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37 दिनों में 36 दुर्घटनाएं, 22 मौतें | अपने ही पैसे से मुआवजा लेते मृतक संविदा कर्मी परिवार और खुद की पीठ ठोंकते बड़का बाबू लोग

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Dainik India News

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37 दिनों में 36 दुर्घटनाएं, 22 मौतें | अपने ही पैसे से मुआवजा लेते मृतक संविदा कर्मी परिवार और खुद की पीठ ठोंकते बड़का बाबू लोग

“अपनी मौत का बीमा खुद भर रहे संविदा कर्मी, सरकार सिर्फ तमाशबीन!”

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“10 लाख का लॉलीपॉप देकर खत्म कर दी जाती है एक परिवार की पूरी जिंदगी?”

“क्या संविदा कर्मी सिर्फ मरने और सिस्टम बचाने के लिए ही हैं?”

“जनता अंधेरे में तड़पेगी, तब कहा जाएगा— निजीकरण ही समाधान है!”

“सवालों के कटघरे में बिजली विभाग— हादसा या प्रशासनिक हत्या?”

अविजित आनंद, दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ | उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था आज ऐसे भयावह मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां आंकड़े केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक संगठित मानवीय त्रासदी की कहानी बयान कर रहे हैं। जिस प्रदेश में कभी डेढ़ करोड़ उपभोक्ताओं के लिए प्रत्येक बिजली घर पर 36 कर्मचारियों की तैनाती अनिवार्य मानी जाती थी, आज वही उपभोक्ता संख्या बढ़कर साढ़े तीन करोड़ के पार पहुंच चुकी है, लेकिन कर्मचारियों की संख्या 45 प्रतिशत तक घटा दी गई। इतना ही नहीं, मध्यांचल में “वर्टिकल व्यवस्था” के नाम पर यह संख्या घटाकर मात्र साढ़े सात तक पहुंचा दी गई।

प्रबंधन की यह तथाकथित “अद्भुत कुशलता” अब पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर रही है। उपभोक्ता बढ़ते गए, बिजली का भार बढ़ता गया, लेकिन कर्मचारियों को लगातार कम किया जाता रहा। ऐसा प्रतीत होता है मानो व्यवस्था का नया सिद्धांत यही बन चुका हो — “जितने ज्यादा उपभोक्ता, उतने कम कर्मचारी।”

और इसका परिणाम अब भयावह रूप में सामने है। मात्र 37 दिनों के भीतर 36 दुर्घटनाएं और 22 संविदा कर्मियों की दर्दनाक मौतें हो चुकी हैं। बिजली के हाई वोल्टेज नेटवर्क पर अकुशल कर्मियों से कार्य कराया जा रहा है, जबकि कुशल कर्मचारी लगातार 24-24 घंटे की ड्यूटी कर मानसिक और शारीरिक रूप से टूट चुके हैं। थकान, संसाधनों की कमी और प्रशासनिक दबाव ने बिजली विभाग को सीधे मौत के मुहाने पर खड़ा कर दिया है।

26 मई 2025 को पावर कॉर्पोरेशन द्वारा 10 लाख रुपये मुआवजे का आदेश जारी किया गया, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे कहीं अधिक कड़वी और शर्मनाक है। जिस मुआवजे को “सरकारी सहायता” बताकर प्रचारित किया जा रहा है, वह वास्तव में मृतक संविदा कर्मियों के वेतन से प्रतिमाह काटे जाने वाले 105 रुपये के बीमा अंशदान का परिणाम है। अर्थात जो कर्मी जान गंवा रहा है, वही अपनी मौत का बीमा स्वयं भर रहा था।

सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या किसी परिवार के कमाने वाले सदस्य की मृत्यु का मूल्य सिर्फ 10 लाख रुपये है? क्या इतनी राशि उस परिवार का पूरा जीवन चला सकती है, जिसने अपना पिता, पति या बेटा खो दिया? क्या कोई भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी अपने किसी प्रियजन की मृत्यु पर मात्र 10 लाख रुपये स्वीकार कर लेगा?

संविदा कर्मियों और कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि मृतक परिवारों को “क्षतिपूर्ति” के नाम पर सिर्फ एक प्रशासनिक लॉलीपॉप थमा दिया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि उस बीमा राशि का प्रीमियम ठेकेदार संस्था और संविदा कर्मी स्वयं मिलकर जमा करते हैं। यानी सरकार या विभाग अपनी जेब से राहत नहीं दे रहा, बल्कि मृतक कर्मी के अपने पैसे को ही “मुआवजा” बताकर प्रचारित किया जा रहा है।

विडंबना यह भी है कि छोटे-छोटे राजनीतिक और वोट बैंक आधारित मामलों में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए जाते हैं, लेकिन ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले संविदा कर्मियों के परिवारों को केवल बीमा राशि का सहारा देकर इतिश्री कर ली जाती है। सवाल उठ रहा है कि क्या संविदा कर्मी और उनके परिवार वोट बैंक की श्रेणी में नहीं आते? क्या उनका जीवन सिर्फ सेवा करते हुए अपनी बलि देने तक सीमित है?

इन सवालों के बीच बिजली विभाग के शीर्ष अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर आरोप लग रहे हैं। अध्यक्ष आशीष गोयल और प्रबंध निदेशक रिया केजरीवाल जैसे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों पर आरोप है कि अनुभवहीन प्रशासनिक निर्णयों, नियमों में मनमाने बदलाव और निजीकरण के छुपे एजेंडे ने पूरी व्यवस्था को संकट में डाल दिया है। आरोप यह भी है कि अनुभवी और कुशल संविदा कर्मियों को हटाकर चाटुकारिता करने वाले अधिकारियों और अभियंताओं को महत्व दिया जा रहा है, जो तकनीकी विवेक के बजाय केवल “हां में हां” मिलाने की संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं।

संविदा कर्मियों का आरोप है कि पहले अनुभवी कर्मचारियों को किनारे करो, फिर दबाव में काम करने वाले चाटुकार अभियंताओं और जूनियर इंजीनियरों से काम लो, और जब दुर्घटनाएं हों तो जिम्मेदारी से बच निकलो। यही कारण है कि बिजली व्यवस्था में तकनीकी दक्षता की जगह अब प्रशासनिक दबाव और चापलूसी ने ले ली है।

पिछली बार जब कर्मचारियों ने कार बहिष्कार और हड़ताल की थी, तब भी जिम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय पूरा दोष श्रमिक संगठनों और अभियंता संघों पर डाल दिया गया। करोड़ों रुपये के मुआवजे के मुकदमे नेताओं पर ठोक दिए गए, जबकि करीबी और चाटुकार लोग सुरक्षित बचा लिए गए। इस तरह प्रशासनिक विफलता को पर्दे के पीछे छुपा लिया गया।

अब संविदा कर्मियों के बीच यह धारणा तेजी से मजबूत हो रही है कि पहले कर्मचारियों को असुरक्षित परिस्थितियों में झोंको, फिर दुर्घटनाएं होने दो, उसके बाद जनता को बिजली संकट में धकेलकर यह माहौल तैयार करो कि “निजीकरण ही समाधान है।” यदि यह सच है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं के साथ किया गया सबसे क्रूर खिलवाड़ माना जाएगा।

सबसे अधिक पीड़ादायक तथ्य यह है कि किसी भी बड़ी दुर्घटना के बाद न ऊर्जा मंत्री की ओर से संवेदना व्यक्त की जाती है, न अध्यक्ष और न ही प्रबंध निदेशक की ओर से कोई सार्वजनिक शोक संदेश जारी होता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो संविदा कर्मियों की मौत अब सिर्फ एक आंकड़ा बनकर रह गई हो और विभागीय फाइलों में दबा दी जाती हो।

अब बड़ा यक्ष प्रश्न यह खड़ा हो चुका है कि क्या इन मौतों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर मानववध का मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए? यदि लगातार चेतावनियों, संसाधनों की कमी और सुरक्षा मानकों की अनदेखी के बावजूद मौतें हो रही हैं, तो जवाबदेही तय क्यों नहीं हो रही? आखिर संविदा कर्मियों का जीवन इतना सस्ता क्यों माना जा रहा है?

एक और गंभीर सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या मृतक साथियों के लिए शोक सभा आयोजित करने की अनुमति भी कर्मचारियों को मिलेगी, या उस पर भी प्रशासनिक तानाशाही हावी रहेगी?

उत्तर प्रदेश आज देश में सर्वाधिक बिजली उपभोक्ता वाला राज्य है। ऐसे समय में संविदा कर्मियों की लगातार मौतें और जनता के सामने खड़ा होता बिजली संकट न केवल शर्मनाक है, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी खड़ा करता है।

संविदा कर्मियों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो जल्द ही व्यापक हड़ताल की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा। भीषण गर्मी में बिजली संकट गहराएगा, उद्योग प्रभावित होंगे, अस्पतालों और आम उपभोक्ताओं की मुश्किलें बढ़ेंगी और पूरा सिस्टम चरमरा सकता है। तब शायद यही कहा जाएगा — “निजीकरण ही एकमात्र समाधान है।”

सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि आखिर संविदा कर्मियों को उनका अधिकार कब मिलेगा? कब तक उन्हें सुरक्षा, सम्मान और स्थायी समाधान के नाम पर केवल आश्वासन दिया जाता रहेगा? क्या उनका अस्तित्व सिर्फ जोखिम भरी सेवा देने और जान गंवाने तक सीमित है?

आज आवश्यकता केवल मुआवजे की नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने की है। मानव जीवन किसी भी निजीकरण के एजेंडे, प्रशासनिक महत्वाकांक्षा या विभागीय प्रयोग से कहीं अधिक मूल्यवान है। यदि अब भी व्यवस्था नहीं चेती, तो यह संकट आने वाले समय में और भी भयावह रूप ले सकता है।

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