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एकता, संगठन और संस्कारों में निहित है हिंदू समाज की अक्षय शक्ति

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Dainik India News

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एकता, संगठन और संस्कारों में निहित है हिंदू समाज की अक्षय शक्ति

सृष्टि के आदि से सनातन की अविरल धारा—अनिल जी, क्षेत्र प्रचारक

दैनिक इंडिया न्यूज़,मधुबन, मऊ।हिंदू समाज की वास्तविक शक्ति न तो केवल संख्या में है और न ही केवल संसाधनों में—उसकी मूल सामर्थ्य एकता, संगठन और संस्कार के त्रिवेणी संगम में निहित है। जब समाज जागरूक होकर संगठित होता है, तभी राष्ट्र सुदृढ़, सुरक्षित और संप्रभु बनता है। युवाओं को अपनी सामाजिक और राष्ट्रीय भूमिका का बोध कराते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक (पूर्वी उत्तर प्रदेश) अनिल जी ने यह विचार शनिवार को मधुबन नगर पंचायत के पांती रोड स्थित गांधी मैदान में आयोजित हिंदू सम्मेलन में व्यक्त किए। उनका प्रत्येक वाक्य केवल संबोधन नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना का उद्घोष था।


अपने उद्बोधन में अनिल जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हिंदू समाज यदि सकारात्मक चिंतन के साथ संगठित होकर राष्ट्रनिर्माण में प्रवृत्त हो जाए, तो भारत को कोई शक्ति न तो चुनौती दे सकती है और न ही विचलित। उन्होंने स्मरण कराया कि इस देश को विश्व में जो गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ है, उसके मूल में संत परंपरा, आध्यात्मिक चेतना और सनातन संस्कार ही रहे हैं। यही संत परंपरा सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार करती आई है और यही परंपरा यह स्पष्ट करती है कि हिंदू धर्म, संस्कृति और जीवनदृष्टि क्या है।


उन्होंने कहा कि सनातन चिरपुरातन अवश्य है, किंतु जड़ नहीं—वह नित्य नूतन, सतत प्रवहमान और जीवनोपयोगी है। सनातन कोई संकीर्ण पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। वह एक अवधारणा है, एक वृत्ति है, जो मानव को ‘स्व’ से उठाकर ‘सर्व’ से जोड़ती है। सनातन का उद्घोष है—“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” और “वसुधैव कुटुम्बकम्”। यही सनातन की आत्मा है, यही उसकी व्यापकता है।
अनिल जी ने दो टूक कहा कि पूरे ब्रह्मांड में यदि कोई धर्म सर्वग्राही, सर्वव्यापी और सर्वकल्याणकारी है, तो वह सनातन धर्म है। शेष सब पंथ और संप्रदाय हैं। उन्होंने तथाकथित “सर्वधर्म-समभाव” की अवधारणा पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए कहा कि सनातन दृष्टि में धर्म एक ही है—जो सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण की कामना करता है। यही कारण है कि सनातन को केवल शब्दों या कर्मकांडों में बाँधना उसके साथ अन्याय है।


उन्होंने उद्घोष किया कि भारत माता की जय और वंदे मातरम् केवल नारे नहीं, बल्कि देशभक्ति की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। जो सनातन को मानता है, वह संविधान को भी मानता है, क्योंकि संविधान का मूल भी इसी भूमि की चेतना से उपजा है। किंतु इन सबसे ऊपर यदि कुछ है, तो वह है राष्ट्रधर्म। सनातन से बड़ा यदि कोई मूल्य है, तो वह राष्ट्र है—और यही भाव केवल हिंदू समाज में सहज रूप से विद्यमान है।


अनिल जी ने गर्वपूर्वक कहा कि हिंदू ही वह समाज है जो कहता है—“जिएँ देशहित, मरें देशहित।” हिंदू ही वह समाज है जो राष्ट्र के लिए तिल-तिल गलना जानता है, कंटकाकीर्ण पथ पर चलना जानता है। इतिहास साक्षी है कि सच्चा सनातनी धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए मिट जाना स्वीकार कर लेता है, किंतु सनातन को मिटने नहीं देता—चाहे दीवारों में चुन जाना पड़े, चाहे असंख्य यातनाएँ सहनी पड़ें।


आज की वैश्विक और राष्ट्रीय चुनौतियों की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा कि कुरीतियों और विसंगतियों से मुक्ति का एकमात्र मार्ग आध्यात्मिक जीवन-शैली है। सदियों तक भारत इसलिए अभेद्य रहा, क्योंकि यहाँ अध्यात्म प्रत्येक परिवार, प्रत्येक मन और प्रत्येक आचरण में प्रवाहित था। जब अध्यात्म जीवन से हटता है, तब विकृतियाँ जन्म लेती हैं।


उन्होंने सामाजिक समरसता के उदाहरण देते हुए कहा कि यदि भगवान श्रीराम ने अपने जीवन में समरसता की स्थापना न की होती, तो वे केवल राजा कहलाते, भगवान नहीं। यदि प्राचीन भारत में छुआछूत होती, तो राजा दशरथ और सुमंत एक ही गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त न करते। यह भारत की समरस परंपरा का सजीव प्रमाण है।


प्रकृति संरक्षण की चर्चा करते हुए उन्होंने माता सीता और लव-कुश का उदाहरण दिया—जहाँ वृक्षों को भी जीव मानकर उनका संरक्षण किया गया। उन्होंने मातृशक्ति से जल और पर्यावरण संरक्षण का आह्वान किया, यह कहते हुए कि जैसे हम बच्चों की चिंता करते हैं, वैसे ही वृक्षों की भी करनी होगी।


स्व-जागरण की शक्ति को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि जब हनुमान का ‘स्व’ जागा, तो समुद्र लाँघा गया; जब अंगद का ‘स्व’ जागा, तो लंका थर्रा उठी। और जब 6 दिसंबर 1992 को हिंदू समाज का स्व जागा, तो कलंकित ढाँचा ध्वस्त हुआ और विश्व ने हिंदू समाज का पराक्रम देखा।


अंत में उन्होंने नागरिक कर्तव्यों पर बल देते हुए कहा कि अधिकारों से पहले कर्तव्यों की चर्चा होगी, तभी भारत पुनः विश्वगुरु बनेगा। अपने आचरण से हमें सिद्ध करना होगा कि भारत केवल भूखंड नहीं, बल्कि एक जीवंत राष्ट्रचेतना है।


इस अवसर पर मातृशक्ति का प्रतिनिधित्व करते हुए प्रख्यात कथावाचिका मानस मंदाकिनी डॉ. रागिनी मिश्रा ने लव जिहाद की घटनाओं पर चिंता व्यक्त की और परिवारों से संस्कारों की पुनर्स्थापना का आह्वान किया। वहीं खाकी दास बाबा कुटी के पूज्य महंत रामकिशोर दास जी ने कहा कि हिंदू समाज अब अपनी ऐतिहासिक भूलों से सीख लेकर एकजुट हो रहा है और भारत का भविष्य उज्ज्वल है।


सम्मेलन की अध्यक्षता वरिष्ठ अधिवक्ता विमल श्रीवास्तव ने की तथा संचालन अमित गुप्ता ने किया। कार्यक्रम में सियाराम बरनवाल, सुभाष चंद्र मद्धेशिया, रामचंद्र गुप्ता, हरिओम जी, विपिन जायसवाल, रतन गुप्ता, प्रेमचंद वर्मा, राजकुमार, अनिल, विजयशंकर, दीपक सिंह,सोनू सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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