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अवध से मालवा तक… एक योद्धा की वह लड़ाई जिसने भोजशाला को फिर बना दिया राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र

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अवध से मालवा तक… एक योद्धा की वह लड़ाई जिसने भोजशाला को फिर बना दिया राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र
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अवध से उठा एक नाम, जिसने भोजशाला की दीवारों में दबे इतिहास को अदालत में कर दिया जागृत

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तिलक और शिखा पर सवाल उठाने वालों को अदालत से मिला जवाब… कुलदीप तिवारी की लड़ाई ने भोजशाला को बना दिया राष्ट्रीय मुद्दा

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ज्ञानवापी के बाद भोजशाला… अदालतों में लगातार गूंज रही अवध के एक सनातनी योद्धा की दस्तक

हरिंद्र सिंह , दैनिक इंडिया न्यूज़ इंदौर।अवध की धरती सदियों से केवल संस्कृति और सभ्यता की भूमि नहीं रही, बल्कि जब-जब अन्याय बढ़ा, इसी मिट्टी ने ऐसे योद्धाओं को जन्म दिया जिन्होंने अपने अस्तित्व से इतिहास की दिशा बदल दी। लखनऊ की उसी पावन भूमि पर एक ऐसा युवक जन्म लेता है, जो बचपन से ही मंदिरों पर कब्जे, सनातन प्रतीकों के अपमान और इतिहास के साथ हुई छेड़छाड़ को देखकर भीतर ही भीतर विचलित होने लगता है। उसके मन में एक ही प्रश्न लगातार उठता था — क्या आने वाली पीढ़ियां अपने वास्तविक इतिहास को जान भी पाएंगी या नहीं? यही प्रश्न धीरे-धीरे उसके जीवन का संकल्प बन गया। उस युवक का नाम है — कुलदीप तिवारी।

कुलदीप तिवारी उस समय लखनऊ के प्रतिष्ठित सिटी मोंटेसरी स्कूल में शिक्षक के रूप में कार्य कर रहे थे। सामान्य जीवन था, सम्मानजनक नौकरी थी, लेकिन भीतर एक वैचारिक ज्वालामुखी लगातार धधक रहा था। अवध की धरती से उनका लगाव केवल भावनात्मक नहीं था, बल्कि वह इसे भारत की सांस्कृतिक चेतना का केंद्र मानते थे। इसी बीच उनकी नजर मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला प्रकरण पर पड़ी। एक ऐसा स्थल, जिसे हिंदू पक्ष मां वाग्देवी का प्राचीन मंदिर मानता था, जबकि मुस्लिम पक्ष उसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा। वर्षों से विवाद चल रहा था, लेकिन इतिहास की धूल के नीचे दबे सत्य को सामने लाने का साहस बहुत कम लोग कर पा रहे थे। कुलदीप ने यहीं से अपनी लड़ाई प्रारंभ की।

वर्ष 2017 में कुलदीप तिवारी ने “जन उद्घोष सेवा संस्थान” के माध्यम से सामाजिक और सनातन विषयों पर सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी थी। संस्था के संचालन के दौरान वह केवल सामाजिक कार्यकर्ता नहीं रहे, बल्कि सनातन मुद्दों पर एक सजग प्रहरी के रूप में पहचान बनाने लगे। मंदिरों, धार्मिक स्थलों और सनातन परंपराओं से जुड़े विषयों पर उनकी गहरी पकड़ और विधिक जानकारी ने उन्हें अलग पहचान दिलानी शुरू कर दी। धीरे-धीरे लोग उन्हें केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि सनातन हितों के लिए संघर्ष करने वाले प्रहरी के रूप में देखने लगे थे।

19 फरवरी 2021 को जब कुलदीप तिवारी ने वाराणसी में ज्ञानवापी प्रकरण को लेकर कानूनी लड़ाई की शुरुआत की, तभी से उन्होंने यह तय कर लिया था कि भारत की सांस्कृतिक धरोहरों से जुड़े मामलों को केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि विधिक और संवैधानिक आधार पर भी मजबूती से उठाया जाएगा। ज्ञानवापी प्रकरण की कार्यवाही के बीच ही जुलाई 2021 से भोजशाला मामले की तैयारी प्रारंभ कर दी गई। यह तैयारी केवल दस्तावेज जुटाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि ऐतिहासिक अभिलेखों, ASI रिपोर्ट, स्थापत्य संरचनाओं, प्राचीन विवरणों और पूर्व न्यायिक आदेशों के गहन अध्ययन का एक विस्तृत अभियान बन चुकी थी।

इतिहासकारों के अनुसार 11वीं शताब्दी में परमार वंश के महान शासक राजा भोज ने धार नगरी को विद्या, संस्कृति और सनातन ज्ञान का प्रमुख केंद्र बनाने का संकल्प लिया था। माना जाता है कि लगभग 1034 ईस्वी के आसपास राजा भोज ने भोजशाला का निर्माण करवाया, जहां मां वाग्देवी अर्थात मां सरस्वती की आराधना के साथ संस्कृत, वेद, ज्योतिष, व्याकरण और दर्शन की शिक्षा दी जाती थी। यह केवल एक मंदिर नहीं था, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा का जीवंत विश्वविद्यालय माना जाता था। कहा जाता है कि देशभर से विद्वान यहां शास्त्रार्थ करने आते थे। यही कारण है कि हिंदू पक्ष लगातार यह दावा करता रहा कि भोजशाला केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन बौद्धिक और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है, जिसे पुनः उसी गौरव के साथ स्थापित किया जाना चाहिए।

13 नवंबर 2021 को कुलदीप तिवारी अपने सहयोगियों और अधिवक्ताओं की टीम के साथ स्वयं धार पहुंचे। वहां उन्होंने भोजशाला परिसर का निरीक्षण किया, संरचनात्मक स्थिति का अध्ययन किया और उपलब्ध पुरातात्विक संकेतों का अवलोकन किया। बताया जाता है कि इसी निरीक्षण के दौरान कई ऐसे बिंदु सामने आए, जिन्होंने आगे की कानूनी रणनीति को मजबूत आधार प्रदान किया। टीम ने मंदिर शैली की नक्काशी, स्तंभों की संरचना, शिलालेखों और स्थापत्य स्वरूप का अध्ययन कर विस्तृत विधिक तैयारी प्रारंभ की।

लगातार कई महीनों तक चली तैयारी के बाद 2 मई 2022 को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में जनहित याचिका (PIL) क्रमांक 10484/2022 प्रस्तुत की गई। याचिका में न्यायालय से प्रार्थना की गई कि भोजशाला परिसर का वैज्ञानिक एवं पुरातात्विक सर्वे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से कराया जाए, ताकि विवादित स्थल की वास्तविक ऐतिहासिक स्थिति न्यायालय के समक्ष स्पष्ट हो सके। इसके तुरंत बाद इसी प्रकरण से संबंधित एक अन्य याचिका क्रमांक 10497/2022 भी कुलदीप तिवारी की टीम द्वारा प्रस्तुत की गई, जिसने मामले को और अधिक गंभीर कानूनी विमर्श के केंद्र में ला दिया।

याचिका में यह प्रमुख आधार रखा गया कि भोजशाला परिसर में मंदिर शैली के स्तंभ, मूर्तिकला, देवी-देवताओं से संबंधित आकृतियां तथा संस्कृत शिलालेख मौजूद हैं, जो यह संकेत देते हैं कि उक्त संरचना मूलतः हिंदू धार्मिक एवं शैक्षणिक केंद्र रही है। याचिकाकर्ता पक्ष ने न्यायालय के समक्ष यह भी निवेदन किया कि विवादित परिसर केवल धार्मिक महत्व का विषय नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक अस्मिता का प्रश्न है। न्यायालय से यह भी आग्रह किया गया कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण के माध्यम से तथ्यों को अभिलेख पर लाया जाए, जिससे न्यायिक निष्कर्ष साक्ष्यों पर आधारित हो सके।

धीरे-धीरे कुलदीप तिवारी ने भोजशाला से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेज, पुरातात्विक साक्ष्य और न्यायालय में दायर पुराने अभिलेखों का अध्ययन और अधिक गहराई से शुरू किया। हिंदू पक्ष का दावा था कि यह स्थान राजा भोज द्वारा स्थापित संस्कृत विद्यापीठ और मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर था। ASI की पूर्व रिपोर्टों में भी मंदिर शैली की संरचनाओं का उल्लेख मिलता रहा। हिंदू पक्ष ने न्यायालय में यह तर्क रखा कि यदि निष्पक्ष वैज्ञानिक सर्वे कराया जाता है तो वास्तविकता स्वतः स्पष्ट हो जाएगी।

लेकिन जैसे-जैसे कुलदीप तिवारी इस लड़ाई में आगे बढ़ते गए, वैसे-वैसे उनके निजी जीवन में तूफान खड़ा होता गया। बताया जाता है कि जब उनके विद्यालय प्रशासन को उनके हिंदुत्व संबंधी सक्रियता की जानकारी हुई तो उन पर अप्रत्यक्ष दबाव बढ़ने लगा। आरोप यह भी लगे कि उनके तिलक लगाने, यज्ञोपवीत धारण करने और शिखा रखने को लेकर आपत्तियां उठाई गईं। अंततः परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उन्हें विद्यालय से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। शायद कुछ लोगों को लगा था कि आर्थिक रूप से कमजोर होने के बाद यह युवक टूट जाएगा, मालवा जाकर मुकदमे नहीं लड़ पाएगा, और ज्ञानवापी से लेकर मथुरा तक की लड़ाई स्वतः धीमी पड़ जाएगी। लेकिन यहीं से कहानी ने नया मोड़ लिया।

विद्यालय से बाहर निकलने के बाद कुलदीप तिवारी ने स्वयं को टूटने नहीं दिया। कानून और संवैधानिक विषयों की उनकी गहरी समझ ने उन्हें विधिक जगत में नई पहचान दिलानी शुरू कर दी। उन्होंने अदालतों में सक्रिय भूमिका निभाते हुए सनातन से जुड़े मुद्दों को कानूनी आधार पर मजबूती से उठाना शुरू किया। यही वह समय था जब वह केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता नहीं रहे, बल्कि सनातनियों के हृदय में स्थान बनाने वाले विधिक योद्धा के रूप में उभरने लगे। समर्थकों का कहना है कि संघर्षों ने उन्हें कमजोर नहीं किया, बल्कि सनातन का और अधिक सजग प्रहरी बना दिया।

कुलदीप तिवारी ने प्रण लिया कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, वह अपने पूर्वजों की सांस्कृतिक धरोहरों के लिए संघर्ष जारी रखेंगे। एक ओर अवध की धरती पर ज्ञानवापी का संघर्ष था, दूसरी ओर मालवा प्रांत में भोजशाला का प्रकरण। आर्थिक संकट, सामाजिक दबाव और लगातार विरोध के बावजूद उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। धार की अदालतों से लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट तक, वह लगातार सक्रिय रहे। हर सुनवाई के साथ उनकी उम्मीद और मजबूत होती गई।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष ने कई महत्वपूर्ण विधिक और ऐतिहासिक बिंदु उठाए। याचिका में कहा गया कि भोजशाला परिसर में मंदिर शैली के स्तंभ, मूर्तिकला और संस्कृत अभिलेख मौजूद हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता पक्ष ने यह भी दलील दी कि वैज्ञानिक सर्वे न्यायहित में आवश्यक है। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष ने यथास्थिति बनाए रखने तथा धार्मिक परंपराओं के संरक्षण की दलील दी। न्यायालय के समक्ष मूल प्रश्न यह था कि क्या विवादित स्थल की वास्तविक प्रकृति निर्धारित करने हेतु वैज्ञानिक एवं पुरातात्विक जांच आवश्यक है या नहीं।

यहीं पर हाईकोर्ट ने वह कदम उठाया जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI को वैज्ञानिक सर्वे का आदेश दिया। जैसे ही सर्वे शुरू हुआ, पूरे देश की नजरें धार पर टिक गईं। सर्वे के दौरान परिसर में कई ऐसे अवशेष मिलने की चर्चा हुई, जिन्हें हिंदू पक्ष अपनी दलीलों का आधार मानता रहा था। स्तंभों की नक्काशी, मंदिर शैली की संरचनाएं और संस्कृत शिलालेखों ने विवाद को और अधिक गंभीर बना दिया। हर नई जानकारी के साथ कुलदीप तिवारी के मन में विश्वास बढ़ता गया कि वह जिस राह पर चल रहे हैं, वह केवल संघर्ष नहीं बल्कि इतिहास की पुनर्स्थापना की लड़ाई है।

समय बीतता गया और सुनवाई निर्णायक मोड़ पर पहुंचने लगी। अदालत ने ASI रिपोर्ट, ऐतिहासिक अभिलेखों और दोनों पक्षों की दलीलों को गंभीरता से सुना। हिंदू पक्ष का कहना था कि यह केवल जमीन का विवाद नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति का प्रश्न है। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष लगातार यथास्थिति बनाए रखने की मांग करता रहा। लेकिन जैसे-जैसे न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी, वैसे-वैसे यह स्पष्ट होने लगा कि मामला केवल आस्था का नहीं, बल्कि इतिहास और पुरातत्व के साक्ष्यों का भी है।

फिर वह क्षण आया, जिसका इंतजार वर्षों से किया जा रहा था। अदालत के फैसले ने पूरे देश में नई बहस छेड़ दी। हिंदू संगठनों ने इसे सनातन संस्कृति की ऐतिहासिक जीत बताया। धार की गलियों से लेकर लखनऊ की सड़कों तक उत्साह का वातावरण दिखाई दिया। जिन लोगों को लगता था कि आर्थिक संकट कुलदीप तिवारी को रोक देगा, उन्हें यह समझ आ गया कि विचारधारा से प्रेरित संघर्ष केवल साधनों से नहीं, बल्कि संकल्प से जीते जाते हैं।

आज कुलदीप तिवारी का नाम केवल एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि उस संघर्ष के प्रतीक के रूप में लिया जा रहा है जिसने अवध से मालवा तक सनातन चेतना की एक नई लहर पैदा की। उनके समर्थकों का कहना है कि यह जीत केवल भोजशाला की नहीं, बल्कि उन सभी सांस्कृतिक प्रतीकों की जीत है जिन्हें इतिहास के धुंधलके में दबाने का प्रयास किया गया।

लखनऊ की धरती आज अपने उस पुत्र पर गर्व कर रही है जिसने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद संघर्ष नहीं छोड़ा और यह साबित कर दिया कि यदि संकल्प अटल हो तो इतिहास भी बदल सकता है।

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