लखनऊ के दो बड़े सरकारी अस्पतालों के आंकड़ों ने खोला क्रिटिकल केयर व्यवस्था का बड़ा अंतर; लोकबंधु में 75% और बलरामपुर में 53.3% क्षमता वर्तमान भर्ती व्यवस्था में उपयोग नहीं
दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।लखनऊ के दो प्रमुख सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध 100 वेंटिलेटरों में केवल 38 पर ही मरीज भर्ती किए जा रहे हैं—यानी 62 प्रतिशत क्षमता वर्तमान भर्ती व्यवस्था में उपयोग नहीं हो रही। यह आंकड़ा किसी एक मशीन के खराब होने की कहानी नहीं बताता, बल्कि उस बड़ी चुनौती की ओर संकेत करता है जिसमें वेंटिलेटर की उपलब्धता, आईसीयू ढांचा, विशेषज्ञ चिकित्सक और प्रशिक्षित मैनपावर—सभी को एक साथ काम करना होता है। सबसे बड़ा अंतर लोकबंधु अस्पताल में है, जहां 40 वेंटिलेटरों में सिर्फ 10 पर मरीज भर्ती हैं। यानी यहां उपलब्ध क्षमता का 75 प्रतिशत वर्तमान भर्ती व्यवस्था में उपयोग नहीं हो रहा। अब सवाल यह नहीं कि अस्पतालों में कितनी मशीनें हैं; सवाल यह है कि जरूरत की घड़ी में उनमें से कितनी वास्तव में मरीज के काम आती हैं।
आंकड़े यहीं खत्म नहीं होते। बलरामपुर अस्पताल में 60 वेंटिलेटर बेड उपलब्ध बताए गए हैं, लेकिन 28 पर ही मरीज भर्ती किए जा रहे हैं। करीब 46.7 प्रतिशत क्षमता का इस्तेमाल हो रहा है और 53.3 प्रतिशत क्षमता वर्तमान भर्ती व्यवस्था में उपयोग नहीं हो रही। दो अस्पतालों का संयुक्त आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दिखाता है कि उपकरणों की उपलब्धता और वास्तविक क्रिटिकल केयर क्षमता के बीच एक स्पष्ट अंतर है। इस अंतर की वजह जानने पर तस्वीर और गंभीर हो जाती है।
लोकबंधु में इस अंतर की एक बड़ी वजह आईसीयू से जुड़ी आधारभूत संरचना बताई गई है। पिछले वर्ष हुए अग्निकांड के बाद निर्माण कार्य पूरा नहीं होने के कारण सभी उपलब्ध वेंटिलेटरों का उपयोग नहीं हो पा रहा। यानी मशीनें मौजूद हैं, लेकिन उनके साथ आवश्यक उपचार ढांचा पूरी तरह उपलब्ध नहीं है। यह सवाल अपने आप में महत्वपूर्ण है कि जीवनरक्षक उपकरण और उनके लिए जरूरी आईसीयू क्षमता के बीच तालमेल कितना तेज और प्रभावी है।
बलरामपुर की कहानी दूसरी है। यहां उपलब्ध जानकारी के अनुसार विशेषज्ञ चिकित्सकों और मैनपावर की कमी के कारण सभी वेंटिलेटर बेड का संचालन नहीं हो पा रहा। इससे समस्या का दूसरा पहलू सामने आता है—मशीन खरीदना स्वास्थ्य सुविधा की शुरुआत है, उसका चौबीसों घंटे सुरक्षित संचालन ही असली क्षमता है।
ठाकुरगंज और रानी लक्ष्मीबाई अस्पताल भी इसी तस्वीर का हिस्सा हैं। ठाकुरगंज में दो और रानी लक्ष्मीबाई अस्पताल में पांच वेंटिलेटर उपलब्ध बताए गए हैं, लेकिन इन पर नियमित रूप से मरीजों की भर्ती नहीं हो पा रही। उपलब्ध सामग्री में इनके संचालित वेंटिलेटरों की सटीक संख्या नहीं है, इसलिए प्रतिशत निकालना उचित नहीं होगा। मगर उपकरण मौजूद होने के बावजूद उनका नियमित उपयोग न होना एक व्यापक सवाल जरूर छोड़ता है—क्या सरकारी क्रिटिकल केयर व्यवस्था की क्षमता को केवल मशीनों की संख्या से मापा जा सकता है?
इस सवाल का असर राजधानी के बड़े चिकित्सा संस्थानों पर भी पड़ता है। पीजीआई समेत अन्य प्रमुख चिकित्सा संस्थानों में करीब 500 वेंटिलेटर उपलब्ध बताए गए हैं। यहां लखनऊ के अलावा प्रदेश के विभिन्न हिस्सों और बिहार तक से गंभीर मरीज पहुंचते हैं। स्वाभाविक रूप से मरीजों का दबाव अधिक रहता है। यदि सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध स्थानीय क्रिटिकल केयर क्षमता का बेहतर उपयोग हो, तो बड़े संस्थानों पर पड़ने वाला दबाव भी कम किया जा सकता है।
गंभीर मरीजों के लिए समय की अहमियत को हाल का एक मामला भी रेखांकित करता है। गोरखपुर से लखनऊ रेफर किए गए देवरिया के एक मरीज के संबंध में समय पर वेंटिलेटर उपलब्ध न हो पाने की बात सामने आई और बाद में उसकी मृत्यु हो गई। हालांकि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर मृत्यु को वेंटिलेटर की अनुपलब्धता से सीधे जोड़ना उचित नहीं होगा। मृत्यु का चिकित्सकीय कारण आधिकारिक अभिलेख और जांच से ही स्पष्ट हो सकता है। इस मामले को फिलहाल केवल इस व्यापक प्रश्न के संदर्भ में देखा जाना चाहिए कि गंभीर मरीजों को रेफरल के बाद आवश्यक क्रिटिकल केयर सुविधा कितनी शीघ्र उपलब्ध हो पाती है।
इस व्यवस्था का आर्थिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर पर भर्ती मरीजों को निःशुल्क उपचार मिलता है, जबकि केजीएमयू, पीजीआई और लोहिया संस्थान में वेंटिलेटर पर उपचार का खर्च करीब 10 हजार से 20 हजार रुपये प्रतिदिन बताया गया है। निजी अस्पतालों में यह खर्च एक से डेढ़ लाख रुपये प्रतिदिन तक पहुंच सकता है। ऐसे में सरकारी अस्पताल की प्रत्येक प्रभावी वेंटिलेटर क्षमता किसी आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के लिए बड़ी राहत बन सकती है।
स्वास्थ्य विभाग की ओर से वेंटिलेटरों के क्रियाशील होने और स्टाफ के प्रशिक्षण का दावा अपनी जगह है। अस्पतालवार मरीज-भर्ती के आंकड़े दूसरी तस्वीर सामने रखते हैं। इन दोनों तथ्यों को आमने-सामने रखकर किसी जल्दबाजी के निष्कर्ष के बजाय अस्पतालवार समीक्षा जरूरी है—कहां आईसीयू का ढांचा बाधा है, कहां मानव संसाधन की कमी है और कहां उपकरण के संचालन से जुड़ी समस्या है। यही स्पष्टता समाधान की दिशा तय करेगी।
सरकार के लिए यह आंकड़ा आलोचना से अधिक सुधार का अवसर भी है। उपलब्ध वेंटिलेटरों को पूरी क्षमता से चलाने के लिए आईसीयू बेड, विशेषज्ञ चिकित्सक, प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ, तकनीकी कर्मी और निर्बाध संचालन व्यवस्था को एक साथ मजबूत करना होगा। यदि उपकरण पहले से उपलब्ध हैं, तो अगला लाभ अपेक्षाकृत कम अतिरिक्त निवेश में उनकी उपयोगी क्षमता बढ़ाकर भी हासिल किया जा सकता है।
आखिर जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है—जब अस्पतालों में वेंटिलेटर उपलब्ध हैं, तो उनकी पूरी क्षमता मरीजों तक कब और कैसे पहुंचेगी? 100 में 38 का आंकड़ा इसी सवाल को सामने लाता है। यह किसी एक संस्था को दोषी ठहराने का निष्कर्ष नहीं, बल्कि सरकारी क्रिटिकल केयर व्यवस्था की उस कड़ी को मजबूत करने का संकेत है जहां उपकरण और मरीज के बीच अभी भी दूरी दिखाई दे रही है।
वेंटिलेटर की असली उपलब्धता उसकी संख्या से नहीं, जरूरत के क्षण में उसके तत्काल और सुरक्षित उपयोग से तय होती है। लखनऊ के ये आंकड़े इसी कसौटी पर व्यवस्था को और सुदृढ़ करने की आवश्यकता की ओर ध्यान खींचते हैं।