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PDA’ के न्याय पर बृजलाल का तीखा पलटवार, अखिलेश से पूछा—मेरे साथ हुए व्यवहार को किस न्याय की श्रेणी में रखेंगे?

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Dainik India News

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PDA’ के न्याय पर बृजलाल का तीखा पलटवार, अखिलेश से पूछा—मेरे साथ हुए व्यवहार को किस न्याय की श्रेणी में रखेंगे?

पूर्व DGP एवं राज्यसभा सदस्य बृजलाल ने अखिलेश यादव के बयान पर उठाए गंभीर सवाल; इटावा प्रकरण से लेकर DGP पद और CRPF में नियुक्ति तक के घटनाक्रम गिनाते हुए लगाए दलित उत्पीड़न के आरोप

दैनिक इंडिया न्यूज़, 16 अगस्त 2026 नई दिल्ली।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के 16 अगस्त 2026 को सत्ता में आने पर ‘PDA’ को न्याय देने संबंधी बयान के बाद पूर्व पुलिस महानिदेशक एवं राज्यसभा सदस्य बृजलाल ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। बृजलाल ने अपने विस्तृत बयान में अखिलेश यादव की ‘PDA’ की अवधारणा पर सवाल उठाते हुए अपने पुलिस सेवा-काल के उन घटनाक्रमों का उल्लेख किया, जिनमें उन्होंने स्वयं को दलित अधिकारी के रूप में राजनीतिक प्रताड़ना का शिकार बताया। उन्होंने कहा कि यदि ‘PDA’ में ‘D’ का अर्थ दलित है, तो उनके साथ हुए व्यवहार को भी उसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

बृजलाल ने अपने बयान में वर्ष 1989 के इटावा प्रकरण को विशेष रूप से उठाया। उनके अनुसार, तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने उन्हें इटावा का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बनाया था और उन्होंने 84 दिनों के कार्यकाल में कानून के अनुरूप कार्रवाई की। उन्होंने आरोप लगाया कि 8 अप्रैल 1990 को तत्कालीन मंत्री शिवपाल सिंह यादव के साथ बड़ी संख्या में हथियारबंद लोगों ने सिविल लाइंस थाने पर हमला कर वहां निरुद्ध 25 कथित भू-माफिया आरोपितों को छुड़ा लिया था। बृजलाल के अनुसार, इस कार्रवाई के दौरान थानाध्यक्ष शाह आलम खान के साथ भी मारपीट की गई थी।

पूर्व DGP ने दावा किया कि उक्त प्रकरण में उनके द्वारा कानूनसम्मत रुख अपनाए जाने के बाद उन्हें विभागीय कार्रवाई और सेवा से हटाए जाने की प्रक्रिया का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि सीआईडी जांच के बाद शिवपाल सिंह यादव को क्लीन चिट दी गई, जबकि शाह आलम खान के विरुद्ध अभियोजन और उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की गई। इसी घटनाक्रम को आधार बनाते हुए बृजलाल ने कहा कि एक ही प्रकरण में उनके अनुसार ‘PDA’ के तीनों घटकों—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—के साथ अन्याय हुआ।

बृजलाल ने अपने बयान में यह भी कहा कि इटावा प्रकरण के बाद जब-जब समाजवादी पार्टी की सरकार सत्ता में आई, उन्हें कथित रूप से निशाना बनाकर प्रताड़ित किया गया। उन्होंने कहा कि इन घटनाओं का विस्तृत उल्लेख उनकी पुस्तक ‘इटावा फाइल्स’, जो प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है, में किया गया है। उन्होंने अखिलेश यादव से पुस्तक पढ़ने की अपील करते हुए कहा कि उनके साथ हुए घटनाक्रम को समझने के लिए उसका अध्ययन आवश्यक है।

अपने आरोपों की अगली कड़ी में बृजलाल ने वर्ष 2012 में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद का घटनाक्रम सामने रखा। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें पुलिस महानिदेशक पद से हटाया गया, जिसे उन्होंने स्वीकार्य प्रशासनिक निर्णय बताया, लेकिन उनका आरोप है कि भारत सरकार द्वारा उत्कृष्ट सेवाओं के आधार पर उन्हें महानिदेशक, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (DG CRPF) बनाए जाने की प्रक्रिया के दौरान उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार ने कार्यमुक्त नहीं किया। बृजलाल का कहना है कि यदि उन्हें समय पर कार्यमुक्त किया जाता तो वे देश के पहले दलित DG CRPF बन सकते थे।

बृजलाल ने इसके बाद वर्ष 2013 के उस मामले का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने अपने विरुद्ध हत्या और हत्या की साजिश का मुकदमा दर्ज किए जाने का आरोप लगाया। उनके अनुसार, इस मामले में 38 अन्य अधिकारी एवं पुलिसकर्मी भी नामजद थे। उन्होंने कहा कि 23 नवंबर 2007 को लखनऊ, अयोध्या और वाराणसी की अदालतों में हुए सिलसिलेवार बम विस्फोटों के मामले में खालिद मुजाहिद और हकीम तारिक कासमी की गिरफ्तारी पुलिस कार्रवाई के दौरान हुई थी।

उन्होंने आरोप लगाया कि 18 मई 2013 को खालिद मुजाहिद की अयोध्या से लखनऊ ले जाते समय तबीयत बिगड़ने और ‘लू’ लगने से मृत्यु के बाद उनके विरुद्ध हत्या का मुकदमा दर्ज कराया गया तथा उन्हें जेल भेजने का प्रयास किया गया। बृजलाल ने इसे भी अपने खिलाफ हुई कथित राजनीतिक प्रताड़ना की कड़ी बताया।

अपने बयान के अंतिम हिस्से में पूर्व DGP ने समाजवादी पार्टी के सामाजिक न्याय के दावे पर व्यापक राजनीतिक सवाल खड़े किए। उन्होंने वर्ष 1993 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच हुए राजनीतिक गठजोड़ तथा जून 1995 के लखनऊ गेस्ट हाउस कांड का उल्लेख करते हुए कहा कि दलित-पिछड़ा गठजोड़ की राजनीति का इतिहास भी इन घटनाओं से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

बृजलाल ने अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में दलित अधिकारियों की पदोन्नति और पदावनति से जुड़े निर्णयों पर भी गंभीर आरोप लगाए। उनका दावा है कि उस दौर में एक लाख से अधिक दलित अधिकारियों को पदावनत कर मानसिक एवं प्रशासनिक प्रताड़ना दी गई। उन्होंने इसे दलित हितों के विरुद्ध निर्णय बताते हुए सवाल किया कि ऐसी नीतियों के रहते ‘PDA’ को न्याय देने का दावा कितना सार्थक है।

उन्होंने डॉ. भीमराव आंबेडकर तथा दलित संतों और महापुरुषों के नाम पर स्थापित संस्थानों एवं जिलों के नाम बदले जाने का भी आरोप लगाया। बृजलाल ने कहा कि जिन सामाजिक समूहों के अधिकारों और सम्मान की बात आज ‘PDA’ के नाम पर की जा रही है, उनके साथ पूर्ववर्ती सरकारों के व्यवहार का भी सार्वजनिक मूल्यांकन होना चाहिए।

अपने बयान के अंत में बृजलाल ने अखिलेश यादव के ‘PDA को न्याय’ देने के दावे पर सीधा प्रश्न खड़ा करते हुए कहा कि उनके अनुसार जब उनके जैसे एक दलित IPS अधिकारी को ही अपने सेवाकाल में बार-बार प्रताड़ना का सामना करना पड़ा, तो ‘PDA न्याय’ की राजनीति के दावे को उनके अनुभवों की कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए। हालांकि, बृजलाल द्वारा लगाए गए इन आरोपों पर अखिलेश यादव अथवा समाजवादी पार्टी की ओर से इस बयान के संदर्भ में कोई प्रतिपक्षी प्रतिक्रिया इसमें उपलब्ध नहीं है।

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