
दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ। लखनऊ की एक लाइब्रेरी में भीषण आग लग गई। छात्रों ने खिड़कियों से कूदकर अपनी जान बचाई।सबसे बड़ा सवाल यह है कि लाइब्रेरी के पास फायर NOC था भी या नहीं? अगर थी तो इतनी गंभीर कमियाँ कैसे रह गईं? आग बुझाने के उपकरण पाँच साल पुराने थे, छात्रों के निकलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं थी और निकासी का रास्ता भी बेहद सीमित था।
"दैनिक इंडिया न्यूज़ और समय का उपभोक्ता" दोनों अखबार बराबर इस मामले को लगातार उठा रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी कान में तेल डालकर बैठे हुए हैं। कोई संज्ञान नहीं, कोई कार्रवाई नहीं।
सबसे खतरनाक सच्चाई यह है कि मध्यांचल विद्युत वितरण निगम (MVVNL) के प्रबंध निदेशक कार्यालय समेत पूरे निगम के किसी भी कार्यालय में फायर सेफ्टी का बुनियादी इंतजाम तक नदारद है। पब्लिक डीलिंग वाले इन कार्यालयों में रोज भारी भीड़ जुटती है, लेकिन आग लगने पर क्या होगा — इसकी किसी को कोई चिंता नहीं।
अब सवाल इन लापरवाह विभागों से:
विद्युत सुरक्षा विभाग NOC कैसे जारी कर देता है? अधिकारी इंस्पेक्शन करने की बजाय कुर्सी पर बैठकर पैसा लेकर NOC थमा देते हैं। वायरिंग कैसी है, लोड कितना है, निकासी मार्ग पर्याप्त हैं या नहीं — किसी को देखने की फुरसत नहीं। बस पैसा मिल गया तो NOC जारी!
फायर विभाग की क्या भूमिका है? सिर्फ नाम कमाने के लिए? वह भी इतिश्री कर लेता है। अगर लाइब्रेरी जैसे स्थान में निकासी का रास्ता ही एक है, तो फायर NOC किस आधार पर मिल गया? इंस्पेक्शन हुआ या सिर्फ फाइल पर साइन?
ट्रैफिक विभाग तो पूरी तरह मनमानी पर उतर आया है। हर चौराहे पर अपनी सुविधा के हिसाब से बैरिकेडिंग लगा दी। आम आदमी रोज परेशान, लेकिन फायर ब्रिगेड की गाड़ी को रास्ता मिले या नहीं — इसकी कोई परवाह नहीं। पिछली बार विकास नगर अग्निकांड में फायर ब्रिगेड को डेढ़ घंटे की देरी हुई थी। अगर सारे चौराहे ब्लॉक हैं तो अगली बार फायर ब्रिगेड हेलीकॉप्टर से आएगी क्या?
"ट्रैफिक विभाग के कर्मचारी कुर्सी पर बैठकर सिर्फ आम लोगों के चालान काटते हैं और वीआईपी को सलाम ठोकते हैं।" जनता के लिए कोई इमरजेंसी प्लान? कोई रोड मैप? कुछ नहीं। सिर्फ मनमानी और चाटुकारी।
जनता पूछ रही है —
क्या लखनऊ की सार्वजनिक इमारतों में फायर सेफ्टी सिर्फ कागजों पर है?
बड़े निगमों (MVVNL) के कार्यालयों में फायर NOC और आधुनिक उपकरण क्यों नहीं?
अगर यहां कोई बड़ा हादसा हुआ तो जिम्मेदार कौन होगा — अनुभवहीन प्रबंधन, चाटुकार अभियंता, या फायर/ट्रैफिक/विद्युत सुरक्षा विभाग?
दोनों अखबार लगातार आवाज उठा रहे हैं, फिर भी अधिकारी क्यों चुप हैं?
लाइब्रेरी आग की निष्पक्ष जांच हो और फायर NOC, विद्युत सुरक्षा NOC तथा इंस्पेक्शन की पूरी डिटेल सार्वजनिक की जाए।
सभी सरकारी, अर्ध-सरकारी और पब्लिक डीलिंग वाले कार्यालयों का तुरंत फायर ऑडिट कराया जाए, जिसमें विद्युत सुरक्षा विभाग की मिलीभगत भी जांची जाए।
पुराने, खराब और 5 साल पुराने एक्सटिंग्विशर तुरंत बदलकर नए मानक वाले लगाए जाएँ।
सभी इमारतों में पर्याप्त निकासी मार्ग सुनिश्चित किए जाएँ और उन्हें हमेशा खुला रखा जाए।
बैरिकेडिंग का नया SOP बनाया जाए, जिसमें फायर ब्रिगेड और इमरजेंसी वाहनों की पहुंच को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
दोषी अधिकारियों, फायर, ट्रैफिक, विद्युत सुरक्षा और मध्यांचल विद्युत वितरण निगम के अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो और जवाबदेही तय की जाए।
अब चुप्पी नहीं, जवाबदेही चाहिए!
जानें जा रही हैं, लेकिन जिम्मेदारी कौन लेगा? इस पर सब मुंह में लड्डू दबाए बैठे हैं।