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उत्तर प्रदेश के लाखों युवाओं की मेहनत को कुचलते बड़का बाबुओं के 'फैमिली बिजनेस'?

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Dainik India News

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उत्तर प्रदेश के लाखों युवाओं की मेहनत को कुचलते बड़का बाबुओं के 'फैमिली बिजनेस'?

विधानसभा भर्ती घोटाले की परतें खोलते न्यायालयी 'किताबी' अभिलेख

भर्ती या 'भाई-भतीजावाद का महोत्सव'? चयन सूची में VIP परिवारों के नाम देखकर अभ्यर्थी भी हैरान!

हाईकोर्ट की 'सख्त टिप्पणी' के बाद फिर गरमाया विधानसभा भर्ती प्रकरण — क्या कभी पूरा सच खुलेगा, या बस 'फाइलें' गोल घूमती रहेंगी?

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।उत्तर प्रदेश विधानसभा और विधान परिषद सचिवालय की 2020-21 वाली भर्तियां आज भी प्रदेश की सबसे 'मशहूर' और 'कमाई वाली' भर्ती प्रक्रियाओं में शुमार हैं। लाखों युवा रात-दिन मेहनत करते रहे, किताबों के पहाड़ चढ़े, सपने संजोए — और आखिर में पता चला कि सीटें पहले से ही 'घरेलू डिलीवरी' के लिए रिजर्व थीं। यह सिर्फ नौकरियां नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की उम्मीदों का कत्लेआम था।

वर्ष 2020 में विधान परिषद सचिवालय ने 99 पदों का विज्ञापन निकाला। प्रीलिम, मेन्स, रिजल्ट — सब कुछ हुआ। उधर विधानसभा सचिवालय ने 87 पदों पर भर्ती शुरू की। परीक्षाएं, टाइपिंग टेस्ट, मार्च 2021 में रिजल्ट। कुल मिलाकर लाखों अभ्यर्थी मैदान में उतरे। हजारों परिवारों ने सोचा — इस बार बेटा/बेटी का नाम चमक जाएगा। लेकिन जब चयन सूची आई तो सूची में 'परिवारिक ब्रांडिंग' की चकाचौंध थी।

सूत्रों और याचिकाओं के अनुसार

तत्कालीन प्रमुख सचिव संसदीय कार्य जय प्रकाश सिंह के पुत्र-पुत्री को समीक्षा अधिकारी (RO) का आसान रास्ता मिल गया।

विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे के 'कई संबंधी' चयनित हो गए।

विधान परिषद के डॉ. राजेश सिंह के बेटे, पूर्व मंत्री महेंद्र सिंह के भतीजे, पूर्व प्रमुख सचिव दिनेश कुमार सिंह के पुत्र, अजय कुमार सिंह के बेटे... और भी कई 'प्रभावशाली कुनबे' के नाम चमक उठे।

अरे वाह! क्या संयोग है ना? इतने बड़े-बड़े घरानों के बच्चे अचानक 'मेरिट' के दम पर पास हो गए। बाकी लाखों युवा तो बस 'एक्स्ट्रा' थे — मेहनत करने और फॉर्म भरने के लिए।

एजेंसियों का भी 'फैमिली प्लान':

विधानसभा की भर्ती BECIL को सौंपी गई, जो आगे TSR Data Processing को दे दी। विधान परिषद में राभव (Rabhav) की भूमिका। याचिकाकर्ताओं का आरोप — इन एजेंसियों से जुड़े लोगों के परिजन भी नौकरी लेकर चले गए। मतलब पूरा सिस्टम 'फैमिली एंटरप्राइज' बन गया था।

नियम संशोधन का 'मास्टर स्ट्रोक':

2016 तक भर्ती UPSC (उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग) के जरिए होती थी — पारदर्शिता का ढोंग भी चलता था। फिर नियम बदले गए। विधानसभा और परिषद ने खुद भर्ती का जिम्मा ले लिया। 2019 में और बदलाव। नतीजा? 'घर की मुर्गी दाल बराबर' वाला सीन। हाईकोर्ट ने इसे देखते हुए कड़ी टिप्पणियां कीं।

18 सितंबर 2023 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ कहा — "बहुत सारी परिस्थितियां संदेह पैदा करती हैं।" मामले को PIL में बदला और CBI जांच का आदेश दिया। 3 अक्टूबर को पुनर्विचार याचिका पर भी यही रुख। कोर्ट ने कहा — सार्वजनिक नौकरियां निष्पक्षता पर टिकी होनी चाहिए, न कि 'रिश्तेदारी के बाजार' पर।

CBI ने प्रारंभिक जांच शुरू की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम स्टे के बाद सब 'ठंडे बस्ते' में। अब मामला फिर चर्चा में है।

याचिकाकर्ता केपी सिंह के वकील रीना एन. सिंह ने मीडिया से कहा कि प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे को जांच की निष्पक्षता के लिए पद से अलग किया जाए। ताकि 'घर का जोगी' जांच न करे।

प्रदेश के लाखों युवा, उनके माता-पिता और आम नागरिक अब न्यायालय की तरफ देख रहे हैं। सवाल यही है — क्या इस 'फैमिली भर्ती महोत्सव' का सच सामने आएगा, या फिर वही पुराना नाटक चलेगा: "जांच चल रही है... रिपोर्ट जल्द आएगी

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