हाईकोर्ट ने नौ वर्ष पहले पूछा था—क्या विज्ञापन में ‘ओ’ लेवल प्रमाणपत्र जैसी अतिरिक्त पात्रता संविधान के अनुच्छेद 187(3) और सेवा नियमों में बदलाव के बिना तय की जा सकती है? 2020-21 की भर्तियों पर उठे आरोपों और मौजूदा नियुक्ति-विवादों के बीच अब दस्तावेजी जांच की मांग तेज
दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय की नियुक्तियों और भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर उठते सवालों की कड़ी नई नहीं है। उपलब्ध न्यायिक अभिलेखों में 23 दिसंबर 2015 का इलाहाबाद हाईकोर्ट, लखनऊ खंडपीठ का एक आदेश सामने आता है, जिसमें न्यायमूर्ति राजन राय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न दर्ज किया था—क्या विधानसभा सचिवालय की किसी भर्ती के विज्ञापन में ऐसी शैक्षिक या पात्रता शर्त जोड़ी जा सकती है, जिसका उल्लेख संबंधित सेवा नियमों में नहीं है, और क्या ऐसा करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 187(3) के तहत आवश्यक प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य है? नौ वर्ष से अधिक समय बाद भी यह प्रश्न विधानसभा सचिवालय की भर्ती एवं नियुक्ति व्यवस्था की पारदर्शिता पर बहस का आधार बना हुआ है।
23 दिसंबर 2015 के आदेश में Service Single No. 7377 of 2015, Indu Prakash Singh & Others बनाम State of U.P. through Chief Secretary, Lucknow & Others मामले की सुनवाई का उल्लेख है। आदेश के अनुसार याचिकाकर्ताओं ने 16 नवंबर 2015 के विज्ञापन को विभिन्न आधारों पर चुनौती दी थी। विवाद का एक प्रमुख बिंदु यह था कि विज्ञापन में DOEACC से ‘O’ Level Computer Training Certificate की शर्त निर्धारित की गई थी, जबकि याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह योग्यता उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय (Recruitment and Conditions of Service) Rules, 1974 में उल्लिखित नहीं थी। न्यायालय ने इसी बिंदु को महज प्रशासनिक औपचारिकता मानकर छोड़ने के बजाय संवैधानिक प्रश्न के रूप में दर्ज किया।
न्यायालय के समक्ष सरकारी पक्ष की ओर से यह दलील रखी गई थी कि उक्त शर्त ‘qualification’ के बजाय ‘eligibility condition’ है। हालांकि, आदेश में यह भी दर्ज है कि सरकारी अधिवक्ता ने इस संबंध में निर्देश प्राप्त करने के लिए समय मांगा कि ऐसी शर्त निर्धारित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 187(3) के अंतर्गत प्रक्रिया आवश्यक है अथवा नियुक्ति प्राधिकारी स्वयं ऐसा कर सकता है। न्यायालय ने परीक्षा परिणाम तत्काल घोषित न किए जाने की बात भी आदेश में दर्ज की और मामले को 7 जनवरी 2016 को पुनः सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह प्रश्न विचारणीय माना कि विज्ञापन में निर्धारित शर्त ‘qualification’, ‘eligibility condition’ अथवा दोनों है और क्या उसे 1974 के सेवा नियमों में निर्धारित प्रक्रिया के बिना लागू किया जा सकता है।
यही वह बिंदु है जहां से विधानसभा सचिवालय की भर्ती व्यवस्था पर उठने वाले बाद के प्रश्नों को समझने की आवश्यकता सामने आती है। 2020 में विधानसभा सचिवालय ने 87 पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी, जिसमें संपादक, प्रतिवेदक, समीक्षा अधिकारी, अपर निजी सचिव, सहायक समीक्षा अधिकारी, व्यवस्थापक, शोध एवं संदर्भ सहायक, सूचीकार और सुरक्षा सहायक जैसे पद शामिल थे। आवेदन दिसंबर 2020 में आमंत्रित किए गए और चयन प्रक्रिया में लिखित परीक्षाओं के चरण रखे गए थे।
इसी भर्ती प्रक्रिया को लेकर बाद में अभ्यर्थियों की ओर से न्यायालय में अनियमितताओं के आरोप लगाए गए। जून 2021 में प्रकाशित न्यायिक रिपोर्टिंग से यह सामने आया था कि विधानसभा सचिवालय की 87 पदों वाली भर्ती को लेकर कुछ अभ्यर्थियों ने पूरी चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उस समय परीक्षा की प्रक्रिया, परिणाम और चयन के तरीके को लेकर आरोप सार्वजनिक चर्चा में आए। इन आरोपों का अंतिम सत्यापन सक्षम जांच या न्यायिक निष्कर्ष का विषय है, लेकिन यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण है कि भर्ती प्रक्रिया को लेकर न्यायिक मंच पर प्रश्न उठ चुके हैं।
अब विवाद का एक और पहलू सामने आता है। विधानसभा सचिवालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार प्रदीप कुमार दुबे वर्तमान में भी विधानसभा के प्रमुख सचिव हैं और आधिकारिक सूची में उनका कार्यकाल 29 जुलाई 2008 से दर्शाया गया है। वर्ष 2026 में उनकी नियुक्ति और पद पर निरंतरता को चुनौती देने वाली एक याचिका भी इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के समक्ष आई, जिसमें याचिकाकर्ता ने उनकी नियुक्ति तथा वर्तमान पद पर बने रहने की वैधानिकता पर प्रश्न उठाए हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार न्यायालय ने विधानसभा सचिवालय और संबंधित पक्षों को अपना जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया है; इसलिए इन आरोपों को अभी न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता।
इसी पृष्ठभूमि में विधानसभा सचिवालय के भीतर लंबे समय से कार्यरत कर्मचारियों से जुड़े कुछ मामलों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। प्रेमपाल, राजकुमार पाल, चंद्रप्रकाश और लाल रत्नाकर जैसे कर्मचारियों के मामलों का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया जा रहा है कि प्रशासनिक कार्रवाई और सेवा संबंधी निर्णयों की स्वतंत्र समीक्षा आवश्यक है। इन मामलों में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर नहीं हो सकी है; इसलिए उनका निष्पक्ष परीक्षण ही यह स्पष्ट कर सकता है कि कार्रवाई नियमसम्मत थी अथवा प्रशासनिक विवेक का असंगत इस्तेमाल हुआ।
सबसे गंभीर दावा 2020-21 की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है। विधानसभा सचिवालय के एक कथित वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से यह आरोप सामने रखा जा रहा है कि बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों द्वारा प्रस्तुत ‘O Level’ कंप्यूटर प्रशिक्षण प्रमाणपत्र तथा दिव्यांगता प्रमाणपत्रों की प्रामाणिकता संदिग्ध है और कथित रूप से लगभग 95 प्रतिशत प्रमाणपत्रों की जांच की आवश्यकता है। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि वर्तमान में उपलब्ध नहीं है। लिहाजा इसे प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि जांच की मांग करने वाले गंभीर आरोप के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि प्रमाणपत्रों की सत्यता को लेकर वास्तव में संदेह है तो संबंधित संस्थानों से सत्यापन, मूल अभिलेखों की फॉरेंसिक जांच और पात्रता मानकों का स्वतंत्र ऑडिट ही वास्तविक स्थिति सामने ला सकता है।
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि ‘O Level’ प्रमाणपत्र से जुड़ा प्रश्न कोई नया प्रशासनिक विवाद नहीं है। 2015 में हाईकोर्ट के समक्ष इसी प्रकार की पात्रता शर्त को लेकर संवैधानिक प्रश्न उठ चुका था। ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि बाद की भर्ती प्रक्रियाओं में पात्रता निर्धारित करने, प्रमाणपत्रों के सत्यापन, दिव्यांगता प्रमाणपत्रों की जांच और चयन सूची तैयार करने के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई और उसका अभिलेखीय आधार क्या था।
अब आवश्यकता आरोपों की राजनीति से आगे बढ़कर दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच की है। 2015 के न्यायिक आदेश में उठे संवैधानिक प्रश्न, 2020-21 की भर्ती पर सामने आए न्यायिक विवाद और 2026 में प्रधान सचिव की नियुक्ति एवं निरंतरता को लेकर दायर याचिका—तीनों घटनाक्रम एक व्यापक सवाल की ओर संकेत करते हैं: क्या विधानसभा सचिवालय की नियुक्ति एवं भर्ती व्यवस्था में नियम, प्रक्रिया और पारदर्शिता का एक समान मानदंड लागू हुआ?
यदि 2020-21 की भर्ती में प्रमाणपत्रों को लेकर लगाए जा रहे आरोपों में तथ्य है, तो केवल विभागीय जांच पर्याप्त नहीं होगी। प्रमाणपत्र जारी करने वाली संस्थाओं से प्रत्यक्ष सत्यापन, मूल अभिलेखों की जांच और आवश्यकता पड़ने पर स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराना ही उन अभ्यर्थियों के साथ न्याय होगा जिन्होंने नियमों के अनुसार परीक्षा दी। इसी क्रम में यदि किसी प्रमाणपत्र में कूटरचना या धोखाधड़ी सामने आती है तो दोषी व्यक्ति के साथ-साथ सत्यापन प्रक्रिया में जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
विधानसभा लोकतांत्रिक व्यवस्था का सर्वोच्च विधायी संस्थान है। उसके सचिवालय की नियुक्तियों पर उठने वाला प्रत्येक प्रश्न इसलिए सामान्य सरकारी भर्ती विवाद से अधिक गंभीर महत्व रखता है। 2015 में न्यायालय द्वारा दर्ज किया गया संवैधानिक प्रश्न हो या आज उठ रहे प्रमाणपत्रों और नियुक्तियों के आरोप—इनका समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि मूल अभिलेखों को सार्वजनिक कर स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच से ही संभव है। अब गेंद विधानसभा सचिवालय और सक्षम जांच संस्थाओं के पाले में है कि वे यह स्पष्ट करें कि वर्षों से उठ रहे इन सवालों का उत्तर दस्तावेजों के साथ कब दिया जाएगा।