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**UPPCL का ₹3000 करोड़ का ‘सिक्योरिटी सिंडिकेट’! स्मार्ट मीटरों के नाम पर उपभोक्ताओं से दोहरी वसूली का महाघोटाला?*

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**UPPCL का ₹3000 करोड़ का ‘सिक्योरिटी सिंडिकेट’! स्मार्ट मीटरों के नाम पर उपभोक्ताओं से दोहरी वसूली का महाघोटाला?*

दैनिक इंडिया न्यूज़ , लखनऊ।उत्तर प्रदेश की विद्युत व्यवस्था इन दिनों अभूतपूर्व जनाक्रोश, प्रशासनिक अविश्वास और आर्थिक शोषण के गंभीर आरोपों के केंद्र में आ खड़ी हुई है। दैनिक इंडिया न्यूज़ की विशेष खोजी पड़ताल में ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिन्होंने प्रदेश की करोड़ों जनता के मन में यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि आखिर स्मार्ट मीटर योजना जनसुविधा का माध्यम है या फिर सुनियोजित आर्थिक दोहन का एक महाव्यापी तंत्र?

केंद्र सरकार की आरडीएसएस योजना के अंतर्गत प्रदेशभर में लगभग 85 लाख स्मार्ट मीटर लगाए गए, जिनमें से करीब 83 लाख मीटर प्रीपेड मोड में परिवर्तित किए गए। सबसे गंभीर तथ्य यह है कि लाखों पुराने पोस्टपेड उपभोक्ताओं के कनेक्शनों को बिना स्पष्ट सहमति, बिना पारदर्शी सूचना और बिना विधिक संवाद के प्रीपेड व्यवस्था में परिवर्तित कर दिया गया। अब मई 2026 में अचानक इन्हीं मीटरों को पुनः पोस्टपेड मोड में परिवर्तित करने की प्रक्रिया ने पूरे घटनाक्रम को संदेहों के घेरे में ला खड़ा किया है।

दोहरी वसूली का विस्फोटक आरोप — जनता से एक ही राशि दो बार क्यों?

 दस्तावेजों और उपभोक्ता शिकायतों के अनुसार सबसे बड़ा विवाद पुरानी सिक्योरिटी डिपॉजिट को लेकर उत्पन्न हुआ है। उपभोक्ताओं की वर्षों से जमा सुरक्षा धनराशि को पहले राजस्व प्रबंधन प्रणाली (RMS) के माध्यम से स्वतः प्रीपेड बैलेंस में समायोजित कर दिया गया, किंतु अब वही राशि चार किस्तों में पुनः उपभोक्ताओं के बिलों से वसूले जाने का आरोप लगाया जा रहा है।

यह पूरा घटनाक्रम प्रदेश के लाखों उपभोक्ताओं के लिए आर्थिक आघात और प्रशासनिक अविश्वास का कारण बन गया है। उपभोक्ताओं का प्रश्न है कि यदि सिक्योरिटी राशि पहले ही समायोजित हो चुकी थी, तो अब पुनः उसकी वसूली किस संवैधानिक अथवा नियामकीय आधार पर की जा रही है?

पहले कार्रवाई, बाद में नियम — क्या यही है प्रशासनिक पारदर्शिता?

प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2024-25 के दौरान बड़े पैमाने पर पोस्टपेड कनेक्शनों को प्रीपेड स्मार्ट मीटरों में बदला गया। इस प्रक्रिया के दौरान उपभोक्ताओं की पुरानी सिक्योरिटी राशि को RMS सिस्टम के माध्यम से बैकएंड स्तर पर स्वतः ट्रांसफर कर दिया गया।

इसके पश्चात 31 दिसंबर 2025 को UPERC द्वारा जारी Cost Data Book-2026 में ऐसे प्रावधान शामिल किए गए, जिनसे इस प्रक्रिया को रेट्रोस्पेक्टिव प्रभाव के साथ वैधता प्रदान की गई। यही तथ्य अब सबसे बड़े विवाद का केंद्र बन गया है, क्योंकि उपभोक्ता संगठनों और विशेषज्ञों का आरोप है कि पहले कार्रवाई की गई और बाद में नियम बनाकर उसे वैध ठहराने का प्रयास किया गया।

₹1500 करोड़ से ₹3000 करोड़ तक की राशि पर उठे प्रश्न

 इस पूरी प्रक्रिया से प्रभावित उपभोक्ताओं की संख्या लगभग 83 लाख बताई जा रही है, जिनमें अधिकांश घरेलू उपभोक्ता हैं। प्रति उपभोक्ता औसत सिक्योरिटी राशि ₹800 से ₹2000 के बीच आंकी गई है। इस आधार पर कुल प्रभावित धनराशि लगभग ₹1500 करोड़ से ₹3000 करोड़ तक बैठती है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अब तक इस पूरी राशि का कोई स्पष्ट और अधिकृत सार्वजनिक विवरण जारी नहीं किया गया है। यही अपारदर्शिता अब पूरे मामले को और अधिक गंभीर बना रही है।

मीटर जम्प, गलत बिलिंग और ग्रामीण विद्रोह — क्या जनता का धैर्य टूट चुका है?

प्रदेश के अनेक जिलों से लगातार ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि प्रीपेड स्मार्ट मीटरों में तकनीकी त्रुटियां, अचानक विद्युत कटौती, मीटर जम्प, असामान्य बिलिंग और बैलेंस समाप्ति जैसी समस्याएं आम हो चुकी हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में जनता का आक्रोश इस स्तर तक पहुंच गया कि अनेक स्थानों पर महिलाओं ने सड़कों पर उतरकर स्मार्ट मीटरों का विरोध किया, उन्हें उखाड़ा और तोड़ा भी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस मुद्दे पर समय रहते पारदर्शी समाधान नहीं निकाला गया, तो आगामी 2027 विधानसभा चुनावों में यह विषय सरकार और विद्युत प्रबंधन तंत्र के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौती सिद्ध हो सकता है।

प्रशासनिक जवाबदेही पर उठे प्रश्न

यह पूरा विवाद उस अवधि से जुड़ा बताया जा रहा है, जब UPPCL में तत्कालीन प्रबंध निदेशक पंकज कुमार (2002 बैच IAS) का कार्यकाल मार्च 2021 से अप्रैल 2026 तक प्रभावी रहा। आरोप लगाए जा रहे हैं कि इसी अवधि में यह नीति तीव्रता से लागू हुई और सिक्योरिटी ट्रांसफर का सबसे बड़ा हिस्सा निष्पादित किया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि करोड़ों रुपये की उपभोक्ता राशि बिना पर्याप्त पारदर्शिता के एक प्रणाली से दूसरी प्रणाली में स्थानांतरित हुई है, तो इसकी प्रशासनिक जवाबदेही भी सुनिश्चित होनी चाहिए। अन्यथा यह मामला केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों की व्यापक उपेक्षा और प्रशासनिक असंवेदनशीलता का प्रतीक माना जाएगा।

जनता पूछ रही है — सुविधा या वित्तीय शोषण?

आज उत्तर प्रदेश का उपभोक्ता यह जानना चाहता है कि आखिर स्मार्ट मीटर योजना जनता के हित में बनाई गई थी या फिर यह आम नागरिकों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने वाली व्यवस्था बन चुकी है? यदि सिक्योरिटी राशि पहले ही समायोजित की जा चुकी थी, तो पुनः वसूली क्यों? यदि योजना पारदर्शी थी, तो आंकड़े सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए? और यदि सब कुछ नियमानुसार था, तो प्रदेशभर में इतना व्यापक विरोध क्यों फूटा?

प्रदेश की जनता अब उत्तर चाहती है.

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