गोयल के बाद रणवीर प्रसाद के हाथों में ऊर्जा विभाग और चार प्रमुख विद्युत संस्थानों की कमान; वर्षों पुराने न्यायिक सवालों के बीच फिर उभरा पदों के केंद्रीकरण, विशेषज्ञता, जवाबदेही और निर्णय-प्रक्रिया का प्रश्न
दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।उत्तर प्रदेश की ऊर्जा व्यवस्था में रविवार को कुर्सियां बदलीं, चेहरे बदले, लेकिन सबसे बड़ा सवाल वहीं खड़ा रह गया—क्या केवल प्रशासनिक चेहरे बदलने से उस व्यवस्था की बुनियादी विसंगतियां बदल जाएंगी, जिस पर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं? डॉ. आशीष कुमार गोयल को ऊर्जा विभाग से हटाकर श्रम एवं सेवायोजन विभाग भेज दिया गया और रणवीर प्रसाद को प्रमुख सचिव ऊर्जा एवं अतिरिक्त ऊर्जा स्रोत के साथ उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड, उत्तर प्रदेश पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन लिमिटेड, उत्तर प्रदेश राज विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड और उत्तर प्रदेश स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर की अध्यक्षता सौंप दी गई। यानी शासन ने चेहरा बदला, मगर ऊर्जा विभाग की शीर्ष प्रशासनिक संरचना में विभाग और प्रमुख विद्युत संस्थानों की जिम्मेदारी फिर एक ही शीर्ष अधिकारी के हाथों में केंद्रित हुई।
यहीं से कहानी महज तबादले की नहीं रह जाती। यह उस पुरानी प्रशासनिक बहस के दरवाजे तक पहुंच जाती है, जिसे उत्तर प्रदेश की विद्युत व्यवस्था ने वर्षों पहले न्यायालय की चौखट पर देखा था। 25 जनवरी 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि ऊर्जा सचिव और उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन के चेयरमैन-कम-मैनेजिंग डायरेक्टर के पद अलग-अलग अधिकारियों के पास होने चाहिए, क्योंकि स्वतंत्र निगरानी की व्यवस्था में एक ही व्यक्ति के दोहरे पद पर रहने से निष्पक्षता का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है। अदालत ने यह निर्देश उस पृष्ठभूमि में दिया था जिसमें सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुपालन में विद्युत निगम के स्थानांतरण-पदस्थापन की निगरानी के लिए स्वतंत्र समिति गठित की गई थी।
अदालत का वह फैसला आज की प्रशासनिक व्यवस्था पर स्वतः कोई कानूनी निषेध नहीं लगाता, लेकिन उसका मूल प्रश्न आज भी असाधारण रूप से प्रासंगिक दिखाई देता है—जिस व्यवस्था में निर्णय, निगरानी और उत्तरदायित्व की रेखाएं एक-दूसरे में विलीन हो जाएं, वहां स्वतंत्र परीक्षण की गुंजाइश कितनी बचती है? यही वह प्रश्न है जो नई नियुक्ति के साथ फिर सतह पर आया है और जिसका उत्तर केवल शासनादेश से नहीं, बल्कि आने वाले महीनों में निर्णयों की पारदर्शिता और परिणामों से मिलेगा।
कहानी का दूसरा सिरा जून 2026 में दिखाई दिया था, जब ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा ने UPPCL के अध्यक्ष को पत्र लिखकर विभागीय निर्णय-प्रक्रिया पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई थीं। मीडिया में प्रकाशित पत्र के अनुसार मंत्री ने जून के बिजली बिलों में 10 प्रतिशत फ्यूल एंड पावर परचेज एडजस्टमेंट सरचार्ज लागू किए जाने की जानकारी और अनुमति से जुड़े सवाल उठाए तथा यह भी कहा कि विभाग से संबंधित कई महत्वपूर्ण निर्णयों की जानकारी उन्हें अधिकारियों से पहले मीडिया और टीवी चैनलों के माध्यम से मिल रही थी।
किसी राज्य के ऊर्जा विभाग के बारे में इससे अधिक गंभीर प्रशासनिक संकेत और क्या हो सकता है कि विभाग का राजनीतिक नेतृत्व स्वयं यह कहे कि उसे अपने ही विभाग की गतिविधियों का समाचार माध्यमों से पता चल रहा है? यह प्रश्न केवल मंत्री और अधिकारी के बीच समन्वय का नहीं है। बिजली की दर, आपूर्ति, उत्पादन, खरीद, संविदा कर्मियों की तैनाती और उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले वित्तीय प्रभाव से जुड़े निर्णय करोड़ों लोगों के जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। इसलिए निर्णय किसने लिया, किस स्तर पर लिया, किसे जानकारी थी और जवाबदेही किसकी होगी—इन प्रश्नों का स्पष्ट होना प्रशासनिक आवश्यकता से आगे बढ़कर सार्वजनिक हित का विषय बन जाता है।
और इसी बिंदु पर ऊर्जा विभाग में विशेषज्ञता का प्रश्न भी अपना पूरा आकार ग्रहण करता है। बिजली का संसार केवल फाइलों, शासनादेशों और बैठकों से संचालित नहीं होता। उत्पादन संयंत्रों की तकनीकी बाधाएं, पारेषण की जटिलताएं, वितरण नेटवर्क का क्षरण, फीडर प्रबंधन, लाइन लॉस, बिलिंग, उपभोक्ता शिकायतें और ग्रामीण आपूर्ति—इन सबकी अपनी अलग व्यावहारिक संरचना है। प्रशासनिक दक्षता निस्संदेह आवश्यक है, लेकिन प्रश्न यह है कि निर्णय-निर्माण के शीर्ष स्तर पर क्षेत्रविशेष की दीर्घकालिक विशेषज्ञता को कितनी संस्थागत प्राथमिकता दी जा रही है।
यही वह जगह है जहां विद्युत अभियंताओं के बीच लंबे समय से चली आ रही एक मांग को समझना आवश्यक हो जाता है। उनका तर्क रहा है कि उत्पादन, पारेषण और वितरण तीनों क्षेत्रों की अपनी विशिष्ट कार्य-संस्कृति और तकनीकी चुनौतियां हैं तथा निदेशक और प्रबंध निदेशक स्तर पर क्षेत्रीय अनुभव को चयन की महत्वपूर्ण कसौटी बनाया जाना चाहिए। इस तर्क को किसी एक अधिकारी के पक्ष या विपक्ष में निर्णय के रूप में नहीं देखा जा सकता; वास्तविक प्रश्न चयन-प्रक्रिया के उन मानकों का है जिनके आधार पर किसी व्यक्ति को किसी विशिष्ट विद्युत क्षेत्र की सर्वोच्च जिम्मेदारी दी जाती है।
क्योंकि जब उत्पादन क्षेत्र का अनुभव रखने वाला अधिकारी वितरण व्यवस्था की कमान संभालता है अथवा पारेषण की विशेषज्ञता वाला व्यक्ति उपभोक्ता-केंद्रित वितरण तंत्र की जिम्मेदारी पाता है, तब सवाल उसकी व्यक्तिगत योग्यता का नहीं बल्कि पद और अनुभव के बीच संस्थागत सामंजस्य का उठता है। क्या चयन प्रक्रिया में यह स्पष्ट किया जाता है कि जिस पद पर नियुक्ति हो रही है, उसके लिए आवश्यक क्षेत्रीय अनुभव क्या है? क्या उस अनुभव का कोई मापदंड सार्वजनिक है? और यदि है, तो क्या नियुक्तियों में उसका अनुपालन होता है? इन्हीं सवालों के उत्तर से तय होगा कि व्यवस्था विशेषज्ञता पर चल रही है या केवल प्रशासनिक सुविधा पर।
ऊर्जा विभाग की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए हाल के दिनों की बिजली आपूर्ति भी महत्वपूर्ण संकेत देती है। सितंबर 2026 में कोयले की उपलब्धता प्रभावित होने के बीच UPPCL ने बिजली प्रबंधन के लिए अतिरिक्त उपाय किए और निर्धारित रोस्टर के अनुरूप आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। निगम के अनुसार कुछ समय में 2,000 से 3,000 मेगावाट तक की कमी के कारण रात में ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित कटौती करनी पड़ी, जबकि बंद इकाइयों के पुनः संचालन और कोयले की आपूर्ति सुधारने के प्रयास किए जा रहे थे।
यह स्थिति यह नहीं सिद्ध करती कि सारी विद्युत समस्या किसी एक अधिकारी या किसी एक प्रशासनिक निर्णय का परिणाम है। बिजली व्यवस्था पर मांग, ईंधन उपलब्धता, उत्पादन इकाइयों की तकनीकी स्थिति, पारेषण क्षमता और वितरण अवसंरचना जैसे अनेक कारकों का प्रभाव पड़ता है। लेकिन जब उसी समय विभाग के भीतर समन्वय, निर्णय-प्रक्रिया और शीर्ष स्तर की जिम्मेदारियों के केंद्रीकरण पर प्रश्न उठ रहे हों, तब इन सभी पहलुओं की समग्र समीक्षा की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है।
इसीलिए दैनिक इंडिया न्यूज़ ऊर्जा विभाग को लेकर लगातार सवाल उठाता रहा है। सवाल किसी व्यक्ति विशेष को कठघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की जवाबदेही तय करने के लिए उठाए जाते रहे हैं जिसके निर्णय का सीधा असर आम उपभोक्ता पर पड़ता है। यदि शासन इन प्रश्नों को समय रहते गंभीरता से नहीं लेता, तो प्रशासनिक असंतोष धीरे-धीरे सार्वजनिक असंतोष में बदल सकता है। सरकार के सामने चुनौती यही है कि आलोचना को विरोध समझने के बजाय उसे व्यवस्था के लिए चेतावनी-संकेत के रूप में देखे।
क्योंकि बिजली का संकट राजनीतिक भाषणों में जितना छोटा दिखाई देता है, उपभोक्ता के घर में उतना ही बड़ा हो जाता है। वहां न फाइल होती है, न नोटशीट, न बैठक का कार्यवृत्त। वहां केवल मीटर होता है, बिल होता है और स्विच दबाने के बाद जलता या न जलता बल्ब होता है। इसलिए ऊर्जा विभाग के प्रशासनिक निर्णयों का वास्तविक मूल्यांकन सचिवालय की दीवारों पर नहीं, बल्कि उन घरों में होता है जहां उपभोक्ता समय पर बिजली, उचित बिल और शिकायत के त्वरित समाधान की अपेक्षा करता है।
दैनिक इंडिया न्यूज़ ने जिन प्रश्नों को बार-बार उठाया है, उनका सार भी यही है—क्या ऊर्जा विभाग की प्रशासनिक संरचना में अनुभव, विशेषज्ञता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को पर्याप्त स्थान मिल रहा है? यदि सरकार इन प्रश्नों को अनसुना करती है और समस्याएं बढ़ती रहती हैं, तो उसका प्रभाव केवल प्रशासनिक असंतोष तक सीमित नहीं रह सकता। 2027 का विधानसभा चुनाव निकट है और बिजली स्वाभाविक रूप से ऐसा जनसरोकार है जिसका राजनीतिक प्रभाव पड़ सकता है। यह कहना कि उसका परिणाम निश्चित रूप से किसी एक दल के पक्ष या विपक्ष में जाएगा, तथ्यों से परे अनुमान होगा; लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि बिजली, बिल और आपूर्ति जैसे प्रत्यक्ष जनजीवन के मुद्दों की अनदेखी किसी भी सरकार के लिए राजनीतिक रूप से जोखिमरहित नहीं होती।
अब रणवीर प्रसाद के सामने इसलिए केवल नई कुर्सी की जिम्मेदारी नहीं है। उनके सामने उस व्यवस्था को अधिक उत्तरदायी, समन्वित और विशेषज्ञतापूर्ण बनाने की चुनौती है जिसकी कमान उन्हें एक साथ ऊर्जा विभाग और चार प्रमुख विद्युत संस्थानों के रूप में मिली है। सवाल यह नहीं कि नई व्यवस्था कितनी शक्तिशाली है; सवाल यह है कि वह शक्ति कितनी पारदर्शी, कितनी उत्तरदायी और कितनी परिणामोन्मुखी सिद्ध होती है।
क्योंकि उत्तर प्रदेश की ऊर्जा व्यवस्था में असली परीक्षा किसी वीसी लिंक, किसी बैठक या किसी नई फाइल से नहीं होगी। परीक्षा उस दिन होगी जब उपभोक्ता का बिल सामने होगा, बिजली की जरूरत होगी और शिकायत का उत्तर मांगा जाएगा। तब यह नहीं पूछा जाएगा कि फाइल किसके पास थी; पूछा जाएगा कि जिम्मेदारी किसकी थी।
और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे कठिन प्रश्न है—कुर्सी बदलने से क्या व्यवस्था बदलेगी, या केवल कुर्सी पर बैठा चेहरा बदलेगा? अदालत का पुराना फैसला अपने समय में स्वतंत्रता और निष्पक्षता की चिंता दर्ज कर चुका है; मंत्री की चिट्ठी ने हाल के दिनों में समन्वय की समस्या को सार्वजनिक किया; विद्युत क्षेत्र के भीतर विशेषज्ञता और अनुभव की मांग अपनी जगह मौजूद है; और उपभोक्ता आज भी बिजली व्यवस्था का अंतिम परीक्षक है। अब निर्णय फाइल नहीं करेगी—परिणाम करेंगे।