अनुभवात्मक, अन्वेषणपरक एवं विद्यार्थी-केंद्रित अधिगम को मिलेगा प्रोत्साहन; नई पाठ्यपुस्तकों और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा को कक्षागत व्यवहार में परिणत करने की दिशा में SCERT की महत्त्वपूर्ण पहल
दैनिक इंडिया न्यूज़ 07 NOV 2026 नई दिल्ली।
दिल्ली के सरकारी विद्यालयों में संस्कृत शिक्षण अब परंपरागत अध्यापन की सीमाओं का अतिक्रमण कर नवाचारी, अनुभवाधारित, कौशलोन्मुख एवं विद्यार्थी-केंद्रित अधिगम की ओर अग्रसर होने जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की दूरदर्शी संकल्पना और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा के शैक्षिक प्रतिमानों के अनुरूप संस्कृत शिक्षण के स्वरूप में गुणात्मक परिवर्तन लाने की दिशा में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् (SCERT), दिल्ली ने एक महत्त्वपूर्ण अकादमिक पहल की है। इसी क्रम में परिषद् द्वारा मंडलीय शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET), मोती बाग में 3 से 7 नवंबर तक आयोजित पाँच दिवसीय मास्टर ट्रेनर्स प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफलतापूर्वक समापन हुआ। इस आयोजन का मूल ध्येय संस्कृत शिक्षकों को समकालीन शैक्षिक दृष्टिबोध, आधुनिक अध्यापन प्रविधियों तथा सृजनात्मक शिक्षण-कौशलों से समृद्ध कर विद्यालयों में व्यापक शैक्षिक रूपांतरण की सुदृढ़ आधारभूमि तैयार करना रहा।
इस प्रशिक्षण की अंतर्वस्तु केवल शिक्षकों को नवीन पाठ्यक्रम से परिचित कराने तक सीमित नहीं रही, अपितु इसके केंद्र में एक व्यापक प्रश्न विद्यमान रहा—नई शिक्षा नीति की परिकल्पनाओं को वास्तविक कक्षागत अनुभव में किस प्रकार रूपांतरित किया जाए? इसी प्रश्न के आलोक में नई पाठ्यपुस्तकों की विषयवस्तु को अधिक रोचक, बोधगम्य एवं प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा के अनुरूप अध्यापन-अधिगम प्रक्रियाओं का संचालन करने तथा विद्यार्थियों में जिज्ञासु वृत्ति, तार्किक विवेक, अन्वेषणशीलता, सृजनात्मक चिंतन और स्वाध्याय की प्रवृत्ति विकसित करने पर गहन विमर्श किया गया। प्रशिक्षणार्थियों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि शिक्षण की सार्थकता केवल पाठ्यवस्तु के संप्रेषण में नहीं, बल्कि विद्यार्थी के भीतर ज्ञानार्जन की स्वाभाविक अभिरुचि जाग्रत करने में निहित है।
कार्यक्रम की विशिष्टता इस तथ्य में भी परिलक्षित हुई कि इसमें राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् (NCERT) तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों से संबद्ध विद्वानों एवं विषय-विशेषज्ञों ने अपनी अकादमिक अंतर्दृष्टि और विशेषज्ञता से मास्टर ट्रेनर्स का मार्गदर्शन किया। प्रशिक्षणार्थियों के रूप में दिल्ली सरकार के विद्यालयों में दीर्घकालीन अध्यापन अनुभव रखने वाले संस्कृत शिक्षकों की सहभागिता ने इस आयोजन को विशिष्ट आयाम प्रदान किया। विषयगत प्रावीण्य, विद्यालयी अनुभव और शिक्षक-प्रशिक्षण की व्यावहारिक समझ का यह समन्वय प्रशिक्षण को केवल सैद्धांतिक परिचर्चा तक सीमित रखने के स्थान पर उसे व्यवहारपरक एवं परिणामोन्मुख बनाने में सहायक सिद्ध हुआ।
इस अवसर पर संस्थान की प्राचार्या डॉ. सुमन नेहरा ने प्रशिक्षणार्थियों को संबोधित करते हुए SCERT, दिल्ली द्वारा संचालित सेवाकालीन शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों की प्रासंगिकता एवं दूरगामी शैक्षिक महत्ता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि शिक्षक किसी भी शैक्षिक परिवर्तन के वास्तविक संवाहक होते हैं और नई शिक्षा नीति की परिकल्पनाओं को धरातल पर साकार करने में उनकी भूमिका निर्णायक है। उन्होंने मास्टर ट्रेनर्स का आह्वान किया कि वे अर्जित शैक्षिक दक्षताओं एवं नवाचारी शिक्षण दृष्टि को विद्यालयी परिवेश में प्रभावी ढंग से प्रसारित करते हुए संस्कृत शिक्षण में सकारात्मक एवं स्थायी परिवर्तन के वाहक बनें।
वहीं, SCERT, दिल्ली की ओर से कार्यक्रम के नोडल प्रभारी डॉ. प्रदीप कुमार पांडेय ने प्रशिक्षण की संकल्पना, उद्देश्यों, पाठ्यक्रम-विकास तथा समग्र प्रशिक्षण-योजना की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस आयोजन का अभिप्राय शिक्षकों को महज नवीन सूचनाओं से अवगत कराना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसी बहुआयामी शिक्षण-दक्षताओं से संपन्न करना है, जिनके माध्यम से राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा के मूल उद्देश्यों को कक्षा-कक्ष में मूर्त स्वरूप प्रदान किया जा सके। उन्होंने रेखांकित किया कि वर्तमान समय में संस्कृत शिक्षण को अनुभवपरक, गतिविधि-आधारित, अन्वेषणोन्मुख तथा जीवन-सापेक्ष बनाना अपरिहार्य हो गया है। इसके लिए शिक्षकों में विषयगत प्रावीण्य के साथ प्रभावशाली शिक्षण प्रविधियों, नवोन्मेषी आकलन-पद्धतियों तथा विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करने वाले कौशलों का विकास भी आवश्यक है।
प्रशिक्षण के दौरान शिक्षा के एक ऐसे व्यापक स्वरूप पर भी विशेष बल दिया गया, जिसमें ज्ञानार्जन का उद्देश्य केवल विषयगत सूचनाओं का संचय न होकर व्यक्तित्व का सर्वांगीण परिष्कार हो। इस दृष्टि से विद्यार्थियों में संवैधानिक चेतना, मानवीय संवेदनशीलता, सामाजिक उत्तरदायित्व, विवेकसम्मत निर्णय क्षमता तथा उत्तरदायी नागरिकता के गुणों का विकास शिक्षा का अनिवार्य प्रतिफल माना गया। संस्कृत को केवल एक प्राचीन भाषा अथवा परंपरागत विषय के रूप में देखने के स्थान पर भारतीय ज्ञान-परंपरा के समृद्ध बौद्धिक वैभव, समकालीन सामाजिक संदर्भों और विद्यार्थियों के दैनिक जीवनानुभवों से जोड़ने की संभावनाओं पर भी गंभीरता से विचार किया गया। यह दृष्टिकोण संस्कृत शिक्षण को अधिक प्रासंगिक, जीवंत और ज्ञानपरक बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रशिक्षण की अकादमिक संरचना, विकसित पाठ्यक्रम तथा उसकी व्यावहारिक उपयोगिता से प्रतिभागी मास्टर ट्रेनर्स ने संतोष व्यक्त किया। उन्होंने प्रशिक्षण के दौरान अर्जित ज्ञान, अनुभव और शिक्षण-कौशल को विद्यालय स्तर पर संस्कृत शिक्षकों तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने तथा उसके कक्षागत अनुप्रयोग को प्रोत्साहित करने का संकल्प व्यक्त किया। इस संकल्प के साथ प्रशिक्षण ने अपने अगले चरण की दिशा भी निर्धारित कर दी है, क्योंकि इस पूरी पहल की वास्तविक सफलता अब विद्यालयों की कक्षाओं में दिखाई देने वाले परिवर्तन से ही आंकी जाएगी।
वस्तुतः पाँच दिवसीय यह प्रशिक्षण कार्यक्रम दिल्ली के सरकारी विद्यालयों में संस्कृत शिक्षण की गुणवत्ता-संवर्धन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण शैक्षिक सोपान है। इसके माध्यम से प्रशिक्षित मास्टर ट्रेनर्स आगामी चरण में संस्कृत शिक्षकों के सेवाकालीन प्रशिक्षण का संचालन करेंगे और नई शिक्षण-दृष्टि को व्यापक शिक्षक समुदाय तक पहुँचाने का दायित्व निभाएँगे। अपेक्षा है कि इस पहल से संस्कृत की कक्षाएँ एकपक्षीय व्याख्यान एवं पारंपरिक पठन-पाठन की परिधि से बाहर निकलकर संवाद, गतिविधि, अनुभव, तर्क और अन्वेषण के जीवंत केंद्रों के रूप में विकसित होंगी। यदि यह शैक्षिक संकल्प विद्यालयी व्यवहार में प्रभावी ढंग से प्रतिफलित होता है, तो निस्संदेह संस्कृत शिक्षण न केवल अपनी प्राचीन ज्ञान-संपदा के प्रति विद्यार्थियों में नवीन अनुराग उत्पन्न करेगा, बल्कि उन्हें आधुनिक युग की बौद्धिक चुनौतियों के प्रति अधिक सजग, विवेकशील और सृजनशील बनाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।