इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा—कानून की कठोर धाराओं को आकर्षित करने के लिए आरोपित कृत्य का पीड़ित की जातिगत पहचान से प्रत्यक्ष संबंध और ‘पब्लिक व्यू’ में घटना का तत्व होना आवश्यक; अन्य आपराधिक धाराओं की कार्रवाई जारी रहेगी
दैनिक इंडिया न्यूज़ ,लखनऊ।अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों को लेकर सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रही एक वायरल व्याख्या के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक महत्वपूर्ण निर्णय यह स्पष्ट करता है कि किसी व्यक्ति का अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित होना मात्र अपने आप में अधिनियम की प्रत्येक धारा को आरोपित करने का आधार नहीं बन सकता। न्यायालय ने विशेष रूप से अधिनियम की धारा 3(1)(r) के संदर्भ में यह परखा कि कथित अपमान या भयादोहन का कृत्य क्या पीड़ित की जातिगत पहचान के कारण जानबूझकर किया गया और क्या वह घटना ऐसी परिस्थिति में हुई जिसे कानून की दृष्टि से ‘public view’ कहा जा सके।
यह मामला Susheel Kumar alias Yojna Mantri and 2 Others बनाम State of U.P. and Another, Criminal Appeal No. 12155 of 2024 से संबंधित है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संतोष राय ने की और 20 जुलाई 2026 को आदेश पारित किया गया। मामले की Neutral Citation 2026:AHC:147425 है। विवाद कन्नौज की विशेष अदालत से जारी समन आदेश से जुड़ा था, जिसमें आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 323, 504 और 506 तथा SC/ST Act की धारा 3(1)(r) के तहत तलब किया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि में भूमि की बिक्री से संबंधित विवाद था। शिकायतकर्ता की ओर से आरोप लगाए गए कि विवाद के दौरान उसके साथ मारपीट और अपमानजनक व्यवहार किया गया। विशेष न्यायालय ने उपलब्ध शिकायत, गवाहों के कथनों तथा चिकित्सकीय सामग्री का परीक्षण करने के बाद आरोपियों को विभिन्न धाराओं में तलब किया। इसके विरुद्ध आरोपियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए तर्क दिया कि विवाद का मूल स्वरूप भूमि की बिक्री से संबंधित था और SC/ST Act की धारा 3(1)(r) के आवश्यक वैधानिक अवयव रिकॉर्ड पर स्थापित नहीं होते।
हाईकोर्ट के समक्ष निर्णायक प्रश्न यह नहीं था कि पक्षकारों के बीच विवाद हुआ था या नहीं, बल्कि यह था कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर SC/ST Act की धारा 3(1)(r) के अपराध के आवश्यक तत्व प्रथमदृष्टया विद्यमान थे अथवा नहीं। न्यायालय ने इसी सीमित लेकिन महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न पर रिकॉर्ड का परीक्षण किया।
धारा 3(1)(r) के संदर्भ में न्यायालय ने इस बात को महत्व दिया कि केवल अपमान, विवाद अथवा आपसी वैमनस्य का आरोप पर्याप्त नहीं है। अभियोजन सामग्री से यह प्रथमदृष्टया परिलक्षित होना चाहिए कि आरोपी ने अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को जानबूझकर अपमानित या भयभीत किया और उस कृत्य का संबंध उसकी जातिगत पहचान से था। इसके अतिरिक्त घटना का ‘public view’ में होना भी इस प्रावधान के आवश्यक तत्वों में शामिल है।
रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता और गवाहों के कथनों में ऐसे विशिष्ट जातिसूचक शब्दों अथवा परिस्थितियों का पर्याप्त उल्लेख नहीं था, जिससे यह प्रथमदृष्टया निष्कर्ष निकाला जा सके कि कथित अपमान शिकायतकर्ता की जाति के कारण किया गया था। न्यायालय के समक्ष उपलब्ध सामग्री में धारा 3(1)(r) को आकर्षित करने वाले आवश्यक तत्वों का अभाव पाया गया।
यहीं इस निर्णय का विधिक महत्व निहित है। न्यायालय ने व्यक्तिगत अथवा संपत्ति संबंधी विवाद को मात्र इसलिए स्वतः जातिगत अत्याचार की श्रेणी में रखने से इनकार किया क्योंकि विवाद में शामिल व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित था। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि भूमि विवाद के दौरान SC/ST Act लागू नहीं हो सकता। यदि किसी मामले में भूमि या संपत्ति विवाद की आड़ में जातिगत पहचान के कारण जानबूझकर अपमान, भयभीत करने अथवा अन्य वैधानिक अपराध के स्पष्ट तत्व सामने आते हैं, तो अधिनियम के प्रावधान लागू हो सकते हैं।
फैसले में न्यायालय ने पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांतों के आलोक में भी इस विधिक कसौटी को परखा। Hitesh Verma बनाम State of Uttarakhand सहित संबंधित निर्णयों के सिद्धांतों का संदर्भ लेते हुए यह रेखांकित किया गया कि संपत्ति अथवा भूमि के स्वामित्व और कब्जे को लेकर उत्पन्न प्रत्येक विवाद को स्वतः SC/ST Act के अंतर्गत अपराध में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। अपराध की प्रकृति निर्धारित करने के लिए यह देखना आवश्यक है कि कथित कृत्य में अधिनियम द्वारा निर्धारित विशिष्ट जातिगत तत्व विद्यमान हैं या नहीं।
‘Public view’ की अवधारणा भी इस निर्णय में महत्वपूर्ण रही। न्यायालय ने इस अंतर को रेखांकित किया कि किसी घटना का केवल सार्वजनिक स्थान पर होना और घटना का वास्तव में ‘public view’ में होना समानार्थी नहीं हैं। धारा 3(1)(r) के आरोप की न्यायिक कसौटी पर घटना की परिस्थितियों और वहां मौजूद व्यक्तियों की स्थिति का भी परीक्षण आवश्यक है।
हालांकि इस आदेश को लेकर सोशल मीडिया पर प्रसारित कई पोस्ट एक महत्वपूर्ण तथ्य को छोड़ देती हैं। हाईकोर्ट ने आरोपियों को सभी आपराधिक आरोपों से मुक्त नहीं किया। न्यायालय ने SC/ST Act की धारा 3(1)(r) से संबंधित कार्यवाही में हस्तक्षेप किया, लेकिन मारपीट तथा अन्य आरोपों से संबंधित कार्यवाही को समाप्त नहीं किया। उपलब्ध चिकित्सकीय सामग्री में चोटों का उल्लेख होने के कारण भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी गई।
अर्थात न्यायालय का निर्णय न तो SC/ST Act की वैधानिक संरचना को कमजोर करने वाला है और न ही प्रत्येक जातिगत शिकायत को संदेह की दृष्टि से देखने का कोई सार्वभौमिक सिद्धांत स्थापित करता है। इसका दायरा उस विशिष्ट आरोप और उस विशिष्ट वैधानिक प्रावधान तक है जिसकी आवश्यक शर्तें उपलब्ध साक्ष्य और कथनों से प्रथमदृष्टया पूरी नहीं होती थीं।
इस निर्णय का व्यापक विधिक संदेश यही है कि दंड विधि में आरोप की गंभीरता जितनी अधिक होगी, उसके वैधानिक अवयवों की पूर्ति भी उतनी ही अनिवार्य होगी। किसी विशेष अधिनियम का संरक्षण वास्तविक पीड़ितों तक प्रभावी रूप से पहुंचे, इसके लिए उसके प्रावधानों का विधि-सम्मत प्रयोग आवश्यक है। इसी प्रकार किसी व्यक्ति को ऐसे अभियोजन से संरक्षण मिलना भी विधि के शासन का अनिवार्य हिस्सा है, जिसमें आरोपित अपराध के मूलभूत तत्व ही प्रथमदृष्टया स्थापित न हों।
SC/ST Act सामाजिक रूप से वंचित और ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़न का सामना करने वाले समुदायों को विधिक संरक्षण प्रदान करने वाला महत्वपूर्ण कानून है। इसलिए इसके प्रावधानों की कठोरता का उद्देश्य पीड़ित को न्याय से वंचित करना नहीं, बल्कि जातिगत अत्याचार के विरुद्ध प्रभावी विधिक प्रतिरोध सुनिश्चित करना है। लेकिन किसी भी दंडात्मक कानून की तरह इसकी धाराओं का प्रयोग भी उन्हीं परिस्थितियों में होना चाहिए जहां संबंधित अपराध के आवश्यक वैधानिक तत्व मौजूद हों।
यही कारण है कि इस फैसले को सोशल मीडिया की दो अतियों के बीच समझना आवश्यक है। एक ओर यह कहना गलत होगा कि “SC/ST Act केवल जाति बताने से लागू हो जाता है”; दूसरी ओर यह कहना भी उतना ही भ्रामक होगा कि “भूमि विवाद होने पर SC/ST Act कभी लागू नहीं हो सकता।” दोनों ही निष्कर्ष न्यायालय के निर्णय की वास्तविक सीमा से बाहर हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश दरअसल इसी विधिक संतुलन की ओर संकेत करता है—पीड़ित को वैधानिक संरक्षण मिले, लेकिन अभियोजन की बुनियाद भी विधि द्वारा निर्धारित अनिवार्य तत्वों पर टिकी हो। न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य न तो वास्तविक अत्याचार को संरक्षण से वंचित करना है और न ही ऐसे आरोप को दंडात्मक कार्रवाई का आधार बनाना, जिसमें संबंधित अपराध के आवश्यक तत्व प्रथमदृष्टया परिलक्षित ही न हों।
इस दृष्टि से देखा जाए तो वायरल संदेश का मूल दावा पूरी तरह असत्य नहीं है, लेकिन उसका प्रस्तुतिकरण अधूरा है। हाईकोर्ट ने पूरे SC/ST Act को लेकर कोई सार्वभौमिक निषेध नहीं लगाया। उसने विशिष्ट मामले में धारा 3(1)(r) के आरोप की वैधानिक कसौटी पर जांच की और पाया कि आवश्यक जातिगत तत्व तथा ‘public view’ की शर्त उस सामग्री से प्रथमदृष्टया सिद्ध नहीं होती थी।
अंततः इस निर्णय का सार एक ही विधिक सिद्धांत में सिमटता है—कानून की कठोरता का औचित्य तभी है, जब उसका प्रयोग उसके निर्धारित वैधानिक अवयवों के अनुरूप हो। सामाजिक न्याय की रक्षा और विधिक प्रक्रिया की निष्पक्षता—दोनों एक-दूसरे के प्रतिकूल नहीं, बल्कि विधि के शासन के समानांतर आधार हैं। यही संतुलन किसी भी दंडात्मक कानून की विश्वसनीयता और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को बनाए रखता है।