरे आयोजन ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि भारतीय शास्त्रीय एवं लोक-संगीत की परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत, प्रासंगिक और प्रेरणादायी है, जितनी सदियों पूर्व थी। कलाकारों की साधना, प्रस्तुति की उत्कृष्टता और श्रोताओं की आत्मीय सहभागिता ने इस सांस्कृतिक संध्या को केवल एक कार्यक्रम न रहने देकर भारतीय सांगीतिक विरासत के उत्सव का स्वरूप प्रदान किया। यह आयोजन कला संरक्षण, सांस्कृतिक संवर्धन और युवा पीढ़ी को भारतीय संगीत की समृद्ध परंपरा से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में स्मरणीय रहेगा।

इस गरिमामय आयोजन का संयोजन ललित कला अकादमी, क्षेत्रीय केन्द्र, लखनऊ के सचिव डॉ. देवेन्द्र त्रिपाठी के निर्देशन एवं कुशल समन्वय में संपन्न हुआ। स्थापना दिवस पर आयोजित यह सांस्कृतिक संध्या न केवल अकादमी की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक बनी, बल्कि भारतीय कला-साधना के उस अमूल्य संदेश को भी पुनः प्रतिष्ठित कर गई कि संस्कृति ही किसी राष्ट्र की सबसे स्थायी और सर्वाधिक प्रभावशाली पहचान होती है।

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