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कहीं श्राद्ध पक्ष में भी आप अपने पितरों के आशीर्वाद से वंचित तो नहीं हो रहे?

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Dainik India News

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कहीं श्राद्ध पक्ष में भी आप अपने पितरों के आशीर्वाद से वंचित तो नहीं हो रहे?

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ: राष्ट्रीय सनातन महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह ने पितृपक्ष के महत्व पर समस्त राष्ट्र को संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जब आपकी कमाई में बरकत कम हो जाए, सावधानी के बावजूद समस्याएं आती रहें, और परिवार में सुख-शांति की जगह कलह का वातावरण बना रहे, तब समझ लेना चाहिए कि आपके पितर आपके परिवार से असंतुष्ट चल रहे हैं।

ऐसी स्थिति का सामना उन लोगों को करना पड़ता है, जो अपने पितरों को अस्तित्वहीन समझते हैं और उन्हें श्रद्धा से याद नहीं करते। पितृपक्ष के समय में भी वे अपने पितरों के प्रति श्रद्धा नहीं जताते। सौभाग्य से यह समय पितृपक्ष का ही चल रहा है, अगले 15 दिन आपके लिए अपने पितरों को संतुष्ट करने और उनका आशीर्वाद पाने का सुनहरा अवसर है। इसलिए इस समय का लाभ उठाएं और अपने पितरों को प्रसन्न करें।

पितृपक्ष का महत्व:

वर्ष के भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक के 16 दिनों को पितृपक्ष कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति यथा शक्ति और श्रद्धा से श्राद्ध कर्म करता है, उसे अपने पितरों का आशीर्वाद मिलता है। इससे परिवार में सुख-शांति और समृद्धि का वातावरण बनता है, वंश वृद्धि होती है और जीवन के संकट दूर होते हैं।

पितरों का आशीर्वाद:

श्राद्ध मीमांसा के अनुसार, हमारे पितर श्राद्ध पक्ष में अपने घर के दरवाजे पर आकर परिवार को आशीर्वाद देते हैं। इसलिए, श्राद्ध और तर्पण का विधि-विधान अवश्य पूरा करना चाहिए। उपनिषदों में भी देवता और पितरों के प्रति श्रद्धा बनाए रखने और दान-पुण्य करने की प्रेरणा दी गई है।

विभिन्न पुराणों और शास्त्रों में पितरों के श्राद्ध-तर्पण का विधान बताया गया है। योगवाशिष्ठ के अनुसार, पिंडदान से पितर तृप्त होते हैं और उन्हें संतुष्टि मिलती है। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो पितर असंतुष्ट होकर भटकते हैं, जिससे उनके वंशजों को कष्टों का सामना करना पड़ता है।

श्राद्ध तर्पण का महत्त्व:

पितृपक्ष में पिंडदान, तर्पण, दान, सेवा, और गौसेवा का विशेष महत्व है। श्राद्ध कर्म के साथ अन्नदान, गरीबों की सेवा, और गौशाला में दान करना पितरों को तृप्त करता है। इसके अलावा, श्राद्ध के दिनों में गीता या पुराणों का पाठ करना भी लाभकारी माना जाता है।

श्राद्ध की विधि:

पितृकुल और मातृकुल की तीन पीढ़ियों के लिए श्राद्ध करना आवश्यक माना गया है। जो लोग श्राद्ध नहीं कर पाते, उन्हें कम से कम तिल मिश्रित जल से तर्पण अवश्य करना चाहिए। इससे पितर संतुष्ट होते हैं और अपने वंशजों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

इसलिए इस पितृपक्ष में अपने पितरों के लिए श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध-तर्पण करें और उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।

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