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परिवार, संस्कार और सनातन जीवन मूल्यों पर आत्मीय संवाद, राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अध्यक्ष जितेन्द्र प्रताप सिंह ने की पूर्व राज्यपाल कलराज मिश्र से भावपूर्ण भेंट

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Dainik India News

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परिवार, संस्कार और सनातन जीवन मूल्यों पर आत्मीय संवाद, राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अध्यक्ष जितेन्द्र प्रताप सिंह  ने की पूर्व राज्यपाल कलराज मिश्र से भावपूर्ण भेंट

दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दिल्ली। जीवन के तीव्र परिवर्तनशील युग में जब मानवीय संबंधों की आत्मीयता कहीं-कहीं क्षीण पड़ती प्रतीत हो रही है, ऐसे समय में भारतीय सनातन संस्कृति के मूल्यों को पुनः स्मरण कराने वाला एक भावपूर्ण संवाद उस समय साकार हुआ, जब राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष जितेन्द्र प्रताप सिंह ने वरिष्ठ जननायक, राजस्थान के पूर्व राज्यपाल तथा दीर्घकाल तक उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्रिमंडल की गरिमा को सुशोभित करने वाले कलराज मिश्र से उनके नोएडा स्थित आवास पर शिष्टाचार भेंट की। यह भेंट केवल औपचारिकता नहीं थी, बल्कि परिवार, संस्कार और मानवीय संवेदनाओं के मर्म को पुनः जाग्रत करने वाला एक आत्मीय विमर्श बन गई।

संवाद के प्रारंभिक क्षणों से ही दोनों विद्वान व्यक्तित्वों ने इस विषय पर गंभीरता से विचार किया कि आधुनिकता की चकाचौंध और पाश्चात्य जीवन शैली के तीव्र प्रभाव ने भारतीय परिवार व्यवस्था की आत्मा को कहीं न कहीं आहत किया है। जो परिवार कभी प्रेम, त्याग और समर्पण की अखंड ज्योति से आलोकित रहते थे, वहीं आज अनेक स्थानों पर विघटन, दूरी और एकाकीपन की छाया दिखाई देने लगी है। इस संदर्भ में जितेन्द्र प्रताप सिंह ने अत्यंत करुण स्वर में कहा कि जब परिवार टूटता है तो केवल दीवारें नहीं बिखरतीं, बल्कि उन स्मृतियों, संस्कारों और भावनाओं की परंपरा भी खंडित हो जाती है जो पीढ़ियों से मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने का आधार रही है।


उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति ने परिवार को केवल सामाजिक संस्था नहीं माना, बल्कि उसे प्रेम और कर्तव्य के पवित्र तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित किया है। हमारे शास्त्रों में भाई-भाई के प्रेम का सर्वोच्च उदाहरण भगवान राम और भरत के रूप में मिलता है, जहाँ भरत ने राजसिंहासन को तिलांजलि देकर भ्रातृ प्रेम को सर्वोपरि रखा। पति-पत्नी के आदर्श संबंध का स्वरूप सीता और राम के जीवन में दिखाई देता है, जहाँ त्याग, विश्वास और परस्पर सम्मान ने उनके संबंध को दिव्यता प्रदान की। पिता और पुत्र के प्रेम का उदाहरण दशरथ और राम के संबंध में मिलता है, जहाँ एक ओर पिता के वचन की मर्यादा के लिए पुत्र वनगमन को स्वीकार करता है, वहीं पिता पुत्र-वियोग में जीवन का त्याग कर देता है। इसी प्रकार पिता और पुत्री के स्नेह का पवित्र स्वरूप भी भारतीय परंपरा में अत्यंत करुणा और वात्सल्य के साथ वर्णित हुआ है, जहाँ पुत्री को “लक्ष्मी” और “कुल की मर्यादा” के रूप में देखा गया है।


जितेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि आज यदि परिवारों में विघटन की स्थितियाँ उत्पन्न हो रही हैं, तो उसका मूल कारण यह है कि हम धीरे-धीरे अपने उन सनातन संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं जो हमें संयम, सहिष्णुता और करुणा का मार्ग दिखाते हैं। जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ, मतभेद और संघर्ष वस्तुतः हमारे प्रारब्ध का ही एक भाग होते हैं। वेदों और उपनिषदों में भी यह स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य के जीवन में सुख और दुःख दोनों ही कर्मफल के रूप में आते हैं, परंतु जो व्यक्ति अपने मन को संयमित कर धर्म और सत्य के मार्ग पर चलता है, वह अंततः उस प्रारब्ध के बंधन से ऊपर उठ जाता है।


ऋग्वेद का यह मंत्र— “संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्” —अर्थात साथ चलो, साथ विचार करो और अपने मनों को एक करो—आज भी हमें यह शिक्षा देता है कि परिवार और समाज की वास्तविक शक्ति परस्पर एकता और समन्वय में ही निहित है। जब मनुष्य अपने भीतर करुणा, क्षमा और त्याग की भावना को जागृत करता है, तब वह केवल स्वयं को ही नहीं, बल्कि अपने पूरे परिवार और समाज को भी एक नई दिशा प्रदान करता है।

संवाद के दौरान जितेन्द्र प्रताप सिंह ने कलराज मिश्र के व्यक्तित्व की विशेष प्रशंसा करते हुए कहा कि उनका सार्वजनिक जीवन भारतीय मूल्यों और आदर्शों का जीवंत उदाहरण रहा है। उनकी सादगी, संवेदनशीलता और सेवा भावना ने उन्हें केवल एक राजनेता ही नहीं, बल्कि समाज के लिए एक मार्गदर्शक व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित किया है। उन्होंने विशेष रूप से यह भी उल्लेख किया कि कलराज मिश्र द्वारा अपनी विधायक निधि से लखनऊ के आदिल नगर स्थित समर्पण वृद्धाश्रम को प्रदान किया गया सहयोग आज उत्तर भारत के उत्कृष्ट सेवा केंद्रों में गिना जाता है, जहाँ वृद्धजनों को सम्मान और स्नेह के साथ जीवनयापन का अवसर प्राप्त हो रहा है।

इस आत्मीय भेंट का समापन अत्यंत भावपूर्ण वातावरण में हुआ। दोनों वरिष्ठ व्यक्तित्वों ने इस बात पर गहन सहमति व्यक्त की कि यदि समाज को स्थिरता, शांति और समरसता की दिशा में आगे बढ़ाना है, तो परिवारों को पुनः प्रेम, संस्कार और परस्पर सम्मान की उस धुरी पर स्थापित करना होगा, जिस पर भारतीय सभ्यता सदियों से आधारित रही है।

यह संवाद केवल दो व्यक्तियों के बीच हुई चर्चा नहीं था, बल्कि उस सनातन चेतना का स्मरण था जो मनुष्य को यह सिखाती है कि जीवन का वास्तविक सुख पद, प्रतिष्ठा या वैभव में नहीं, बल्कि परिवार के बीच प्रवाहित होने वाले प्रेम, त्याग और आत्मीयता के उस अमृत में निहित है, जो मानव जीवन को सचमुच धन्य बना देता है।

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