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परिष्कार ही संस्कार है- हरिंद्र सिंह

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परिष्कार ही संस्कार है- हरिंद्र सिंह

दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ।मनुष्य प्रायः जीवनपर्यन्त संस्कारों की चर्चा करता रहता है, किंतु विरले ही ऐसे होते हैं जो अपने अंतःकरण के निर्जन प्रांगण में प्रवेश कर यह प्रश्न पूछने का साहस कर सकें कि वे वास्तव में संस्कारित हैं अथवा केवल संस्कारों की शब्दावली के अभ्यस्त। यह प्रश्न बाह्य जगत के लिए नहीं, अपितु आत्म-साक्षात्कार की दहलीज़ पर खड़े उस जिज्ञासु के लिए है जो अपने समस्त आवरणों, आडंबरों और आत्म-प्रवंचनाओं को त्यागकर स्वयं का साक्षात्कार करने को तत्पर हो। यहीं से वह यात्रा आरम्भ होती है जो मनुष्य को भीड़ से पृथक कर व्यक्तित्व की उच्चतर भूमि पर प्रतिष्ठित करती है।

संस्कार कोई वंशानुगत संपदा नहीं, न ही वह कर्मकाण्डों का यांत्रिक अनुशीलन है। वह तो चेतना के अखण्ड परिमार्जन की प्रक्रिया है—विचारों का परिशोधन, वृत्तियों का अनुशासन, प्रवृत्तियों का परिमितीकरण और जीवन-दृष्टि का निरन्तर उत्कर्ष। यह साधना जितनी आवश्यक है, उतनी ही दुष्कर भी; क्योंकि इसका प्रथम आघात मनुष्य के अहंबोध पर पड़ता है। जब तक व्यक्ति स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने के मोहजाल में आबद्ध रहता है, तब तक आत्मोन्नयन के द्वार उसके लिए बंद रहते हैं। विकास की प्रथम सीढ़ी यह स्वीकार करना है कि अभी बहुत कुछ ऐसा है जिसे परिमार्जित किया जाना शेष है।

प्रकृति इस गहनतम सत्य की सर्वोत्तम आचार्या है। वह किसी ग्रंथ का सहारा नहीं लेती, किसी उपदेश का आग्रह नहीं करती; वह केवल अपने अस्तित्व से शिक्षा देती है। वृक्ष जब अपने जर्जर, पीतवर्ण और निष्प्राण पत्तों का परित्याग करते हैं, तब वे क्षणिक रूप से रिक्त और विरूप प्रतीत होते हैं। किंतु उसी रिक्तता में नवजीवन का गर्भ निहित रहता है। पतन के बिना प्रस्फुटन संभव नहीं, त्याग के बिना विस्तार संभव नहीं। नई कोपलों का आगमन, पुष्पों की सुगंध और फलों की परिपक्वता उसी क्षण संभव होती है जब वृक्ष अपने अतीत को पकड़े रहने का मोह त्याग देता है। मनुष्य का जीवन भी इसी नियम का अनुयायी है। जो अपनी जड़ मान्यताओं, दुर्बल प्रवृत्तियों और आत्म-विनाशकारी आदतों को पकड़े रहता है, वह अपने ही विकास का अवरोधक बन जाता है।

युग की घटनाएँ भी निरन्तर इसी सत्य का उद्घोष कर रही हैं। अल्पायु में विलुप्त हो जाते जीवन, सामान्य प्रतीत होने वाली परिस्थितियों के मध्य अकस्मात् समाप्त हो जाती यात्राएँ, और उसके पश्चात कुछ दिनों की संवेदना के बाद पुनः सामान्य हो जाता संसार—ये सब केवल समाचार नहीं, अपितु अस्तित्व के गूढ़ संदेश हैं। मनुष्य स्वयं को अपरिहार्य समझने का भ्रम पाल लेता है, जबकि प्रकृति का विराट प्रवाह किसी एक व्यक्ति की उपस्थिति या अनुपस्थिति से विचलित नहीं होता। यह अनुभूति जितनी कठोर है, उतनी ही मुक्तिदायिनी भी; क्योंकि यहीं से आत्म-जागरूकता का वास्तविक उदय होता है।

संस्कार का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण, किंतु प्रायः उपेक्षित आयाम है—स्वयं के प्रति उत्तरदायित्व। जो शरीर समस्त कर्मों का अधिष्ठान है, जो जीवन-अभिव्यक्ति का माध्यम है, यदि वही उपेक्षित रहे तो समस्त आदर्श केवल कल्पना बनकर रह जाते हैं। जो स्वयं निरन्तर क्षीण होता जा रहा है, वह दूसरों के जीवन में प्रकाश का संचार कैसे करेगा? आत्म-उपेक्षा को त्याग का नाम देना वस्तुतः आत्म-प्रवंचना है। वास्तविक संस्कार संतुलन की प्रतिष्ठा करता है—जहाँ कर्तव्य और आत्म-रक्षा, दोनों का समन्वय विद्यमान हो।

वस्तुतः अनेक लोग यह मानकर जीवन व्यतीत करते हैं कि स्वयं पर व्यय किया गया समय अथवा संसाधन किसी प्रकार की अपव्ययता है। किंतु वे यह विस्मृत कर देते हैं कि यदि साधक ही सुरक्षित न रहे तो साधना का समस्त उपक्रम निरर्थक हो जाता है। इतिहास ने बार-बार सिद्ध किया है कि मनुष्य को अमरता उसके स्मारक नहीं प्रदान करते, उसके परिष्कृत विचार प्रदान करते हैं। चित्रों पर अर्पित पुष्पमालाएँ समय के साथ मुरझा जाती हैं, किंतु जीवन में स्थापित आदर्श युगों तक चेतना को आलोकित करते रहते हैं।

संस्कार का अभिप्राय परम्पराओं के प्रति अंध-समर्पण नहीं है। प्रत्येक परम्परा सत्य का पर्याय नहीं होती और प्रत्येक प्राचीनता पूजनीय नहीं होती। जो मान्यता विवेक का अवरोध करे, प्रश्नों को अपराध बना दे और मनुष्य को जड़ता में बाँध दे, वह कालांतर में विकास की शत्रु बन जाती है। जीवन का शाश्वत नियम है—सतत परीक्षण, सतत परिमार्जन और सतत उन्नयन। जो विचार किसी अन्य युग की परिस्थितियों में उपयोगी थे, उन्हें बिना विवेक वर्तमान पर आरोपित कर देना बुद्धि का परित्याग है। समय का सम्मान वही करता है जो परिवर्तन को शत्रु नहीं, सहयोगी मानता है।

प्रकृति का समस्त विधान परिवर्तन की धुरी पर अवस्थित है। नदी इसलिए निर्मल रहती है क्योंकि वह प्रवाहित होती है; वायु इसलिए जीवनदायिनी है क्योंकि वह गतिमान रहती है। जहाँ ठहराव है, वहाँ क्षय है; जहाँ प्रवाह है, वहीं विकास है। अतः संस्कार का वास्तविक स्वरूप परिवर्तन के प्रति साहस में निहित है—स्वयं को देखने का साहस, अपनी सीमाओं को स्वीकारने का साहस और प्रत्येक दिन स्वयं को कल से श्रेष्ठ बनाने का साहस।

अंततः संस्कार कोई सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं, अपितु अंतर्मन की मौन तपश्चर्या है। इसमें न घोषणाओं का कोलाहल है, न प्रशस्तियों का आकर्षण। किंतु धीरे-धीरे भीतर एक अद्भुत रूपांतरण घटित होने लगता है। विचारों की अशांति स्पष्टता में परिणत होने लगती है, भय जिज्ञासा में रूपांतरित हो जाता है और जीवन संघर्ष न रहकर साधना का रूप धारण कर लेता है। मनुष्य जिस दिन यह प्रश्न पूछना आरम्भ कर देता है कि वह केवल अस्तित्व बनाए हुए है या वास्तव में स्वयं का निर्माण कर रहा है, उसी दिन उसके पुनर्जन्म की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है।

संस्कार की यात्रा वहीं आरम्भ होती है जहाँ आत्म-समझौते का अंत होता है। जिस क्षण व्यक्ति अपनी दुर्बलताओं को तर्कों के पीछे छिपाना छोड़ देता है और स्वयं को गढ़ने का संकल्प धारण कर लेता है, उसी क्षण उसका जीवन सामान्य जीवित रहने की प्रक्रिया से ऊपर उठकर एक जागरूक, उत्तरदायी और अर्थपूर्ण साधना में रूपांतरित हो जाता है। और यही वह क्षण है जहाँ परिष्कार, संस्कार का पर्याय बन जाता है।

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