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13,388 मेगावाट क्षमता बढ़ गई 31,804 मेगावाट रिकॉर्ड बन गया,फिर भी जनता त्राहि-त्राहि क्यों कर रही है?

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Dainik India News

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13,388 मेगावाट क्षमता बढ़ गई 31,804 मेगावाट रिकॉर्ड बन गया,फिर भी जनता त्राहि-त्राहि क्यों कर रही है?

पीपीटी की चकाचौंध, फोटोशूट की नौटंकी और निजीकरण की पटकथा — संविदाकर्मियों की लाशों पर खड़ा किया जा रहा विद्युत तंत्र!

अविजित आनंद, दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ | 25 मई 2026,उत्तर प्रदेश सरकार और ऊर्जा विभाग इन दिनों उपलब्धियों के भव्य दावे कर रहे हैं। ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा यह कह रहे हैं कि प्रदेश ने 31,804 मेगावाट की रिकॉर्ड पीक डिमांड पूरी कर देश में प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में 22 से 22.5 घंटे बिजली आपूर्ति के दावे किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री के समक्ष चमचमाती पीपीटी प्रस्तुतियां दी जा रही हैं, रात्रिकालीन निरीक्षणों के नाम पर हेलमेट पहनकर फोटोशूट किए जा रहे हैं और यह संदेश देने का प्रयास हो रहा है कि प्रदेश का ऊर्जा तंत्र अभूतपूर्व सफलता के दौर से गुजर रहा है।

लेकिन धरातल की वास्तविकता इन दावों से बिल्कुल विपरीत दिखाई दे रही है। जनता बिजली कटौती, ट्रिपिंग, फाल्ट, जले ट्रांसफार्मरों और घंटों बाधित आपूर्ति से त्राहि-त्राहि कर रही है। सरकार 13,388 मेगावाट क्षमता वृद्धि का दावा कर रही है, जबकि मई 2026 में ही कई बड़े ताप विद्युत संयंत्र लंबे समय तक बंद पड़े रहे—

भटपुर — 660 MW — 18 दिन बंद तांडी — 660 MW — 11 दिन बंद ओबरा-सी — 660 MW — 8 दिन बंद अनपरा-डी — 500 MW — 6.5 दिन बंद जवाहरपुर — 660 MW — 4 दिन बंद लैको — 600 MW — 3 दिन बंद परिच्छा — 250 MW — 3 दिन बंद खुर्जा — 660 MW — 1 दिन बंद

इसके बावजूद विभागीय शीर्ष अधिकारी दावा कर रहे हैं कि “सब कुछ नियंत्रण में है।” यही तथाकथित “बढ़का बाबुओं” की पीपीटी आधारित कार्यशैली का वास्तविक चेहरा है, जिसमें आंकड़े चमकते हैं लेकिन व्यवस्था दम तोड़ती दिखाई देती है।

मध्यांचल डिस्कॉम की प्रबंध निदेशक श्रीमती रिया केजरीवाल (IAS) सहित यूपीपीसीएल के शीर्ष अधिकारी मुख्यमंत्री के सामने आकर्षक ग्राफ और डिजिटल प्रस्तुतियां पेश कर रहे हैं। आरोप यह भी है कि तकनीकी विशेषज्ञ अभियंताओं की जगह प्रशासनिक अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाकर पूरे ऊर्जा तंत्र को गैर-तकनीकी हाथों में सौंप दिया गया है।

सबसे पीड़ादायक पक्ष यह है कि संविदाकर्मी अपनी जान जोखिम में डालकर बिजली आपूर्ति बनाए रखने में जुटे हैं। लाइन सुधार के दौरान मौतें हो रही हैं, ट्रांसफार्मर विस्फोटों में कर्मचारी झुलस रहे हैं, भीषण गर्मी में लगातार काम करते-करते संविदाकर्मियों की जान जा रही है, लेकिन उच्चाधिकारी निरीक्षण और फोटोशूट में व्यस्त दिखाई देते हैं।

स्थिति यह है कि किसी आईएएस अधिकारी के उपकेंद्र दौरे से पहले ही पूरे विभाग को सूचना पहुंच जाती है कि “आज यहां निरीक्षण और फोटोशूट होना है।” कुछ घंटों के लिए व्यवस्थाएं दुरुस्त की जाती हैं, कैमरे चमकते हैं और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है।

उधर संविदाकर्मियों को व्यवस्थित तरीके से हटाया जा रहा है। जोनों की संख्या बढ़ा दी गई, मुख्य अभियंताओं के पद बढ़ा दिए गए, लेकिन फील्ड में काम करने वाले कर्मचारियों की भारी कमी बनी हुई है। टीजी-2 कर्मचारियों को दूसरे जिलों से बुलाकर लखनऊ और मध्यांचल के क्षेत्रों में लगाया जा रहा है। क्लर्कीय स्टाफ, अभियंता और तकनीकी कर्मचारियों के हजारों पद रिक्त पड़े हैं, लेकिन नई भर्ती का कोई ठोस निर्णय अब तक सामने नहीं आया।

अब सवाल उठता है कि यदि संविदाकर्मी नहीं होंगे तो फीडर कौन सुधारेगा? लाइनें कौन ठीक करेगा? ट्रांसफार्मर कौन बदलेगा? क्या मुख्य अभियंता स्वयं सीढ़ी पर चढ़ेंगे और प्रबंध निदेशिका नीचे खड़े होकर टॉर्च दिखाएंगी?

आरडीएसएस योजना के अंतर्गत 21,780 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का दावा किया गया है। लेकिन इतने बड़े बजट के बाद भी बिजली व्यवस्था बदहाल क्यों है? खरीद प्रक्रिया, गुणवत्ता, बैंक गारंटी और टेंडर व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यदि सब कुछ पारदर्शी है तो उच्चस्तरीय जांच से परहेज क्यों किया जा रहा है?

ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का आरोप है कि यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि एक सुनियोजित रणनीति है। संविदाकर्मियों को हटाकर, तकनीकी ढांचे को कमजोर कर और जनता को बिजली संकट से त्रस्त कर दक्षिणांचल और पूर्वांचल डिस्कॉम के निजीकरण की जमीन तैयार की जा रही है।

रणनीति स्पष्ट बताई जा रही है— पहले सरकारी व्यवस्था को कमजोर करो, फिर जनता को परेशान होने दो और अंत में यह घोषित कर दो कि “सरकारी तंत्र विफल हो चुका है, अब निजीकरण ही अंतिम विकल्प है।”

जब रिकॉर्ड उत्पादन और आपूर्ति के दावे किए जा रहे हों, लेकिन धरातल पर कर्मचारी मर रहे हों, नई भर्तियां बंद हों, उपकेंद्र चरमरा रहे हों और भ्रष्टाचार चरम पर हो— तब यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि पूरे ऊर्जा तंत्र को योजनाबद्ध तरीके से खोखला करने का संकेत माना जा रहा है।

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