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अहंकार बनाम जनादेश: ऊर्जा तंत्र की विफलताओं के बीच क्या नेतृत्व की चेतावनी अनसुनी रह जाएगी?

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Dainik India News

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लोकप्रिय शासन की आभा के समानांतर विभागीय दुराग्रह—स्मार्ट मीटर, बढ़ते बिल और जनाक्रोश का विस्फोट

दैनिक इंडिया न्यूज़, संपादकीय डेस्क, लखनऊ। उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक यात्रा का वर्तमान अध्याय जितना उज्ज्वल है, उतना ही संवेदनशील भी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश ने विकास, सुरक्षा और सुशासन के जिस उत्कर्ष को प्राप्त किया है, वह किसी भी दृष्टि से साधारण उपलब्धि नहीं कही जा सकती। किंतु इतिहास गवाह है कि जब शासन शिखर पर होता है, तब धरातल से उठती असंतोष की आहटों को यदि समय रहते न सुना जाए, तो वही आहटें कालांतर में विध्वंसक तूफान का रूप धारण कर लेती हैं। आज ऊर्जा विभाग के संदर्भ में जो तथ्य और आंकड़े उभर रहे हैं, वे केवल तकनीकी त्रुटियों का संकेत नहीं, बल्कि एक व्यापक तंत्रगत विफलता की ओर इशारा करते हैं। विभिन्न सार्वजनिक रिपोर्टों और नियामक प्रस्तुतियों के आधार पर यह स्पष्ट है कि स्मार्ट मीटर परियोजना के अंतर्गत प्रदेश में लाखों उपभोक्ताओं को इस प्रणाली से जोड़ा तो गया, किंतु इसके साथ ही शिकायतों का ग्राफ भी अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है। उपभोक्ता मंचों और विभागीय पोर्टलों पर दर्ज शिकायतों का अंबार इस योजना की जमीनी स्वीकार्यता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।

बिजली बिलों में 25 प्रतिशत से लेकर 60 प्रतिशत तक की विसंगतिपूर्ण वृद्धि की शिकायतें अब आम हो चुकी हैं। यह वृद्धि केवल सांख्यिकीय बोझ नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक संतुलन पर सीधा प्रहार है। जब एक सीमित आय वाला परिवार अचानक अपनी क्षमता से कई गुना अधिक बिल का सामना करता है, तो यह केवल वित्तीय संकट नहीं रह जाता, बल्कि व्यवस्था के प्रति उसके विश्वास का क्षरण बन जाता है। ऐसे अनगिनत प्रकरण हैं जहाँ उपभोक्ता महीनों तक विभागीय चौखटों पर सिर पटकते रहे, किंतु समाधान के नाम पर उन्हें केवल आश्वासनों का झुनझुना थमाया गया। यह प्रशासनिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है कि बिना किसी ठोस पूर्व सूचना या उपभोक्ता की स्पष्ट सहमति के, पुराने कार्यशील मीटरों को हटाकर जबरन स्मार्ट प्रीपेड मीटर थोपे जा रहे हैं। यह विषय अब केवल तकनीकी सुविधा का नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों और गरिमा का है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय की इस संदर्भ में तीखी टिप्पणियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि उपभोक्ता की इच्छा के विरुद्ध की गई कोई भी बाध्यता संवैधानिक कसौटी पर खरी नहीं उतर सकती। न्यायपालिका का यह संकेत शासन के लिए एक वैधानिक चेतावनी है जिसे नजरअंदाज करना आत्मघाती सिद्ध होगा।

संकट की गंभीरता तब और बढ़ जाती है जब यह प्रश्न उठता है कि क्या यह केवल प्रशासनिक अक्षमता है या इसके पीछे विभागीय अहंकार का कोई तत्व काम कर रहा है। क्या ऊर्जा विभाग का शीर्ष नेतृत्व इतना आत्ममुग्ध हो चुका है कि उसे जनभावनाओं का स्वर सुनाई देना बंद हो गया है? जब जनता सड़कों पर उतरती है और महिलाएँ अपने अधिकारों के लिए संघर्ष को विवश होती हैं, तब यह केवल तात्कालिक असंतोष नहीं होता, बल्कि उस अहंकार के विरुद्ध एक मौन विद्रोह होता है जो स्वयं को जनमत से ऊपर समझने की भूल कर बैठता है। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप इस संकट को और भी वीभत्स बना देते हैं। यदि बिल संशोधन के नाम पर अवैध लेन-देन की व्यवस्था पनप रही है, तो यह विभाग के नैतिक पतन का चरम रूप है। क्या ऊर्जा विभाग भ्रष्टाचार की इस अघोषित प्रतिस्पर्धा में स्वयं को 'अग्रणी' सिद्ध करने पर तुला है? यह प्रश्न कठोर अवश्य है, पर आज की परिस्थितियों में अनिवार्य भी है।

उल्लेखनीय है कि ऊर्जा क्षेत्र की इन विसंगतियों पर विद्युत नियामक आयोग जैसी संस्थाओं ने भी समय-समय पर चिंता जताई है। प्रमुख समाचार माध्यमों में निरंतर प्रकाशित हो रही खबरें इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि यह समस्या अब स्थानीय नहीं रही, बल्कि एक व्यापक जनव्यथा बन चुकी है। इसी के समानांतर शिक्षा क्षेत्र में भी कुछ नीतिगत विरोधाभास उभरे हैं जो सामाजिक संतुलन को प्रभावित कर रहे हैं। जब शासन के अलग-अलग स्तंभों में असंतोष की रेखाएँ एक साथ उभरने लगें, तो यह केवल संयोग नहीं होता, बल्कि इस बात का प्रमाण होता है कि संवाद की निरंतरता और संवेदनशीलता की डोर कहीं न कहीं कमजोर पड़ गई है।

राजनीतिक दृष्टिकोण से यह स्थिति अत्यंत निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। भारतीय जनता पार्टी को प्राप्त भारी जनादेश केवल नीतियों की जीत नहीं, बल्कि जनता के उस अगाध विश्वास का परिणाम है जो उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के व्यक्तित्व में जताया है। प्रदेश की जनता आज भी उनके नेतृत्व को सुशासन का पर्याय मानती है, किंतु विभागीय स्तर पर पनप रहा अहंकार और जनविरोधी निर्णय इस छवि को धूमिल करने का प्रयास कर रहे हैं। यदि समय रहते इन विसंगतियों को दूर नहीं किया गया और जवाबदेही तय नहीं की गई, तो यही असंतोष चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इतिहास की यह सीख सदैव याद रखी जानी चाहिए कि जनता का आशीर्वाद जितना सहज होता है, उसका आक्रोश उतना ही प्रचंड। सत्ता को यह सुनिश्चित करना होगा कि विभागीय हठधर्मिता कहीं जनमत की आकांक्षाओं पर भारी न पड़ जाए।

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