दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ।5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस पूरे देश में बड़े उत्साह के साथ मनाया गया। सरकारी विभागों, राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न संस्थाओं ने करोड़ों पौधे लगाने के दावे किए। "एक पेड़ माँ के नाम" जैसे भावनात्मक अभियानों का व्यापक प्रचार हुआ। समाचार पत्रों के पन्ने वृक्षारोपण की तस्वीरों से भर गए, सोशल मीडिया पर नेताओं और अधिकारियों की मुस्कुराती तस्वीरें छा गईं। किंतु प्रश्न यह है कि क्या पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल पौधा लगाकर उसके साथ फोटो खिंचवा लेना भर रह गया है?
यह एक कटु सत्य है कि जून की प्रचंड गर्मी में लगाया गया अधिकांश पौधारोपण कुछ ही दिनों में जीवन-संघर्ष हार जाता है। जिस पौधे को रोपने के लिए मंच सजता है, जिस पर भाषण होते हैं, जिस पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, वही पौधा कुछ दिनों बाद जलाभाव और उपेक्षा के कारण सूखकर मिट्टी में मिल जाता है। तब न कोई नेता लौटकर उसे देखने आता है, न कोई अधिकारी उसकी चिंता करता है। वृक्षारोपण एक उत्सव बन जाता है, वृक्ष संरक्षण नहीं।
विडंबना देखिए कि एक ओर विकास के नाम पर प्रतिवर्ष लाखों वृक्ष काटे जा रहे हैं, दूसरी ओर कुछ घंटों के वृक्षारोपण अभियान को पर्यावरण संरक्षण की ऐतिहासिक उपलब्धि घोषित कर दिया जाता है। यदि किसी राष्ट्र में वृक्षों की मृत्यु-दर उनकी जन्म-दर से अधिक हो जाए, तो वह राष्ट्र हरित भविष्य नहीं, बल्कि पारिस्थितिक संकट की ओर बढ़ रहा होता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लखनऊ में आयोजित कार्यकर्ता विकास वर्ग के समापन समारोह में सह सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर ने पर्यावरण के विषय पर एक अत्यंत मार्मिक प्रश्न उठाया। उन्होंने कहा कि भारत में ऐसे लोग मिल जाएंगे जो कई दिनों तक उपवास कर सकते हैं, जल के बिना भी कुछ समय रह सकते हैं, किंतु क्या इस धरती पर कोई ऐसा मनुष्य है जो पाँच मिनट तक ऑक्सीजन के बिना जीवित रह सके? यह प्रश्न केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता के लिए चेतावनी है।
विज्ञान भी यही कहता है। एक परिपक्व वृक्ष प्रतिवर्ष इतनी ऑक्सीजन प्रदान करता है कि कई मनुष्यों की श्वसन आवश्यकताओं को पूरा कर सके। वृक्ष केवल ऑक्सीजन के स्रोत नहीं हैं; वे पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करते हैं, वर्षा चक्र को संतुलित रखते हैं, भूजल का संरक्षण करते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं तथा असंख्य जीव-जंतुओं को आश्रय प्रदान करते हैं। वृक्ष पृथ्वी के फेफड़े हैं और फेफड़ों के बिना शरीर जीवित नहीं रह सकता।
आज भारत सहित पूरा विश्व अभूतपूर्व तापवृद्धि का सामना कर रहा है। हीट वेव अब केवल समाचार की सुर्खियाँ नहीं रहीं, बल्कि मृत्यु का कारण बनती जा रही हैं। हर वर्ष हजारों लोग लू और अत्यधिक तापमान के कारण अपने प्राण गंवा रहे हैं। नगरों का कंक्रीट जंगल धरती की उष्मा को और बढ़ा रहा है। यदि यही स्थिति रही तो आने वाले दस वर्षों में जीवन की मूलभूत परिस्थितियाँ ही चुनौती बन सकती हैं।
इस संदर्भ में यह भी विचारणीय है कि क्या वृक्षारोपण के लिए जून का समय उपयुक्त है? जब तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास हो, मिट्टी तप रही हो और पौधे को प्रतिदिन पर्याप्त जल न मिले, तब वृक्षारोपण का उद्देश्य कितना सफल होगा? क्या हमें केवल लक्ष्य पूरा करने के बजाय वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए? क्या वृक्षारोपण के साथ पाँच वर्ष तक उसके संरक्षण की जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जानी चाहिए?
इतिहास बताता है कि जब निर्णय विवेक के स्थान पर दिखावे से प्रेरित होने लगते हैं, तब परिणाम विनाशकारी होते हैं। मुहम्मद बिन तुगलक की अव्यावहारिक नीतियाँ आज भी प्रशासनिक मूर्खताओं के उदाहरण के रूप में स्मरण की जाती हैं। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि पर्यावरण संरक्षण भी केवल घोषणाओं और प्रतीकों का विषय बनकर न रह जाए।
भारतीय संस्कृति ने सदैव वृक्षों को देवतुल्य माना है। पीपल, वट, नीम, तुलसी और अशोक केवल वनस्पतियाँ नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं। हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही समझ लिया था कि प्रकृति और मनुष्य का संबंध स्वामी और सेवक का नहीं, बल्कि सहअस्तित्व का है।
आज आवश्यकता एक नए संकल्प की है। वृक्ष लगाना महत्त्वपूर्ण है, किंतु उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है उसे जीवित रखना। एक जीवित वृक्ष हजार फोटो से अधिक मूल्यवान है। एक संरक्षित पौधा हजार भाषणों से अधिक प्रभावशाली है। पर्यावरण दिवस तभी सार्थक होगा जब हम पौधारोपण को उत्सव नहीं, उत्तरदायित्व मानेंगे।
धरती को भाषणों की नहीं, छाया देने वाले वृक्षों की आवश्यकता है। आने वाली पीढ़ियों को घोषणाएँ नहीं, स्वच्छ वायु चाहिए। यदि मानव सभ्यता को जीवित रखना है, तो हमें केवल पेड़ लगाने नहीं, पेड़ों को जीवित रखने की संस्कृति विकसित करनी होगी। क्योंकि अंततः प्रश्न पर्यावरण का नहीं, हमारे अस्तित्व का है। जिस दिन अंतिम वृक्ष सूख जाएगा, उस दिन मानवता को यह समझने का अवसर भी नहीं मिलेगा कि उसने अपनी सबसे बड़ी भूल कब की थी।