
पंचायत सूची में 66 लाख नाम, विधानसभा की सूची में जगह नहीं; सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों और युवाओं का भी किया जिक्र, अब निर्वाचन आयोग से जवाबदेही और पारदर्शिता की अपेक्षा
दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर ऐसे आंकड़े सामने रखे हैं, जिन्होंने प्रदेश की निर्वाचन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में उन्होंने दावा किया कि प्रदेश में करीब 1.27 करोड़ हिंदू मतदाताओं के नाम विधानसभा की मतदाता सूची में शामिल नहीं हैं। मुख्यमंत्री के इस बयान ने मतदाता सूची की शुद्धता, पुनरीक्षण प्रक्रिया और पात्र नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा को बहस के केंद्र में ला दिया है।
मुख्यमंत्री ने अपने दावे के समर्थन में पंचायत और विधानसभा चुनावों की मतदाता सूचियों के बीच अंतर का उल्लेख किया। उनका कहना था कि लगभग 66 लाख ऐसे लोगों के नाम पंचायत चुनाव की मतदाता सूची में दर्ज हैं, लेकिन विधानसभा की मतदाता सूची में वे दिखाई नहीं दे रहे। सवाल यह है कि जब किसी नागरिक का नाम एक निर्वाचन सूची में मौजूद है, तो दूसरी सूची में उसकी अनुपस्थिति के कारणों की पड़ताल किस स्तर पर हो रही है?
योगी आदित्यनाथ ने सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों और युवा मतदाताओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने करीब 55 लाख सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों तथा 18 से 19 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 4.5 लाख युवाओं के नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं होने की बात कही। मुख्यमंत्री के अनुसार, यह स्थिति केवल आंकड़ों का अंतर नहीं, बल्कि पात्र नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा विषय है।
दो करोड़ से अधिक नाम हटे, लेकिन सवाल केवल संख्या का नहीं
निर्वाचन आयोग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद 10 अप्रैल 2026 को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 13,39,84,792 मतदाता दर्ज थे। पुनरीक्षण से पहले यह संख्या लगभग 15.44 करोड़ थी। इस प्रक्रिया में दो करोड़ से अधिक नाम हटाए गए, जबकि अंतिम सूची में 84,28,767 नए नाम भी जोड़े गए। हालांकि, हटाए गए नामों की कुल संख्या को हिंदू मतदाताओं के नाम हटाए जाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। मुख्यमंत्री का 1.27 करोड़ वाला आंकड़ा उनका दावा है, जिसकी निर्वाचन आयोग से स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
निर्वाचन आयोग के सामने सबसे बड़ा सवाल
मुख्यमंत्री के बयान के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि मतदाता सूची में नामों के अंतर की वास्तविक वजह क्या है? क्या सभी छूटे हुए नामों का नियमानुसार सत्यापन हुआ है? क्या पात्र नागरिकों को अपना नाम जुड़वाने का पर्याप्त अवसर मिला? पंचायत और विधानसभा मतदाता सूचियों के बीच अंतर का तथ्यात्मक आधार क्या है? इन सवालों पर निर्वाचन आयोग की स्पष्ट स्थिति सामने आना आवश्यक है।
मुख्यमंत्री ने पार्टी के जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर पर मतदाता सूचियों की पड़ताल करने तथा छूटे हुए पात्र नागरिकों के नाम जुड़वाने के लिए सक्रिय रहने का निर्देश दिया है। अब इस पहल के साथ निर्वाचन आयोग की संस्थागत जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण हो जाती है। मतदाता सूची की विश्वसनीयता केवल प्रकाशित आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस विश्वास से स्थापित होती है कि कोई भी पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न रह जाए।
लोकतंत्र में मतदाता सूची महज नामों का दस्तावेज नहीं, बल्कि नागरिक की राजनीतिक भागीदारी का संवैधानिक आधार है। इसलिए मुख्यमंत्री द्वारा उठाए गए सवालों का उत्तर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच, प्रमाणिक आंकड़ों और समयबद्ध सुधार से मिलना चाहिए।