हरिंद्र कुमार सिंह,दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।भारत के विकास की सबसे कठिन परीक्षा उसके महानगरों में नहीं, बल्कि उन गांवों में होती है जहां आज भी विकास का अर्थ केवल आय बढ़ना नहीं, बल्कि बीमारी से मुक्ति, सम्मानजनक जीवन, शिक्षा तक पहुंच, सुरक्षित आवास, आर्थिक आत्मनिर्भरता और भविष्य के प्रति विश्वास है। जिस दिन गांव का नागरिक स्वयं को विकास की परिधि पर खड़ा हुआ व्यक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रगति का सक्रिय सहभागी अनुभव करने लगेगा, उसी दिन विकास का अर्थ आंकड़ों से निकलकर जीवन की वास्तविकता में प्रवेश करेगा। यही वह बिंदु है जहां स्वच्छता से स्वास्थ्य, स्वास्थ्य से उत्पादकता और तकनीक से अवसर तक की पूरी विकास-श्रृंखला को समझना आवश्यक हो जाता है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश में जापानी इन्सेफेलाइटिस के विरुद्ध संघर्ष इस बात का गंभीर उदाहरण है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती का समाधान केवल चिकित्सालयों की दीवारों के भीतर नहीं खोजा जा सकता। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अनुसार, इस बीमारी ने लंबे समय तक पूर्वांचल के सामाजिक जीवन को प्रभावित किया और इसके विरुद्ध संसद से लेकर विभिन्न मंचों तक आवाज उठाई गई। उनके मुताबिक, घर-घर शौचालय निर्माण, स्वच्छता और व्यापक जनजागरूकता अभियानों को बीमारी के नियंत्रण के प्रयासों से जोड़ने के बाद स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया और इससे होने वाली मौतों में अभूतपूर्व कमी आई। इस कथन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष केवल उपलब्धि का दावा नहीं, बल्कि वह दृष्टिकोण है जिसमें बीमारी के उपचार के साथ उसके सामाजिक और पर्यावरणीय कारणों पर प्रहार को भी आवश्यक माना गया।
यहीं से सार्वजनिक नीति के चरित्र पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है—क्या सरकारें केवल समस्याओं का उपचार करें या ऐसी परिस्थितियां भी निर्मित करें जिनमें समस्याएं उत्पन्न होने की संभावना ही कम हो जाए? स्वच्छता अभियान की वास्तविक सार्थकता इसी दूसरी दृष्टि में निहित है। यदि शौचालय निर्माण, स्वच्छ परिवेश और जनचेतना किसी गंभीर बीमारी के नियंत्रण में सहायक बनते हैं, तो यह शासन की उस अवधारणा को पुष्ट करता है जिसमें स्वास्थ्य को अस्पतालों से आगे ले जाकर नागरिक जीवन की समग्र गुणवत्ता से जोड़ा जाता है।
लेकिन बीमारी से मुक्ति विकास की अंतिम मंजिल नहीं है। स्वस्थ नागरिक को अवसर भी चाहिए और अवसर का उपयोग करने की क्षमता भी। यहीं तकनीक ग्रामीण भारत के लिए परिवर्तनकारी शक्ति बन सकती है। जनधन खातों और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी व्यवस्थाओं ने राज्य की योजनाओं और लाभार्थी के बीच प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया है। बिचौलियों की भूमिका कम करना केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि उस नागरिक को आर्थिक व्यवस्था में प्रतिष्ठित करने का प्रयास है जो लंबे समय तक औपचारिक वित्तीय तंत्र से बाहर रहा।
डिजिटल क्रांति का अगला चरण इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। प्रश्न यह नहीं कि गांव में इंटरनेट पहुंच गया या मोबाइल फोन हाथ में आ गया; प्रश्न यह है कि उस तकनीक ने गांव के नागरिक की क्षमता कितनी बढ़ाई। यदि किसान डिजिटल माध्यम से आर्थिक गतिविधियों से जुड़ता है, महिला अपने खाते में आने वाली राशि पर स्वयं अधिकार रखती है, छोटा दुकानदार डिजिटल भुगतान स्वीकार करता है और युवा गांव में रहते हुए देश-दुनिया के बाजार तक पहुंच बनाता है, तो तकनीक केवल सुविधा नहीं रहती—वह सामाजिक गतिशीलता का माध्यम बन जाती है।
इसी संदर्भ में ग्रामीण युवाओं को ड्रोन तकनीक, ऑटोकैड और जीआईएस जैसे आधुनिक कौशल का प्रशिक्षण दिया जाना एक दूरगामी संकेत है। भारत का भविष्य केवल महानगरों में तैयार होने वाले तकनीकी मानव-संसाधन पर निर्भर नहीं हो सकता। यदि ग्रामीण प्रतिभा को आधुनिक ज्ञान, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ा जाए, तो गांव रोजगार मांगने वाली इकाई के बजाय रोजगार और उद्यमिता पैदा करने वाला केंद्र बन सकता है। स्वर्ण भारत ट्रस्ट द्वारा टेली-एजुकेशन और टेली-मेडिसिन जैसी सुविधाओं के साथ कौशल प्रशिक्षण की पहल इसी संभावना की ओर संकेत करती है।
फिर भी तकनीक को लेकर एक सावधानी आवश्यक है। डिजिटल साधनों की उपलब्धता को ही डिजिटल सशक्तीकरण मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक सशक्तीकरण तब होगा जब नागरिक तकनीक को समझे, उसका स्वतंत्र उपयोग कर सके और उससे आर्थिक तथा सामाजिक अवसरों का निर्माण कर सके। तकनीक तभी लोकतांत्रिक शक्ति बनती है, जब वह ज्ञान और अवसर पर कुछ लोगों के एकाधिकार को तोड़कर व्यापक समाज तक पहुंचती है।
ग्रामीण विकास की चर्चा करते समय स्वास्थ्य के मोर्चे पर सामाजिक संस्थाओं की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। दो दशकों से प्रत्येक माह निःशुल्क चिकित्सा शिविरों का आयोजन और नेत्र चिकित्सा के क्षेत्र में प्रतिदिन औसतन 12 लोगों की शल्य चिकित्सा किए जाने का उल्लेख इस बात की ओर संकेत करता है कि राज्य की व्यवस्था के समानांतर समाज की सेवा-शक्ति भी जनकल्याण का महत्वपूर्ण आधार बन सकती है। दंत एवं नेत्र चिकित्सा जैसी सेवाएं उस वर्ग के लिए विशेष अर्थ रखती हैं जिसके लिए उपचार तक पहुंच आर्थिक अथवा भौगोलिक कारणों से कठिन रही है।
वास्तव में विकास की सबसे विश्वसनीय परिभाषा वही है जो मनुष्य के दैनिक जीवन में दिखाई दे। किसी मां को पानी के लिए दूर न जाना पड़े, किसी महिला का रसोईघर धुएं से मुक्त हो, किसी परिवार को गंभीर बीमारी के समय आर्थिक सुरक्षा मिले, किसी गरीब को पक्का घर मिले और किसी ग्रामीण युवा को अपने गांव से ही दुनिया के बाजार तक पहुंचने का अवसर मिले—ये वे परिवर्तन हैं जिनसे विकास की अवधारणा को मानवीय अर्थ मिलता है। योजनाओं की सफलता का अंतिम परीक्षण उनके बजटीय आकार में नहीं, बल्कि नागरिक के जीवन में उत्पन्न हुई नई संभावनाओं में होना चाहिए।
इस पूरी विकास-दृष्टि के बीच भारत की सांस्कृतिक चेतना को अलग करके नहीं देखा जा सकता। उत्तर और दक्षिण के बीच सांस्कृतिक संबंधों का उल्लेख करते हुए वल्लभाचार्य, निम्बार्काचार्य, भगवान बुद्ध और आचार्य नागार्जुन की परम्पराओं का स्मरण वस्तुतः उस भारत की ओर संकेत है जिसकी शक्ति उसकी एकरूपता में नहीं, बल्कि विविधताओं के बीच अंतर्निहित एकात्मबोध में रही है। भाषाएं अलग हो सकती हैं, भौगोलिक परिस्थितियां भिन्न हो सकती हैं, किंतु ज्ञान, दर्शन और सांस्कृतिक चेतना की अंतर्धारा भारत को एक सूत्र में बांधती रही है।
यह बिंदु आज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिकता और परम्परा को परस्पर विरोधी मानने की प्रवृत्ति लगातार दिखाई देती है। भारत के संदर्भ में यह विभाजन कृत्रिम है। आधुनिक तकनीक हमें भविष्य की ओर ले जा सकती है, जबकि सांस्कृतिक चेतना हमें यह स्मरण कराती है कि विकास का अंतिम उद्देश्य मनुष्य और समाज को अधिक सक्षम, अधिक संवेदनशील और अधिक उत्तरदायी बनाना है। तकनीकी सामर्थ्य यदि मानवीय मूल्यों से विमुख हो जाए, तो वह सुविधा तो पैदा कर सकती है, किंतु सभ्य समाज नहीं।
वर्ष 2047 तक विकसित भारत का संकल्प इसी व्यापक प्रश्न को हमारे सामने रखता है कि विकास का केंद्र कौन होगा? यदि उत्तर केवल सरकार है, तो यह संकल्प अधूरा रहेगा। सरकार नीतियां बना सकती है, संसाधन उपलब्ध करा सकती है और अवसरों के द्वार खोल सकती है; लेकिन उन अवसरों को सामाजिक शक्ति में बदलने का दायित्व समाज को ही निभाना होगा। सेवा संस्थाएं, नागरिक संगठन, शिक्षण संस्थान, उद्यमी और स्वयं नागरिक—इन सबकी सहभागिता के बिना कोई भी विराट राष्ट्रीय लक्ष्य जनजीवन की स्थायी उपलब्धि नहीं बन सकता।
इसलिए स्वर्ण भारत ट्रस्ट जैसी संस्थाओं की भूमिका को केवल सेवा-कार्य की सूची से नहीं आंकना चाहिए। निःशुल्क चिकित्सा से लेकर तकनीकी प्रशिक्षण तक की पहल का मूल्य इस बात में है कि वह व्यक्ति को तत्काल सहायता देने के साथ भविष्य के लिए सक्षम बनाने की दिशा में कितनी दूर जाती है। किसी व्यक्ति की आंख का उपचार करना सेवा है, किंतु उसके जीवन में आत्मनिर्भरता की दृष्टि पैदा करना उससे भी व्यापक सामाजिक दायित्व है।
भारत के विकास का अगला अध्याय इसी समन्वय से लिखा जाना है—सरकार की नीति, समाज की सहभागिता, तकनीक की शक्ति और सेवा की संवेदना के समागम से। स्वच्छता यदि बीमारी के विरुद्ध सुरक्षा-कवच बन सकती है, तकनीक यदि गांव के युवा के लिए अवसरों का द्वार खोल सकती है और सामाजिक संस्थाएं यदि अंतिम व्यक्ति तक सेवाएं पहुंचा सकती हैं, तो विकास की परिभाषा निश्चित ही बदल रही है।
2047 का विकसित भारत केवल ऊंची विकास दर, विशाल अवसंरचना और वैश्विक आर्थिक शक्ति का नाम नहीं होना चाहिए। उसकी वास्तविक पहचान तब होगी, जब भारत का अंतिम गांव भी यह कह सके कि विकास उसके दरवाजे तक आया ही नहीं, बल्कि उसके जीवन का हिस्सा बन गया है। जिस दिन गांव का नागरिक अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त होगा, युवा अपने गांव से ही दुनिया से संवाद कर सकेगा और समाज अपने सबसे कमजोर व्यक्ति को अकेला नहीं छोड़ेगा—उस दिन विकसित भारत का स्वप्न संकल्प से आगे बढ़कर साकार यथार्थ का रूप लेगा।