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821 करोड़ की इमारत, नौ साल का सन्नाटा और अब निजी चाबी—JPNIC पर सवालों की वह श्रृंखला जिसका जवाब जनता तलाश रही है

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Dainik India News

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821 करोड़ की इमारत, नौ साल का सन्नाटा और अब निजी चाबी—JPNIC पर सवालों की वह श्रृंखला जिसका जवाब जनता तलाश रही है

जनता के पैसे से बनी बहुमंजिला परियोजना अब वृंदावन बॉटलर्स और रॉकवुड होटल्स के कंसोर्टियम के संचालन में; सरकार का दावा—संपत्ति नहीं बेची, विपक्ष का सवाल—फिर 30 साल का अधिकार निजी हाथों में क्यों?

 दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ। गोमतीनगर की एक विशाल इमारत इन दिनों फिर चर्चा में है। यह कोई सामान्य सरकारी भवन नहीं है। इसके निर्माण पर सरकारी खजाने से करीब 821 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। करीब नौ वर्षों से यह परियोजना पूरी तरह उपयोग में नहीं आ सकी। अब सरकार ने इसके अधूरे काम पूरे कराने और संचालन के लिए निजी कंसोर्टियम का रास्ता चुना है। यहीं से JPNIC की कहानी में एक नया अध्याय शुरू होता है—और इसी के साथ कुछ पुराने सवाल भी फिर सामने आ खड़े होते हैं।

सवाल यह नहीं है कि JPNIC अब खुलेगा या नहीं। सवाल इससे पहले का है—जिस संपत्ति को जनता के पैसे से खड़ा किया गया, उसे सरकार स्वयं क्यों नहीं चला सकी? यदि इसके संचालन के लिए निजी क्षेत्र की जरूरत थी तो यह विकल्प पिछले नौ वर्षों में क्यों नहीं अपनाया गया? और जब समाधान सामने आया तो वह समय 2026 का ही क्यों है, जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं हैं?

इन सवालों का कोई निष्कर्ष पहले से तय कर देना उचित नहीं होगा। लेकिन सवालों की यह श्रृंखला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि JPNIC अब केवल एक निर्माण परियोजना नहीं रहा। यह एक ऐसी सार्वजनिक परिसंपत्ति है, जिसकी कहानी में सरकारी खर्च, अधूरा निर्माण, राजनीतिक विवाद, निजी निवेश, दीर्घकालीन लीज और चुनावी समय—सब एक साथ दिखाई दे रहे हैं।

कहानी शुरू हुई थी करीब 200 करोड़ के अनुमान से

JPNIC की परिकल्पना 2013 में तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में हुई थी। गोमतीनगर में लगभग 18 एकड़ में फैले इस परिसर को दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर की तर्ज पर सम्मेलन, संस्कृति, खेल और सामाजिक गतिविधियों के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना थी। परियोजना महत्वाकांक्षी थी और इसके भीतर होटल से लेकर कन्वेंशन सेंटर, ऑडिटोरियम, खेल सुविधाएं और मल्टीलेवल पार्किंग तक की व्यवस्था प्रस्तावित थी।

लेकिन किसी भी बड़ी सरकारी परियोजना की असली कहानी उसके शिलान्यास से नहीं, उसके अंतिम खर्च से सामने आती है। JPNIC की शुरुआती अनुमानित लागत करीब 200 करोड़ रुपये बताई गई थी। बाद में परियोजना पर खर्च बढ़कर लगभग 821 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यही वह आंकड़ा है जिस पर वर्षों से राजनीतिक बहस होती रही है।

यहीं पहला बड़ा सवाल जन्म लेता है—करीब 200 करोड़ रुपये से शुरू हुई परियोजना 821 करोड़ रुपये तक कैसे पहुंची? लागत बढ़ने के कारण क्या थे? क्या इसके लिए संशोधित अनुमान और स्वीकृतियां थीं? निर्माण में देरी, डिजाइन में बदलाव, अतिरिक्त कार्य या अन्य प्रशासनिक कारणों से कितना खर्च बढ़ा? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या इस बढ़ी हुई लागत की पूरी जवाबदेही तय हुई?

फिर सत्ता बदली और JPNIC की रफ्तार थम गई

2017 में उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ। JPNIC का काम पूरी तरह पूरा होने से पहले रुक गया। भाजपा सरकार ने परियोजना के निर्माण, अनुबंधों और खर्च को लेकर सवाल उठाए और जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ी। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी लगातार आरोप लगाती रही कि राजनीतिक कारणों से परियोजना को बंद रखा गया।

इस तरह करोड़ों रुपये से खड़ा हुआ परिसर धीरे-धीरे राजनीतिक विवाद का प्रतीक बन गया।

एक तरफ सवाल था कि इतना पैसा खर्च करने के बाद भी परियोजना अधूरी क्यों रही? दूसरी तरफ सवाल यह भी था कि यदि परियोजना में गड़बड़ियां थीं तो उनका समाधान निकालकर इसे जनता के उपयोग में लाने में लगभग नौ वर्ष क्यों लगे?

इन दोनों सवालों के बीच JPNIC वर्षों तक खड़ा रहा—एक ऐसी संपत्ति की तरह जिसमें पैसा लगा था, लेकिन उसका पूरा सार्वजनिक उपयोग नहीं हो रहा था।

नौ साल बाद तस्वीर अचानक बदलती है

अब 2026 में कहानी अचानक नया मोड़ लेती है।

उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने लखनऊ विकास प्राधिकरण के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए JPNIC को निजी क्षेत्र के संचालन के लिए देने का निर्णय किया है। रिपोर्टों में इसे पहली बार 30 वर्ष की लीज और कुछ जगह कुल 35 वर्ष के अनुबंध के रूप में बताया गया है। Indian Express के अनुसार पहली लीज 30 वर्ष की होगी और उसके बाद 25 वर्ष के नवीनीकरण का विकल्प है, जबकि LDA से संबंधित अन्य रिपोर्टों में 35 वर्ष के अनुबंध का उल्लेख है।

सरकार का तर्क सीधा है—परियोजना को पूरा करने के लिए अब सरकार को फिर से बड़ी रकम खर्च नहीं करनी पड़ेगी। निजी कंसोर्टियम अधूरे काम अपने खर्च से पूरा करेगा और इसके बाद परिसर का संचालन करेगा। अधूरे कार्यों पर करीब 200 से 250 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।

लेकिन यहीं नौ वर्ष पुराना सवाल फिर लौट आता है

अगर निजी निवेश के जरिए JPNIC को पूरा कराया जा सकता है, तो यह व्यवस्था पहले क्यों नहीं बनी?

और उससे जुड़ा दूसरा सवाल

क्या 2026 में लिया गया यह फैसला सिर्फ प्रशासनिक आवश्यकता का परिणाम है, या इसकी टाइमिंग पर राजनीतिक दृष्टि से भी चर्चा होनी चाहिए?

उत्तर का दावा करना जल्दबाजी होगी। लेकिन सवाल पूछने से परहेज भी नहीं किया जा सकता।

अब सामने आते हैं दो नाम—वृंदावन बॉटलर्स और रॉकवुड होटल्स

इस पूरी कहानी में सबसे महत्वपूर्ण नया नाम है उस कंसोर्टियम का जिसे JPNIC के संचालन की जिम्मेदारी मिली है।

यह कंसोर्टियम Brindavan Bottlers Private Limited और Rockwood Hotels & Resorts Private Limited का है। LDA के अधिकारियों के अनुसार मार्च 2026 में वैश्विक निविदा आमंत्रित की गई थी और तीन कंपनियों या कंसोर्टियम ने बोली प्रक्रिया में भाग लिया। मूल्यांकन के बाद Brindavan Bottlers और Rockwood Hotels के कंसोर्टियम को चयनित किया गया।

यहीं से एक और सवाल उठता है—आखिर इस चयन की कसौटी क्या थी?

कौन-सी तकनीकी योग्यता देखी गई? वित्तीय क्षमता का मूल्यांकन कैसे हुआ? होटल, कन्वेंशन सेंटर, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और पार्किंग जैसे अलग-अलग क्षेत्रों वाले इस विशाल परिसर को संचालित करने की क्षमता किस आधार पर परखी गई?

LDA ने बताया है कि तीन bidders में इस कंसोर्टियम की बोली सबसे अधिक थी। लेकिन अन्य दो bidders की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।

यही वह जगह है जहां निविदा प्रक्रिया की पूरी पारदर्शिता जनता के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।

Brindavan Bottlers को लेकर सवाल क्यों?

Brindavan Bottlers की पहचान मुख्य रूप से bottling और beverage कारोबार से जुड़ी कंपनी के रूप में सामने आती है। Times of India ने इसे करीब 400 करोड़ रुपये वार्षिक टर्नओवर वाली bottling company बताया है।

इसका अर्थ यह नहीं कि कंपनी JPNIC चलाने में सक्षम नहीं हो सकती। किसी consortium में अलग-अलग कंपनियां अलग-अलग विशेषज्ञता लेकर आती हैं। लेकिन प्रश्न फिर भी स्वाभाविक है—

JPNIC जैसे बहु-आयामी परिसर में Brindavan Bottlers की विशिष्ट भूमिका क्या होगी?

क्या वह वित्तीय निवेश करेगी? क्या उसके पास infrastructure management का अनुभव है? क्या वह hospitality operation में partner की भूमिका निभाएगी या consortium में उसकी भूमिका मुख्यतः वित्तीय होगी?

इन सवालों के जवाब निविदा और consortium agreement से स्पष्ट हो सकते हैं।

Rockwood की तस्वीर अलग है

यहां खबर को एकतरफा बनाने से बचना जरूरी है।

Rockwood Hotels & Resorts को LDA अधिकारियों ने होटल संचालन से जुड़ी कंपनी बताया है और करीब 30 स्थानों पर उसके होटल संचालन का उल्लेख किया गया है।

इसलिए यह कहना कि “Rockwood के पास होटल चलाने का कोई अनुभव नहीं” उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर सही नहीं होगा।

लेकिन यही तथ्य एक अलग सवाल पैदा करता है—जब consortium में hospitality experience मौजूद है तो दोनों साझेदारों की संयुक्त तकनीकी, वित्तीय और प्रबंधन क्षमता को निविदा में किस तरह अंक दिए गए?

क्या जनता को यह मूल्यांकन रिपोर्ट देखने का अधिकार नहीं होना चाहिए?

JPNIC आखिर है क्या—सिर्फ एक भवन या बड़ा व्यावसायिक परिसर?

इस प्रश्न का महत्व इसलिए है क्योंकि JPNIC को केवल सरकारी कार्यालय समझना भूल होगी।

परिसर में करीब 107-108 कमरों वाला होटल, लगभग 750 वाहनों की क्षमता वाली मल्टीलेवल पार्किंग, कन्वेंशन सेंटर, ऑडिटोरियम और खेल सुविधाएं हैं। इसके अलावा जिम, स्पा, सैलून, रेस्टोरेंट और ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल जैसी सुविधाओं का भी उल्लेख किया गया है।

यानी यह ऐसी संपत्ति है जिसमें सार्वजनिक उपयोग के साथ-साथ व्यावसायिक गतिविधियों की भी बड़ी संभावनाएं हैं।

यहीं एक नया सवाल सामने आता है—

आने वाले 30 वर्षों में इस परिसर से कितनी आर्थिक गतिविधि पैदा होगी और उसमें LDA का वास्तविक हिस्सा कितना होगा?

सरकार की आर्थिक गणित क्या कहती है?

सरकार का पक्ष भी स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए।

चयनित consortium को 25 करोड़ रुपये की performance guarantee जमा करनी होगी और Letter of Acceptance मिलने के बाद 10.11 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा। संचालन शुरू होने के बाद LDA को करीब 6 करोड़ रुपये सालाना मिलेंगे और इसमें हर वर्ष 5 प्रतिशत वृद्धि का प्रावधान है। LDA के अनुसार यह रकम लीज की अंतिम अवधि तक करीब 35 करोड़ रुपये सालाना तक पहुंच सकती है।

Hindustan Times के अनुसार consortium लगभग 831 करोड़ रुपये LDA को देगा और जमीन तथा संपत्ति का स्वामित्व LDA के पास ही रहेगा।

यानी सरकार इसे संपत्ति की बिक्री नहीं, बल्कि दीर्घकालीन संचालन और रखरखाव व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

इस तर्क में आर्थिक आधार है—सरकार को अधूरे काम पूरे करने के लिए अनुमानित 200-250 करोड़ रुपये अतिरिक्त नहीं लगाने पड़ेंगे और संपत्ति से राजस्व भी मिलेगा।

लेकिन जनता का सवाल फिर भी बचता है—

30 वर्षों में निजी संचालक की कुल संभावित कमाई कितनी होगी और LDA को कुल कितना मिलेगा?

संपत्ति सरकार की रहेगी—लेकिन उपयोग कौन करेगा?

यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है।

JPNIC की जमीन और संपत्ति का स्वामित्व LDA के पास रहेगा। निजी consortium को इसे संचालित और maintain करने का अधिकार मिलेगा। संग्रहालय भी LDA के नियंत्रण में रहेगा।

इसलिए इसे सीधे-सीधे “सरकारी संपत्ति बेच दी गई” कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

लेकिन क्या केवल स्वामित्व सरकार के पास रहने से पूरा सवाल खत्म हो जाता है?

यदि किसी सार्वजनिक परिसंपत्ति का दीर्घकालीन व्यावसायिक उपयोग निजी संचालक करता है, तो उस उपयोग की शर्तें, शुल्क, राजस्व और सार्वजनिक हित की सुरक्षा कितनी पारदर्शी है—यह सवाल तो रहेगा ही।

यही वह बिंदु है जहां सरकार और विपक्ष की व्याख्याएं अलग हो जाती हैं।

अखिलेश यादव ने क्यों उठाया सवाल?

JPNIC का राजनीतिक महत्व यहीं सबसे अधिक दिखाई देता है।

परियोजना अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री कार्यकाल में शुरू हुई थी। भाजपा सरकार के दौर में इस पर खर्च और निर्माण को लेकर सवाल उठे। अब उसी परियोजना के संचालन का अधिकार निजी consortium को देने के फैसले के बाद अखिलेश यादव ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सवाल उठाया कि भाजपा सरकार है या दुकानदार और सार्वजनिक संपत्तियों को निजी हाथों में देने का आरोप लगाया।

लेकिन यहां भी आप के सामने दो बातें अलग-अलग रखनी जरूरी हैं।

अखिलेश यादव का आरोप एक राजनीतिक पक्ष है।

सरकार का तर्क कि संपत्ति बेची नहीं गई बल्कि LDA के स्वामित्व में रहते हुए निजी संचालन दिया गया—दूसरा पक्ष है।

इन दोनों के बीच सच्चाई का बड़ा हिस्सा उन दस्तावेजों में छिपा है जिन्हें जनता शायद सबसे अधिक देखना चाहेगी।

असली सवाल निविदा की फाइल में छिपा है

तीन bidders ने हिस्सा लिया—यह जानकारी सामने है। विजेता consortium की सबसे ऊंची बोली होने की बात भी सामने आई है। लेकिन अन्य bidders के नाम और विस्तृत evaluation सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

अब सवाल यह है—

तकनीकी मूल्यांकन में किसे कितने अंक मिले?

वित्तीय बोली कितनी थी?

विजेता consortium की कुल net worth और investment capacity क्या थी?

Brindavan Bottlers और Rockwood की संयुक्त भूमिका tender में किस तरह परिभाषित की गई?

क्या JPNIC के प्रत्येक component—hotel, convention, sports, parking और auditorium—के संचालन के लिए अलग-अलग विशेषज्ञता की शर्त थी?

क्या tender evaluation report सार्वजनिक की जाएगी?

इन सवालों के जवाब किसी राजनीतिक बयान से नहीं मिलेंगे।

इनका जवाब टेंडर फाइल और अनुबंध देंगे।

और फिर लौटता है वही सवाल—अभी क्यों?

करीब नौ साल से बंद परियोजना के लिए 2026 में समाधान सामने आया है।

उत्तर प्रदेश का अगला विधानसभा चुनाव 2027 में होना है।

इसलिए इस फैसले की टाइमिंग पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है।

उपलब्ध प्रमाण यह साबित नहीं करते कि लीज का फैसला चुनावी लाभ के लिए ही लिया गया।

लेकिन यह प्रश्न जरूर पूछा जा सकता है

क्या सरकार ने इस समय इसलिए फैसला किया क्योंकि अब आर्थिक और प्रशासनिक रूप से इसे आगे बढ़ाना जरूरी हो गया था?

क्या नौ साल के अनुभव के बाद निजी मॉडल को सबसे व्यवहारिक विकल्प माना गया?

या सरकार चाहती है कि चुनाव से पहले वर्षों से बंद पड़ी राजधानी की एक बड़ी परियोजना जमीन पर सक्रिय दिखाई दे?

इनमें से कौन-सा कारण निर्णायक था—यह सरकार ही स्पष्ट कर सकती है।

जनता के पैसे का अंतिम हिसाब कौन देगा?

JPNIC की पूरी कहानी को अगर कुछ आंकड़ों में देखा जाए तो तस्वीर असाधारण है।

शुरुआती अनुमान करीब 200 करोड़ रुपये।

निर्माण पर खर्च करीब 821 करोड़ रुपये।

अधूरे काम के लिए अनुमानित 200-250 करोड़ रुपये।

निजी consortium की ओर से LDA को करीब 831 करोड़ रुपये का भुगतान।

संचालन के बाद करीब 6 करोड़ रुपये सालाना, जिसमें 5 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि।

और सामने 30 वर्ष की पहली लीज अवधि, जिसके बाद नवीनीकरण का विकल्प बताया गया है।

इन आंकड़ों के बीच सबसे बड़ा सवाल शायद यह नहीं है कि सरकार सही है या विपक्ष।

सबसे बड़ा सवाल यह है—

इस पूरी आर्थिक व्यवस्था में जनता का हित सबसे स्पष्ट रूप से कहां और कैसे सुरक्षित किया गया है?

JPNIC अब सिर्फ अखिलेश बनाम योगी का सवाल नहीं

राजनीतिक दल इस परियोजना को अपने-अपने नजरिए से देखेंगे। अखिलेश यादव इसे सार्वजनिक संपत्ति के निजी हाथों में जाने के रूप में देख रहे हैं। सरकार इसे वर्षों से अधूरी पड़ी परियोजना को बिना अतिरिक्त सरकारी खर्च के पूरा कराने और संचालित करने का रास्ता बता रही है।

लेकिन जनता के लिए शायद इससे बड़ा सवाल है।

क्या सरकार ने एक बंद पड़ी संपत्ति को बचाने का व्यावहारिक रास्ता खोज लिया है?

या

क्या जनता के पैसे से बनी संपत्ति के दीर्घकालीन व्यावसायिक उपयोग की शर्तें और अधिक सार्वजनिक चर्चा की मांग करती हैं?

दोनों संभावनाओं के बीच फैसला किसी एक राजनीतिक बयान से नहीं हो सकता।

अब सवाल सीधे जनता से

JPNIC की कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है। अगले दो वर्षों में consortium को अधूरे काम पूरे करके इसे संचालन में लाना है। उसके बाद ही पता चलेगा कि वर्षों से बंद यह परिसर वास्तव में राजधानी की अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक जीवन में कितनी भूमिका निभाता है।

लेकिन उससे पहले कुछ सवालों के जवाब जनता के सामने होने चाहिए—₹821 करोड़ की लागत इतनी क्यों बढ़ी? नौ वर्षों तक परियोजना बंद क्यों रही? अधूरे काम के लिए फिर 200-250 करोड़ की जरूरत क्यों पड़ी? चयनित consortium की तकनीकी और वित्तीय क्षमता का मूल्यांकन किस आधार पर हुआ? लीज की पूरी आर्थिक शर्तें क्या हैं? और 30 वर्षों में इस सार्वजनिक परिसंपत्ति से पैदा होने वाले आर्थिक लाभ में जनता का वास्तविक हित कैसे सुनिश्चित होगा?

और आखिर में वही सवाल, जिससे यह कहानी शुरू हुई थी—

क्या जनता के पैसे से बनी इतनी बड़ी संपत्ति को निजी संचालन के लिए देना आज की परिस्थितियों में सबसे बेहतर विकल्प है? क्या सरकार का यह फैसला JPNIC को नौ साल के सन्नाटे से बाहर निकालने का व्यावहारिक रास्ता है, या इसकी शर्तों और समय को लेकर और सवाल पूछे जाने चाहिए?

आपकी राय क्या है?

JPNIC को निजी consortium को देना सही फैसला है या सरकार को इसे स्वयं संचालित करना चाहिए था? क्या लीज की पूरी शर्तें और tender evaluation सार्वजनिक किए जाने चाहिए? और चुनाव से कुछ महीने पहले लिया गया यह फैसला—महज प्रशासनिक संयोग या ऐसा निर्णय जिस पर जनता को सवाल पूछने चाहिए?

अपनी राय कमेंट में जरूर लिखिए। JPNIC पर अंतिम फैसला किसी एक दल का नहीं, उस जनता की राय से भी बनना चाहिए जिसके पैसे से यह परियोजना खड़ी हुई है।

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