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मध्यांचल मुख्यालय में आग लगे तो बुझाएगा कौन ?

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Dainik India News

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मध्यांचल मुख्यालय में आग लगे तो  बुझाएगा कौन ?

मुख्यमंत्री आवास से चंद कदम दूर अग्निशमन सुरक्षा ‘गुल’, नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई करने वाला विभाग खुद सवालों के घेरे में

दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ। मुख्यमंत्री आवास और विधानसभा से कुछ ही दूरी पर गोखले मार्ग स्थित मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (4-ए) का मुख्यालय आज उत्तर प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण विद्युत प्रशासनिक केंद्रों में से एक है। कभी यह भवन ट्रांजिट हॉस्टल हुआ करता था, जहां तबादले पर आए अधिकारी और शक्ति भवन में कार्य कराने वाले कर्मचारी ठहरते थे। बाद में यहां मुख्य अभियंता वितरण लेसा का कार्यालय बना और फिर धीरे-धीरे प्रबंध निदेशक, निदेशक तथा पूरा प्रशासनिक तंत्र यहीं स्थापित हो गया। आज मध्यांचल के 19 जिलों की विद्युत व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण रिकॉर्ड, फाइलें और प्रशासनिक निर्णय इसी भवन से संचालित होते हैं।

लेकिन सवाल यह है कि यदि इस भवन में आग लग जाए तो उसे बुझाएगा कौन?

करीब 30-35 वर्ष पुरानी इस तीन मंजिला इमारत की स्थिति देखकर सुरक्षा मानकों पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। आरोप है कि भवन में आधुनिक अग्निशमन व्यवस्था का लगभग अभाव है। न स्प्रिंकलर सिस्टम, न फायर हाइड्रेंट, न धुआं संसूचक प्रणाली और न ही प्रशिक्षित अग्निशमन कर्मियों की समुचित व्यवस्था। जहां-जहां नया निर्माण अथवा नवीनीकरण हुआ है, वहां भी अग्निशमन सुरक्षा के मानकों का पालन दिखाई नहीं देता। यदि किसी आकस्मिक आगजनी की घटना में कर्मचारी फंस जाएं तो सुरक्षित निकासी का रास्ता क्या होगा, यह स्वयं एक बड़ा प्रश्न है।

सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिस ऊर्जा विभाग के अधिकारी आम नागरिकों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और संस्थानों को सुरक्षा मानकों के नाम पर नोटिस भेजने, बिजली काटने और भारी जुर्माना लगाने में देर नहीं करते, वही विभाग अपने ही मुख्यालय और अधीनस्थ कार्यालयों में सुरक्षा मानकों को लेकर कठघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है। आम नागरिक नया विद्युत कनेक्शन लेने जाए तो उससे विद्युत सुरक्षा से जुड़े तमाम दस्तावेज मांगे जाते हैं, निरीक्षण किए जाते हैं, अनापत्ति प्रमाण-पत्रों की जांच होती है, लेकिन विभाग के अपने भवनों और बिजलीघरों पर वही नियम कितनी गंभीरता से लागू किए जा रहे हैं, यह सवाल अब उठने लगा है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिल्ली के मालवीय नगर होटल अग्निकांड में 21 लोगों की मृत्यु के बाद प्रदेशभर के सरकारी भवनों में अग्निशमन सुरक्षा की व्यापक जांच और अनुपालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे। लेकिन आरोप है कि ऊर्जा विभाग ने इन निर्देशों को गंभीरता से नहीं लिया। मध्यांचल मुख्यालय सहित विभाग के अनेक कार्यालयों में आज भी अग्निशमन सुरक्षा व्यवस्था सवालों के घेरे में है। यदि यह स्थिति सही है तो क्या इसे मुख्यमंत्री के निर्देशों की खुली अवहेलना नहीं माना जाना चाहिए?

सूत्रों के अनुसार मध्यांचल के 19 जिलों में संचालित अनेक कार्यालयों की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है। लखनऊ मध्य, पूर्व, पश्चिम, ट्रांसगोमती, जानकीपुरम, 1912 हुसैनगंज, गोमती नगर, अमौसी, चौक स्थित कार्यालय और गोमती नगर की स्काडा बिल्डिंग सहित कई परिसरों में अग्निशमन सुरक्षा को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए जा रहे हैं। घनी आबादी वाले क्षेत्रों में बने अनेक बिजलीघरों में बड़े-बड़े ट्रांसफार्मर तो स्थापित हैं, लेकिन आग से निपटने के लिए बुनियादी संसाधनों तक की उपलब्धता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

एक और बड़ा प्रश्न विभाग के सिविल (जनपद) तंत्र को लेकर उठ रहा है। बताया जा रहा है कि मुख्य अभियंता (जनपद) का पद लंबे समय से रिक्त है और अधीक्षण अभियंता को अतिरिक्त कार्यभार देकर व्यवस्था चलाई जा रही है। ऐसे में भवनों की संरचनात्मक सुरक्षा, रखरखाव और अग्निशमन मानकों की निगरानी कैसे हो रही है, यह भी जांच का विषय बनता जा रहा है।

मध्यांचल विद्युत वितरण निगम की प्रबंध निदेशक आईएएस रिया केजरीवाल हैं। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या विभागीय मुख्यालय और अधीनस्थ परिसरों की सुरक्षा व्यवस्था की नियमित समीक्षा की जा रही है? यदि हां, तो फिर अग्निशमन सुरक्षा से जुड़े इतने गंभीर प्रश्न लगातार क्यों उठ रहे हैं?

विद्युत सुरक्षा निदेशालय की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। जब किसी नए बिजलीघर का निर्माण होता है तो क्या नियमित रूप से फायर एनओसी ली जाती है? क्या कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र जारी होने से पहले अग्निशमन सुरक्षा का परीक्षण किया जाता है? यदि किया जाता है तो फिर विभाग के अनेक परिसरों में सुरक्षा मानकों की कमी की शिकायतें क्यों सामने आ रही हैं?

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि किसी निजी संस्थान, होटल, अस्पताल या व्यावसायिक प्रतिष्ठान में सुरक्षा मानकों की अनदेखी मिल जाए तो ऊर्जा विभाग बिजली काटने और दंडात्मक कार्रवाई करने में पीछे नहीं रहता। फिर क्या यही मानक विभाग के अपने मुख्यालय और कार्यालयों पर भी समान रूप से लागू किए जा रहे हैं? यदि नहीं, तो क्यों?

क्या गोखले मार्ग स्थित इस मुख्यालय का स्वीकृत नक्शा, फायर एनओसी और वर्तमान सुरक्षा ऑडिट सार्वजनिक किया जाएगा? क्या मुख्यमंत्री के निर्देशों के अनुरूप इसकी स्वतंत्र जांच कराई जाएगी? क्या जिन मानकों का पालन कराने की जिम्मेदारी विभाग दूसरों पर डालता है, उन्हीं मानकों पर उसके अपने कार्यालय भी खरे उतरते हैं?

ये प्रश्न केवल किसी भवन के नहीं हैं। यह उन कर्मचारियों, अभियंताओं और आम नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े प्रश्न हैं जो प्रतिदिन इन परिसरों में आते-जाते हैं। ऐसे में आवश्यकता है कि ऊर्जा विभाग स्वयं जवाब दे कि आखिर उसके अपने घर की सुरक्षा व्यवस्था कितनी सुरक्षित है।

अविजित आनंद के साथ हरिंद्र कुमार सिंह,दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ

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