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द्वैत और अद्वैत: ब्रह्म-चेतना का परम रहस्य

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द्वैत और अद्वैत: ब्रह्म-चेतना का परम रहस्य

हरिंद कुमार सिंह प्रधान संपादक दैनिक इंडिया न्यूज़।वेद-वेदांत की उत्तुंग शिखाओं पर आरूढ़ होकर जब मानव मनीषा ने अस्तित्व के चरम सत्य को टटोलने का श्लाघनीय प्रयास किया, तब विचार-सरणि के दो ऐसे अक्षुण्ण कल्पवृक्ष प्रस्फुटित हुए जिन्होंने दर्शन की संपूर्ण दिशा को ही आमूल-चूल परिवर्तित कर दिया। इन्हें हम द्वैत और अद्वैत के नाम से अभिहित करते हैं, जो केवल शुष्क बौद्धिक विमर्श या तार्किक ऊहापोह की परिधियां नहीं हैं, अपितु उस जीवात्मा की व्याकुल आत्म-गवेषणा का प्रतिफल हैं जो अपनी आदि-उत्पत्ति को खोज निकालने के लिए युगों से अंतर्मन को मथ रही है। इस गोपनीय और निगूढ़ रहस्य के कपाट जैसे-जैसे उद्घाटित होते हैं, त्यों-त्यों मानवीय मेधा विस्मित होती जाती है और हृदय एक अनिर्वचनीय, अतींद्रिय आनंद के महासागर में आकंठ सराबोर होने लगता है।

सृष्टि के इस विराट और कौतुकपूर्ण रंगमंच पर जब हम आदि-दर्शन की प्रथम प्रांजल सीढ़ी पर पैर रखते हैं, तब हमारा सामना जगद्गुरु माध्वाचार्य द्वारा प्रतिपादित उस प्रखर, अकाट्य वैचारिक प्राचीर से होता है जिसे द्वैतवाद के रूप में प्रतिष्ठापित किया गया है। यह दर्शन अत्यंत सूक्ष्मता से निरूपित करता है कि 'जीव' और 'ईश्वर' दो सर्वथा भिन्न, स्वतंत्र और पृथक सत्ताएँ हैं, जहाँ जीव अणु के समान सर्वथा परतंत्र है और ईश्वर विभु के रूप में परम स्वतंत्र एवं नियंता है। इस विधा में भक्त और भगवान का संबंध उस चातक और मेघ जैसा है, जहाँ मिलन की तीव्र, उत्कट आकांक्षा तो है, परंतु दोनों का सर्वथा एकाकार हो जाना प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है। यह अलगाव कोई अभिशाप नहीं, बल्कि एक ऐसी अलौकिक लीला है जो जीवात्मा के अंतस में कारुणिक आर्द्रता और पूर्ण शरणागति का भाव जाग्रत करती है; किंतु विचारणीय यह है कि क्या यह विरह ही जीव का अंतिम गंतव्य है, या इस तड़प के नेपथ्य में कोई ऐसा विस्मयकारी सत्य छिपा है जो बुद्धि को जड़वत करने की सामर्थ्य रखता है?

इसी यक्ष प्रश्न की कोख से वेदांत के उस अगाध महासागर का प्राकट्य होता है, जहाँ आचार्य शंकर के अद्वैत की अतल गहराइयाँ मानव चेतना को झंकृत ही नहीं, अपितु पूर्णतः आंदोलित कर देती हैं। अद्वैत का वह सिंहनाद उद्घोष है कि इस चराचर जगत में एकमात्र ब्रह्म ही पारमार्थिक सत्य है, जगत प्रतीति मात्र (माया का विवर्त) है, और यह जीवात्मा कोई और नहीं, साक्षात ब्रह्म ही है। यहाँ द्वैत का कोई अस्तित्व ही नहीं, सब कुछ एक ही अखण्ड, अविनाशी सच्चिदानंद तत्व है, ठीक वैसे ही जैसे घड़े के भीतर का घट आकाश और बाहर का महाकाश वास्तव में एक ही हैं, जिन्हें केवल मिट्टी की एक क्षणभंगुर दीवार ने कृत्रिम रूप से पृथक कर रखा है। जब ज्ञान का प्रखर, जाज्वल्यमान सूर्य उदित होता है, तब 'मैं' और 'वह' का भेद समूल नष्ट हो जाता है और यह बोध कि "जिस ईश्वर को मैं बाह्य जगत में ढूँढ रहा था, वह मेरी ही चेतना का अंतरतम बिंदु है", साधक को एक अभूतपूर्व, अश्रुपूर्ण मौन और परम समरसता में विलीन कर देता है।

सतही तौर पर देखने वाले संकीर्ण विवेचक भले ही इसे एक अंतहीन दार्शनिक अंतर्विरोध मान लें, किंतु अंतर्दृष्टि रखने वाले साधक भली-भांति जानते हैं कि ये दोनों अवस्थाएँ एक ही आध्यात्मिक महायात्रा के दो अनिवार्य और क्रमिक सोपान हैं। द्वैत यदि उस परम यात्रा की प्रारंभिक कौतूहलमयी प्रेमाग्नि है, तो अद्वैत उस यात्रा की अंतिम परिणति और परम निर्वाण की महाशांति है, क्योंकि द्वैत के विरह के बिना अद्वैत की तड़प पैदा नहीं हो सकती। यह संपूर्ण ब्रह्मांड इसी महा-मिलन और अलगाव की रहस्यमयी लुका-छिपी का रंगमंच है, जहाँ सीमा में बंधा जीव द्वैत का रसास्वादन करता है और अपनी सीमाओं का विसर्जन करते ही अद्वैत के महासागर में तद्रूप हो जाता है। अब अंतस की अतल गहराइयों में यह प्रश्न स्वतः गूँजने लगता है कि आपकी अंतरात्मा इस क्षण किस अवस्था में स्पंदित हो रही है—क्या वह किसी आराध्य के चरणों में समर्पित होने को मचल रही है, या फिर अपने ही विराट, सार्वभौमिक स्वरूप को पहचानकर मौन हो जाने को आतुर है?

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